भारतीय भक्ति-चेतना : अंतःक्रियाएँ और रूपांतरण
- Madhav Hada

- Feb 25
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नागरीप्रचारिणीपत्रिका । पुंनर्नवांक : 1 । 2026
भारतीय भक्ति-चेतना के विकास में इसमें होने वाली अंतःक्रियाओं का बहुत महत्त्व है। भारतीय भक्ति-चेतना की कोई प्रवृत्ति, धारा और रूप अपने आरंभ से लगाकर अपने उत्कर्ष तक एकरूप और एकरैखिक कभी नहीं रहे। इन अंतःक्रियाओं के कारण इसमें प्रतिरोध, समाहार, आत्मसातीकरण, समन्वय, एकीकरण जैसी प्रक्रियाएँ चलती रहीं। भक्ति-चेतना के विकास को समझने के लिए इन अंतःक्रियाओं और इनके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक प्रेरकों की पहचान और समझ बहुत ज़रूरी है। अभी तक भारतीय भक्ति-चेतना और उसके साहित्य की पहचान में इनको बहुत कम महत्त्व दिया गया है। भक्ति का आज अधिकांशतः मान्य और प्रचलित रूप छठी से नवीं सदी के बीच अस्तित्व में आया और इसे इस दौरान सैद्धांतिक आधार भी दिया गया, लेकिन भक्ति का यह रूप भक्ति के पहले से चले आते कई रूपों के बीच अंतःक्रियाओं परिणाम था। यह रूप अस्तित्व में आ जाने के बाद भी यह एकरूप कभी नहीं रहा। संत-भक्तों ने अपनी रचनाओं से इसमें कई नये आयाम जोड़े। भक्ति के इस रूप में भी अंतःक्रियाएँ चलती रहीं। मध्यकाल और उत्तरमध्यकाल में इसमें अंतःक्रियाएँ सबसे अधिक हुईं और इसके कई नये रूप समाने आए। ख़ास बात यह है कि धर्म और भक्ति के प्राचीनतम रूप भी पूरी तरह कभी ख़त्म नहीं हुए। उनकी स्मृति और संस्कार की मौजूदगी किसी-न-किसी तरह बदले हुए भक्तिरूपों में भी हमेशा बनी रहे। बौद्ध, लोकायत, पंचरात्र, भागवत, तंत्र, सिद्ध-नाथ आदि धर्म और भक्ति के प्राचीन रूप देश भर में अस्तित्व में आए और भक्ति और धर्म के बाद के रूपों और मत-मतांतरों में विलीन हो गए। यह बहुत महत्त्वपूर्ण तथ्य है कि सबसे अधिक अंतःक्रियाएँ उत्तर भारत में नाथपंथ और पारंपरिक हिंदू धर्म के बीच हुईं, जिससे कई नये मत-मतांतर अस्तित्व में आए। इस तरह की अंतःक्रियाएँ बहुत स्वाभाविक और किसी भी समाज में होने वाली अनायास प्रक्रियाएँ थीं- ये सोद्देश्य या किसी सुनियोजित आंदोलन या मुहिम का हिस्सा नहीं थीं।
भारतीय भक्ति-चेतना के विकास में उसकी सदियों से बौद्ध, लोकायत, अद्वैतवाद, इस्लाम- सूफ़ी आदि परंपराओं के साथ अंतःक्रियाओं की बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका है। बौद्ध धर्म का भारतीय भक्ति-चेतना से सीधा संबंध दिखाई नहीं देता है, लेकिन इसकी प्रकृति और विकास को इसने दूर तक प्रभावित किया। बौद्ध धर्म का उद्भव और विकास ईसा पूर्व की छठी-पाँचवी सदी में हुआ और अगले दो हज़ार वर्षों में इसका व्यापक प्रसार लगभग संपूर्ण भारत और भारत से बाहर हो गया। पंचरात्र और भागवत संप्रदायों में इसकी प्रतिक्रियाएँ हुईं और इस कारण इनके चरित्र और विकास में कई बदलाव हुए। इन संपदायों ने अपने समय के कई लोकप्रिय देवताओं और पूजा-पद्धतियों का समाहार अपने भीतर कर लिया।[1] वैदिक देवता नारायण और लोकप्रिय देवता विष्णु का एकीकरण इसी दौरान हुआ।[2] आगे चलकर बौद्ध धर्म की एकाधिक शाखाएँ हो गईं, जिनमें से व्रज्रयान शाखा के तंत्रवाद ने भारतीय भक्ति-चेतना को बहुत दूर तक प्रभावित किया। वज्रयान बौद्ध धर्म का बहुत जटिल और साधनाप्रधान रूप था, जिसका प्रभाव सिद्धों-नाथों से होता हुआ मध्यकालीन और उत्तरमध्यकालीन संतों-भक्तों के यहाँ गुह्य और जटिल साधनाओं के रूप में आया। बौद्ध धर्म के सहजयान का भी भक्ति-चेतना के विकास पर व्यापक प्रभाव पड़ा। यह वैष्णव भक्ति-चेतना से बहुत अलग नहीं था, इसलिए इसमें इसका समाहार आसानी से हो गया। यहाँ तक कि बौद्ध धर्म के समय उसके बरक्स प्रचलित लोकायतों की परंपराएँ भी बदले हुए रूप में संत-भक्तों की रचनाओं में मौजूद रहीं।
1.
उत्तर भारत में भक्ति के प्रसार में रामानंद का बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान है, लेकिन उनके दर्शन और उनकी भक्ति-चेतना धर्म और भक्ति की एकाधिक परंपराओं की अंतःक्रियाओं से बनी हुई हैं। रामानंद का संबंध दक्षिण भारत की रामानुजीय परंपरा से जोड़ा जाता है, लेकिन यह बहुत अस्पष्ट प्रकार का संबंध है। रामानंद रामानुजीय परंपरा की चौहदवीं पीढ़ी में हुए और उन पर रामानुजीय भक्तिमार्ग के साथ योगपंथी, निर्गुणपंथी और सगुणपंथी परंपराओं का भी प्रभाव है। उनके शिष्यों की भक्तिसंबंधी चिंताओं और सरोकारों को देखकर लगता है कि उनकी भक्ति- चेतना बहुवचन थी। उनकी शिष्यों- कबीर, रैदास, सुरसुरानंद, अनंतानंद, नरहर्यानंद आदि ने अपने अलग मार्ग क़ायम किए। भक्ति की चेतना इन सभी के यहाँ है, लेकिन इनमें तो कहीं योग, तो कहीं ज्ञान की प्रमुखता है। हज़ारीप्रसाद द्विवेदी ने स्पष्ट किया है -
“रामानंद में कुछ-न-कुछ साधना ऐसी अवश्य थी, जिसके कारण योगप्रधान भक्तिमार्ग, निर्गुणपंथी भक्तिमार्ग और सगुणोपासक भक्तिमार्ग, तीनों की पुरस्कर्ता भक्तों ने उन्हें अपना गुरु माना।”[3]
रामानंद योग-साधना से परिचित थे, उन्हें इसका अभ्यास भी था और यह उन्हें अपने गुरु राघवानंद से विरासत में मिली। उनके गुरु राघवानंद की एक रचना सिद्धांतपंचमात्रा मिलती है, जिसमें योगमार्ग की साधना और अनुभवसिद्ध ज्ञान की महिमा का वर्णन है।[4] रामानंद का एक पद गुरुग्रंथसाहिब में भी संकलित है, जिसमें उन्होंने ब्रह्म के निर्गुण स्वरूप का वर्णन किया है।[5] रामानंद की सभी उपलब्ध रचनाओं की प्रामाणिकता को लेकर संदेह है, लेकिन उनकी कुछ रचनाओं- योगचिंतामणि, रामरक्षास्रोत आदि में योग की महिमा और नादबिंदु उपासना का वर्णन मिलता है। रामानंद शिष्यों में से भी कई नाथपंथियों के संपर्क में थे और उनसे प्रभावित भी थे। गलता का मठ रामानंद के प्रमुख शिष्य अनंतदास के शिष्य कृष्णदास पयहारी ने अपने अधीन ले लिया, लेकिन इसकी साधना-पद्धति पर नाथपंथ का प्रभाव बाद में भी बना रहा। कृष्ण्दास पयहारी के शिष्य कील्हदास के संबंध में नाभादास ने जो उल्लेख किया है उसके अनुसार वे अष्टांगयोग के साधक थे।[6]
जाति-पाँति और वर्णभेद के संबंध में भी रामानंद के विचार कुछ हद तक रामानुजाचार्य से अलग थे। रामानंद इस संबंध में अधिक उदार थे। उन्होंने बिना किसी भेदभाव के सभी जातियों और वर्णों को लोगों अपना शिष्य बनाया। वे भक्ति में किसी भी तरह भेदभाव के विरोधी थे। श्यामसुंदरदास ने उनके आचार्य और संत-व्यक्तित्व के इस पक्ष पर विचार करते हुए लिखा है-
“रामानुज नारायण के उपासक थे और उनकी धर्म-व्यवस्था में वर्ण-धर्म का स्थान पूर्ववत् ही था। रामानंद के दार्शनिक विचार तो रामानुज के अनुसार ही थे, पर आचार-विचार की व्यवस्था में कुछ परिवर्तन अवश्य हो गया था। यह नहीं कहा जा सकता कि रामानंद ने वर्णाश्रम के बंधनों को बिल्कुल तोड़ दिया था, क्योंकि इसका कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता। परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि शिष्य बनाने में उन्होंने जाति-पाँति का कोई विचार नहीं किया था। इस संबध में उनका यही सिद्धांत जान पड़ता है कि “जाति पाँति पूछै नहिं कोई। हरि को भजै सो हरि को होई।”[7]
2.
भक्ति की अन्य धार्मिक परंपराओं के साथ अंतःक्रियाएँ ख़ासतौर पर महाराष्ट्र, उडीसा और बंगाल में दिखायी पड़ती हैं। महाराष्ट्र में वारकरी संप्रदाय से पहले महानुभाव संप्रदाय मिलता है, जो विभिन्न प्रकार की धार्मिक परंपराओं का जटिल मिश्रण है। संप्रदाय के उपास्य कृष्ण हैं, लेकिन इसमें दत्तात्रेय की उपासना भी प्रचलित है। कृष्ण की रासलीला को इसमें ख़ास महत्त्व दिया गया है। पूजा-उपासना में महानुभाव संप्रदाय द्वैतवादी हैं, लेकिन इसका विश्वास निर्ग़ुण में भी है। महानुभाव साधुओं की जीवनचर्या राजाओं की तरह होती थी। परशुराम चतुर्वेदी ने लिखा है -
“इसके आचार्य महंत कहे जाते हैं, जिनके अधीन अनेक महानुभाव रहा करते हैं। मंहत के समाधिस्थ होने पर उसके उत्तराधिकारी का निर्वाचन हुआ करता है, जिसे शिष्य लोग अपने में से ही निर्वाचित कर लेते हैं। मंहत के पास छत्र, चमर, पालकी, मुहर आदि सभी राजचिह्न रहते हैं और वह गद्दी पर बैठा करता है।”[8]
कुछ हद तक महानुभाव संप्रदाय का समाहार बाद में वारकरी संप्रदाय में हो गया।[9] वारकरी महाराष्ट्र का सबसे लोकप्रिय और दीर्घकालीन संप्रदाय भी भक्ति और धर्म की कई परंपराओं- द्वैत-अद्वैत, ज्ञान-भक्ति, शास्त्र-लोक आदि का असाधारण समन्वय है। बौद्ध, सिद्ध-नाथ और वैष्णवभक्ति की अलग-अलग कई परंपराओं का मिश्रण इस संप्रदाय में मिलता है। संपदाय निर्गुणोपासक है, लेकिन इसमें उपास्यदेव विट्ठलनाथ की मूर्ति पूजा होती है। कहते हैं कि इस संपदाय की बुनियाद पुंडरीक ने रखी, जो पंढ़रपुर के रहने वाले और मातृ-पितृभक्त थे। मान्यता है कि राधा पर एकाग्रता और इस कारण कृष्ण द्वारा अपनी उपेक्षा से क्षुब्ध रुक्मिणी द्वारिका से पंढरपुर के पास स्थित डिंडिरबन के जंगल में आ गई। कृष्ण उसे मनाने आए, तो वे मातृ-पितृभक्त पुंडरीक से भी मिले। पुंडरिक ने उन्हें बैठने के लिए एक ईंट दे दी। भक्तों का विश्वास है कि पंढ़रपुर के विट्ठलनाथ वे ही कृष्ण हैं, जो अभी तक प्रतिमा में अपनी प्रिया रुक्मिणी के साथ ईंट पर ख़ड़े हैं। यह संप्रदाय अपने पूज्य के रूप में शिव को भी स्थान देता है। संप्रदाय में मान्य योगसाधना में शिव को केंद्रीय महत्त्व दिया गया है। वारकरी में संप्रदाय में मराठी कई बड़े संत-भक्त कवि हुए, जिनमें ज्ञानदेव (1275-1296 ई.), नामदेव (1270-1350 ई.), एकनाथ (1528-1599 ई.) और तुकाराम (608-1694 ई.) प्रसिद्ध हैं। ज्ञानदेव ने मराठी में भगवद्गीता की भावार्थदीपिका नामक एक टीका लिखी, जो ज्ञानेश्वरी के नाम से प्रसिद्ध हुई। एकनाथ ने भी भागवतपुराण की टीका लिखी, जो मराठी में एकनाथी भागवत के नाम से प्रसिद्ध है। वारकरी संप्रदाय के भीतर ही बाद में चैतन्य, स्वरूप, आनंद, प्रकास आदि उपसंप्रदाय बन गए।
3.
उड़ीसा, बंगाल और असम भी इसी तरह की अंतःक्रियाओं के केंद्र रहे। ख़ासतौर पर उड़ीसा, जहाँ भगवान् जगन्नाथ का मंदिर है, में इस तरह अंतःक्रियाएँ बहुत हुईं। ओड़िशा में बौद्ध धर्म तो पहले से ही था, लेकिन ईसा पूर्व की पाँचवी सदी में वहाँ वैष्णव धर्म के आरंभिक रूप की पहुँच भी हो गई थी। प्राचीन देवता वासुदेव और संकर्षण और वहाँ क्रमशः जगन्नाथ और बलराम हो गए। इसी तरह कृष्ण की बहन सुभद्रा की पूजा वहाँ शक्ति के रूप में होने लगी। भगवान् जगन्नाथ के विग्रह में बौद्ध धर्मावलंबियों की भी आस्था बनी रही। बौद्ध धार्मिक किताब धर्मपूजाविधान में उल्लेख है कि “जलधिर तीरे स्थान बौद्ध रूपे भगवान हय्या तुमि कृपावलोकन।”[10] अर्थात् हे भगवान! समुद्र तीर पर आप बुद्ध के रूप में कृपालु दिखते हैं। बौद्ध और शैव धर्म ओड़िशा में वैष्णवभक्ति के साथ अंतःक्रिया में हमेशा रहे। सोलहवीं सदी चैतन्य का बंगाल से जगन्नाथपुरी आना बड़ी परिघटना थी। ओड़िशा के पंचसखा कवियों- बलरामदास (जन्म: 1473 ई.), अनंतदास (जन्म: 1475 ई.), जसवंतदास एवं जगन्नाथदास (जन्म: 1477 ई.) और अच्युतानंददास (जन्म: 1489 ई.) की रचनाओं में उनका प्रभाव साफ़-साफ़ दिखता है।[11] पंचसखा वैष्णव धर्मानुयायी थे, लेकिन उनके सरोकार और चिंताएँ आम वैष्णव कवियों से अलग भी हैं। कुछ विद्वान् इनको चैतन्य से प्रभावित मानते हैं। दरअसल पंचसखा बौद्ध धर्म की महायान शाखा से प्रेरित हैं, लेकिन ये सभी स्थानीय वैष्णव परंपराओं के साथ घुल-मिल गए हैं। इनके यहाँ ‘यत् पिंडे तत् ब्रह्मांडे’ अर्थात् जो पिंड में है, वही ब्रह्मांड में है की धारणा मिलती है। पंचसखाओं के यहाँ हठयोग की साधना भी है। इन्होंने भगवान् जगन्नाथ को बुद्धावतार मानकर उनकी पूजा की और इन्होंने बौद्ध धर्म के शून्यवाद और देहवाद को भी स्वीकार कर लिया। बौद्ध धर्म से प्रभावित होने के बावजूद इन्होंने अपनी अलग पहचान बनाए रखी। प्रभात मुखर्जी ने इस संबंध में लिखा है -
“ओड़िशा के मध्यकालीन वैष्णव धर्म ने नाथपंथ एवं बौद्ध धर्म की विचारधाराओं को अपना लिया, लेकिन उनके साथ एकरूपता या अभिन्नता कभी ग्रहण नहीं की। .. मध्यकालीन वैष्णववाद पर बौद्ध धर्म का प्रभाव इतना गहरा नहीं था। अच्युतानंद और उनके सहयोगी धर्मनिष्ठ थे और सच्चे वैष्णव थे। उनका पूजा-विधान अतिरंजित है, इसमें कोई संदेह नहीं है, लेकिन उन्होंने इसे एक विशेषता के रूप में लिया।
वैष्णव धर्म पर अच्युतानंद टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि “हिंदू पूजा करते हैं अलेख की और तुर्क (मुहम्मद) अलेफ़ की पूजा करते हैं। इसलिए अलेफ़ को त्यागकर, हिंदू अलेख की पूजा करते हैं।”[12]
बंगाल के समावेशी जनसाधारण में सभी प्रकार की धर्म और भक्तिसंबंधी परंपराओं को विकसित होने के लिए उर्वर ज़मीन मिली। बंगाल में बौद्धों की साथ सिद्धों-नाथों की परंपराएँ बहुत समृद्ध रही हैं और मध्यकाल तक इनकी मौजूदगी वहाँ बहुत मुखर रूप में मौजूद है। गौरांग चैतन्य (1468-1534 ई.) और उनका गौड़ीय संप्रदाय बंगाल और इसके बाहर बहुत लोकप्रिय हुआ। उनका भावोन्मत्त व्यक्तित्व बहुत असाधारण और सम्मोहक था। उनके भक्त व्यक्तित्व की निर्मिति में बंगाल की कई भक्ति और धार्मिक परंपराओं का योग है। बंगाल में मध्वाचार्य और निंबार्काचार्य का प्रभाव भी था, कबीर और दादू का वहाँ के ग्रामीण जनसाधारण में मान्य थे और जयदेव, विद्यापति, चंडीदास आदि की भावप्रधान काव्य रचनाएँ भी बंगाल में लोकप्रिय थीं। इनका सबका सम्मिलित प्रभाव चैतन्य पर हुआ। कृष्ण का शृंगारिक व्यक्तित्व उनके लिए पूज्य था और उनकी आराधना राधाभाव की थी। बाद में चैतन्य का गौडीय संप्रदाय वहाँ पहले से मौजूद बौद्ध, लोकायत और सूफ़ी परंपराओं के साथ संपर्क आया और वहाँ इनमें अंतःक्रियाओं से सहजिया, कर्ताभजा, किशोरभजा, नेडानेडी, बाउल, दरवेश, जगन्मोहिनी, गौरांगसेवक, स्पष्टदायक आदि कई संप्रदाय और मत-मतांतर बन गए। इनमें से बाउल संप्रदाय बंगाल में सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ और यह आधुनिककाल के शुरुआत में लालन फ़क़ीर (1774-1890 ई.) के समय अपने उत्कर्ष पर पहुँचा। बाउल साधना और संप्रदाय का विकास बाँग्ला समाज में भक्ति-चेतना की विभिन्न धाराओं और रूपों में चलने वाली अतःक्रियाओं का परिणाम है। ‘बाउल’ शब्द की एकाधिक व्युत्पतियाँ मानी गई हैं। कुछ बाउल अध्येता इसकी व्युत्पति ‘वातुल’ से मानते हैं, जिसका अर्थ बावरा, बाउर आदि है। कुछ अन्य इसको इस्लाम या सूफ़ीमत से संबंधित मानकर इसकी व्यत्पुति ‘आउल’ (औलिया) से मानते हैं, जब कि कुछ की राय यह है कि यह शब्द ‘बातिल’ से उत्पन्न है, जिसका अर्थ है ‘धर्म से च्युत’। कुछ अन्य विद्वान् इसकी उत्पत्ति का संबंध ‘व्याकुल’ से जोड़ते हैं. जिसका अर्थ ‘व्यग्र’ है। कुछ अन्य की राय में ‘बाउल’ शब्द फ़ारसी के ‘वली’ या ‘बावली’ से उत्पन्न है।[13] बाउल संप्रदाय की उत्पत्ति और विकास के संबंध में अभी तक सब कुछ अनिश्चित है- विद्वान् इस संबंध में एक राय नहीं हैं। बंगाल के भद्र और शहरी समाज से अलग, दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में निवास या घुमक्कडी के कारण बाउल संप्रदाय और इसकी गुह्य साधनाओं के संबंध में बहुत कम जानकारियाँ उपलब्ध हैं। बाउल साधना और संप्रदाय के प्रसिद्ध अध्येता उपेंद्रनाथ भट्टाचार्य के अनुसार इसकी शुरुआत 1650 ई. में हुई और 1925 ई. में लालन फ़क़ीर के आविर्भाव और लोकप्रियता के साथ यह अपने उत्कर्ष पर पहुँचा।[14] दरअसल सत्रहवीं सदी के पूर्वार्ध में यह एक संप्रदाय के रूप में अस्तित्व में आया। बाउल साधना दरअसल बौद्धों के हठयोग, वैष्णवों की भक्ति, सूफ़ियों के प्रेम का जटिल और विचित्र मिश्रण है। संप्रदाय का आदि स्रोत बौद्ध धर्म की सहजिया साधना है। दरअसल जैसा कि उपेंद्रनाथ भट्टाचार्य ने माना है कि हिंदुओं का शिवशक्तिवाद पालयुग (नवीं-दसवीं सदी) में बौद्धों के प्रज्ञा-उपायवाद में मिल गया और सेनयुग (बारहवीं-तेरहवीं सदी) में प्रज्ञाउपायवाद के स्थान पर प्रकृति-पुरुष के रूप में राधा-कृष्णवाद की प्रतिष्ठा हुई।[15] इसी समय बौद्ध सहजिया संप्रदाय का वैष्णव सहजिया संप्रदाय में रूपांतरण हुआ। आगे चलकर इसमें चैतन्यदेव की वैष्णव रागानुराग भक्ति और सूफ़ी भावधारा का प्रेम भी जुड़ गए। इस तरह बौद्ध सिद्ध-नाथों के हठयोग, वैष्णवों की सहज साधना और राधा-कृष्णवाद और सूफ़ियों की प्रेम साधनाओं के बीच अंतःक्रियाओं से बाउल साधना और संप्रदाय अस्तित्व में आया। बाउल साधना में प्रेम और भावोन्माद पर बहुत ज़ोर है। यह साधना धार्मिक, सांप्रदायिक और जातीय भेदभाव और धार्मिक बाह्याचारों का विरोध करती है। बाउल साधना मूलतः गुह्य काया साधना है, जिसमें मनुष्य देह का बहुत महत्त्व दिया गया है। नाथ योगियों की तरह इसमें धारणा है कि “यत् पिंडे तत् ब्रह्मांडे।” बाउल मानते हैं कि ईश्वर मनुष्य देह में ही स्थित है, जिसकी पहचान देह साधना से ही संभव है। बाउल साधना में स्त्री-पुरुष के रजः और वीर्य के संयोग होने वाली विशेष प्रकार की उदात्त मैथुन क्रिया का प्रावधान है।[16]
बंगाल से सटे असम में भी अंतःक्रियाओं से कई भक्तिरूप अस्तित्व में आए, जिनमें शंकरदेव (1449-1568 ई.) का महापुरुषिया संप्रदाय सर्वप्रमुख है। असम में इसका व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ। यह चैतन्य के गौड़ीय संप्रदाय से पहले अस्तित्व में आया और इसके कुछ सिद्धांत शंकरदेव ने स्वयं स्थिर किए और शेष के संबंध में इसकी निर्भरता रामानुजाचार्य के विशिष्टाद्वैतवाद पर थी। इस संप्रदाय की भक्ति सेव्य-सेवक भाव की दास्यभक्ति है और इसमें केवल कृष्ण उदिष्ट है। संप्रदाय में साधना अहेतुक है और इसमें नाम-स्मरण को बहुत महत्त्व दिया है। भागवतपुराण इस संपदाय में पूजनीय ग्रंथ है। यह ग्रंथ संप्रदाय के मंदिरों में गुरुग्रंथसाहिब की तरह रखा जाता है। असम में ही दामोदरदेव का दामोदरीय और हरिदेव के हरिदेवीय संपदाय भी बने, जो महापुरुषिया से प्रभावित थे, लेकिन कुछ मामलों में उससे अलग थे।
4.
कश्मीर भी सदियों से बौद्ध, शैव, नाथ-सिद्ध, सूफ़ी आदि भक्ति और धार्मिक परंपराओं का विचित्र समन्वय स्थल रहा है। ललद्यद का जीवन और उनकी वाख रचनाओं में इन परंपराओं के बीच संवाद और अंतःक्रिया की स्मृतियाँ और संस्कार मौजूद हैं। ललद्यद के वाखों में इस अंतःक्रिया और संवाद के साक्ष्य हैं- वे हिंदुओं में ललेश्वरी और मुसलमानों में ललारिफ़ा के रूप में मान्य और लोकप्रिय हैं। उनकी सांस्कृतिक निर्मिति ऐसी है कि उन्हें केवल शैवयोगिनी, ललेश्वरी और सूफी ललारिफ़ा में सीमित नहीं किया जा सकता। वे इन परंपराओं के संयोग और संश्लेषण से बनी हुई हैं। ललद्यद के समय कश्मीर के सांस्कृतिक बोध का हिंदू-शैव-सूफ़ी-मुसलमान में विभाजन नहीं हुआ था, इसलिए इन सभी परंपराओं से संबंधित जनश्रुतियाँ वहाँ आज भी प्रचलन में हैं। ललद्यद पर कश्मीरी शैवदर्शन का प्रभाव है और यह और उनके वाखों में साफ़ दिखाई पड़ता है। उनके एक वाख में ‘प्रत्यभिज्ञा’ का उल्लेख भी है। वे कहती हैं कि “मेरे कर्म ही हैं मेरी पूजा / जो आया जीभ पर / वही हैं मेरे मंत्र / देह ने जो किया / वही है परिचय-प्रत्यभिज्ञा / यही है परम शिव का सार।”[17] यह प्रसिद्ध है कि शैवभक्त सिद्ध सिद्धमोल या श्रीकंठ उनके गुरु थे। ललद्यद के वाखों में उनका नाम भी मिलता है और इस संबंध में कई जनश्रुतियाँ भी चलन में हैं। कश्मीरी शैवदर्शन से संबंधित सभी मनीषी गृहस्थ और शास्त्रज्ञ थे, लेकिन ललद्यद ने योगिनी का गृहत्याग और निर्वस्त्र भ्रमणकारी संन्यासी का मार्ग चुना, इसलिए लगता है कि कश्मीर की बौद्ध-सिद्ध-नाथों की हठयोग और तांत्रिकों संन्यासियों की परंपरा से भी उनका कोई गहरा संबंध ज़रूर रहा होगा।[18] योग की प्राण, अपान, वायु, निरोध, कुंभक, दस नाड़ियाँ, द्वाद्शमडल, छह चक्र आदि शब्द और पद उनके वाखों में हैं। हठयोग की प्रक्रिया और उसकी अवस्थाएँ भी उनके वाखों में आती हैं। एक वाख उन्होंने कहा है कि “मेरे भीतर थे वे / मैं ढूँढ़ती रही बाहर / पवन, ध्यान और योग से मिली सहायता / मैंने जान लिया / अपना कैवल्य अस्तित्व / मेरा रंग मिल गया / जगत् के रंग में।”[19]
फ़ारसी वृत्तांतों और जनश्रुतियों में ललद्यद की शेख़ नूरुद्दीन वली और शेख़ सैयद अली हमदानी से भेंट-संवाद और सैयद हुसैन समनानी से दीक्षा के प्रसंग भी मिलते हैं। नुंद ऋषि कश्मीर के विख्यात और सबसे अधिक मान्य संत हैं। उनके जन्म और निधन को लेकर एकाधिक धारणाएँ हैं, लेकिन अधिकांश विद्वानों का मानना है कि उनका जन्म 1377 और निधन 1440 ई. में हुआ, जब कि अधिकांश विद्वानों की राय में ललद्यद का निधन उससे पहले 1373 के आसपास हो गया था।[20] सैयद अली हमदानी भी कश्मीर के विख्यात और मान्य संत हैं। वे ‘अमीर कबीर’, ‘शाह हमदान’ और ‘अली शाह’ के नाम से विख्यात हैं। उनके संबंध में विद्वानों की राय अलग-अलग है। आर.के. परिमु के अनुसार “न ही वह धर्मांध कट्टरपंथी लगता है और न धार्मिक क्रांतिकारी।”[21] कश्मीर के सुल्तान कुतबुद्दीन (1377-93 ई.) पर उनका गहरा प्रभाव था और कश्मीर के इस्लामीकरण उनकी प्रमुख भूमिका रही है। कहा जाता है कि तैमूरलंग (1336-1405 ई.) से मतभेद और उसकी नाराज़गी के कारण बुखारा से हमदानी कश्मीर में सबसे पहले 1372-73 ई. आए। दूसरी बार वे 1379-80 ई. में आए अपने साथ 700 शागिर्दों को भी लेकर आए और दो वर्ष तक रहे। तीसरी और अंतिम बार वे 1385-86 ई. आए और कहते हैं कि यहाँ से लौटते हुए पंजाब में उनका निधन हो गया।[22] एक तो चारों- ललद्यद, नुंद ऋषि, हमदानी और समनानी के समय में कोई बहुत ज़्यादा अंतर नहीं है, दूसरे ललद्यद और नुंद ऋषि के जन्म और निधन की तिथियाँ भी अनिश्चित हैं और तीसरे, ललद्यद अपने समय की विख्यात और लोकप्रिय संत थीं, इसलिए इसकी संभावना तो है कि ललद्यद इनके संपर्क में आई होंगी। ललद्यद और अली हमदानी की भेंट का प्रकरण सबसे पहले अस्रार-उल अब्रार में विस्तार से आया है। ललद्यद सैयद अली हमदानी की दीक्षित शिष्या थी, यह उल्लेख सबसे पहले बीरबल काचरू ने किया। क़ुबरावी सूफ़ी संप्रदाय में यह धारणा है कि ललारिफ़ा शाह हमदानी के साथ आध्यात्मिक साधना के चार चरण- नासूत, मलकूत, जबरूत और लाहुत से गुज़रकर परमधाम ‘अर्श-ए-माजिद’ तक पहुँची। बाद के वृत्तांतकार पीर ग़ुलाम हसन ने ललद्यद की सैयद अली हमदानी से भेंट का उल्लेख नहीं किया है, लेकिन उन्होंने सैयद जलालुद्दीन बुख़ारी और सैयद हुसैन समनानी से उनकी भेंट का उल्लेख किया है। वाक़ियात-ए-कश्मीर में भी में साफ़ लिखा है कि ललद्यद और हमदानी की मुलाक़ात शोधार्थियों द्वारा प्रमाणित नहीं है।[23] यह कहा जाता है कि सैयद जलालुद्दीन बुख़ारी ने ललद्यद से कहा कि उसे जल्दी ही कश्मीर आने वाले गुरु सैयद हुसैन समनानी दीक्षा देंगे। समानानी इस्लाम के प्रचार-प्रसार के लिए हमदानी के अग्रिम दल में आने वाले सैयदों में से एक थे। समनानी 1371-72 ई. में कश्मीर आए और उन्होंने लद्द्यद को दीक्षा दी। लाहौर से प्रकाशित बीबी ललारिफ़ा में उल्लेख है कि “तत्त्वज्ञान का प्रसाद पाकर वह निहाल हो उठी। अंत में मन-कर्म से उनकी (पसैयद हुसैन समनानी) प्रधान शिष्या बन गई। वह जन्मजात संत (वली) थी, मगर श्रेष्ठ सूफ़ी संतों के संपर्क में आने से उसकी आध्यात्मिक साधना में निखार और परिष्कार हुआ।”[24] यह सही है कि ये सभी जनश्रुतियाँ और वृत्तांत पूरी तरह सच नहीं है, विद्वानों की निगाह में ये प्रमाणपुष्ट भी नहीं हैं और यह भी सही है कि इनमें धार्मिक आग्रह से ललद्यद का अनुकूलीकरण भी हुआ है। किसी भी समाज में इस तरह की प्रक्रियाओं निरंतरता बहुत स्वाभाविक है। महत्त्वपूर्ण और उल्लेखनीय तथ्य यह है कि लोक ने आंशिक सत्य का सहारा लेकर जिस तरह से ललद्यद, नुंद ऋषि, समनानी और हमदानी के परस्पर संबंधों को ताने-बाने में गूँथकर विस्तार दिया है, वह कश्मीर की अपनी ख़ास और अलग समावेशी संस्कृति की ज़रूरत थी और यह उस समय इसकी विशेषता भी थी।
5.
उत्तरी भारत में भी भक्ति के प्रचलित रूपों में कई तरह की अंतःक्रियाएँ हुईं। उत्तर भारत की ख़ास बात यह थी कि यहाँ वैदिक-पौराणिक और बौद्ध धार्मिक परंपराओं के साथ इस्लाम और इसके विस्तार में सूफीमत की परंपराएँ भी प्रभावकारी और कुछ हद तक वर्चस्वकारी हैसियत में मौजूद थीं। कबीर (1398-1515 ई.) और दादू (1544-1603 ई.) का प्रभाव यहाँ बहुत व्यापक था, लेकिन ये परंपराएं पहले से मौजूद धर्म और भक्ति की परंपराओं से अंतःक्रियाओं के साथ विकसित हुईं। पहले से मौजूद सिद्ध-नाथों की परंपराएँ कहीं स्वतंत्र, तो कहीं वैष्णव और अन्य स्थानीय परंपराओं के साथ अंतःक्रियाओं से आगे बढ़ीं। गोरख़नाथ (ईसा की 10वीं सदी), कबीर और दादू की परंपराओं ने इस्लाम, सूफ़ी और वैष्णव परंपराओं के साथ अंतःक्रिया के बाद नये रूप धारण किए, जिससे सिख, बिश्नोई, जसनाथी, लालदासी, निरंजनी, बाबालाली, सीतारामीय, धामी, सत्तनामी, दरियादासी आदि नये संप्रदाय अस्तित्व में आए। यहाँ पहले से मौजूद रामानंद की परंपरा रामस्नेही संप्रदाय और वैष्णव कृष्णभक्ति की परंपरा चरणदास के शुक संप्रदाय में रूपांतरित हुईं।
कबीर के बाद कबीरपंथ की एकाधिक शाखाएँ हो गईं, जिनमें काशी, छत्तीसगढी और धनौती ख़ासतौर पर प्रसिद्ध हैं। कबीर के शिष्य सुरतगोपाल, धर्मदास और भगवान् गोसाईं ने कबीर की वाणियों की अपनी-अपनी अलग-अलग व्याख्याएँ कीं। कबीरबीजक के एकाधिक भाष्य लिखे गए, जिनमें रामरहसदास का पंचग्रंथी, पूरन साहिब का त्रिज्या और निर्णयसार प्रसिद्ध हैं। इन ग्रंथों में कबीर की वाणियों का वैदांत और औपनिषदिक धारणाओं के साथ साम्य स्थापित किया गया है। कबीरपंथ का यह अलग-अलग तरह से विस्तार भक्ति की पौराणिक परंपराओं के साथ अंतःक्रियाओं से हुआ। कबीर के मत को संप्रदाय और सिद्धांत का रूप देने के लिए उसको पौराणिक स्वरूप में ढालने के कई उपक्रम हुए। धर्मगीता, शन्य पुराण, अनुराग सागर, कबीर मंन्शूर जैसे ग्रंथों की रचना इसी प्रयोजन से हुईं। इन रचनाओं में सष्टि के विकास का क्रम आंशिक रूपांतर के साथ वही है, जो वैष्णव या पौराणिक ग्रंथों में मिलता है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, लक्ष्मी, समुद्र मंथन, सत्ययुग, त्रेता, द्वापर आदि इनमें भी आ गए हैं।[25] कबीरपंथ की छत्तीसगढ़ी शाखा में ‘चौकाविधि’ आदि कर्मकांडीयविधान भी आ गए हैं, जिन पर बौद्ध तांत्रिकविधान का प्रभाव साफ़ दिखता है। ‘जोतप्रसाद’ जैसे कर्मकांडीय प्रावधान भी इन मतों में सम्मिलित कर लिए गए, जिन पर हिंदू और बौद्ध धार्मिक परंपराओं का प्रभाव है।[26] पंथों में मान्य कर्मकांडीय विधानों की नयी-नयी व्याखाएँ की गईं। बौद्ध जातकों की तरह कबीरपंथ में कई रचनाएँ हुईं, जिनमें कबीर को अलग-अलग युगों में अलग-अलग अवतार लेते हुए दिखाया गया है। पौराणिक सिद्धांतों के साथ अंतःक्रिया से ‘पारखपद’ की नयी अवधारणा विकसित हुईं। कहते हैं कि दादूदयाल रामानंद के शिष्य सुरसुरानंद की परंपरा में थे।[27] यह भी मान जाता है कि वे कबीर की ही परंपरा में थे और कमाल के शिष्य थे। दादू ने अपने जीवनकाल में ही ब्रह्म संप्रदाय की स्थापना की। दादू पर सूफ़ियों का गहरा प्रभाव पड़ा। ताराचंद के अनुसार यह इसलिए हुआ, क्योंकि दादू के गुरु कमाल इस्लाम और सूफ़ीमत के अधिक निकट थे।[28] दादू अशिक्षित थे, लेकिन शास्त्र के प्रति कबीर की तरह उनके यहाँ अस्वीकृति का भाव नहीं है। दादू के कई योग्य शिष्य हुए, जिनमें रज्जब (1567-1689 ई.) और सुंदरदास (1596-1689 ई.) प्रसिद्ध हैं। इनमें से सुंदरदास शास्त्रज्ञ और प्रकांड विद्वान् थे और उनकी शिक्षा काशी में हुई थी। दादू के बाद उनके संप्रदाय की खालसा, खाकी, नागा, उत्तराढ़ी और विरक्त नामक उपसंप्रदाय बन गए।
सिख संप्रदाय पर कबीर आदि संतों की वाणियों का गहरा प्रभाव था, लेकिन इसकी उत्पत्ति और विकास में इस्लाम और सूफ़ीमत की कुछ परंपराओं का भी योग था। सिख धर्म के प्रर्वतक गुरु नानक (1469-1539 ई.) थे। उन्होंने एक नये, समावेशी और उदार धर्म की बुनियाद रखी, जो उनके समय में तो लोकप्रिय हुआ ही और बाद में भी इसका पल्ल्वन और विस्तार हुआ। नानक को ‘पवित्रात्माओं का राजा’, ‘हिन्दुओं का गुरु’ और ‘मुसलमानों का पीर’ कहा जाता है। मध्यकाल में गुरु नानक जैसी स्वीकार्यता और मान्यता और किसी भी संत-भक्त को नहीं मिली। वे ऐसे धर्म और पंथ के प्रवर्तक थे, जिसके विचार व्यवहार में भी आए और इनसे लाखों लोगों के जीवन की पद्धति बदल गई। गुरु नानक विचार के साथ व्यवहार में भी संत थे। उन्होंने जो कहा, इस तरह कहा कि वह लाखों लोगों के आचरण में सम्मिलित हो गया। यह कहा जाता है कि उनकी शिक्षाएँ अपने समय के संतों के विचारों का समन्वय या संश्लेषण है, लेकिन इनमें उनका अपना मौलिक बहुत है। उन्होंने धर्म-प्रचार के लिए दूरस्थ स्थानों की यात्राएँ कीं। उनको अपनी वाणी और उसके व्यवहार के लिए खाद-पानी तत्कालीन पंजाब से मिला, जो उस समय बाह्य विचारों के प्रवेश का द्वार था। बाहय विचारों के खाद से पंजाब के जनसाधारण की उर्वर मनोभूमि ने उनके सामवेशी और उदार विचारों को उगने-बढ़ने का अवसर दिया। सिख धर्म का बाद में स्थानीय ज़रूरतों की तहत विस्तार और पल्लवन हुआ। मुग़ल शासकों के अत्याचारों और धर्मान्धता के कारण छठे गुरु हरगोविंद (1595-1644 ई.) के समय इसमें सामरिकता का प्रवेश हुआ गुरु गोविंदसिंह (1666-1708 ई.) के समय खालसा के रूप में इसमें सामरिकता पूरी तरह मान्य हो गई।
बिस्नोई और जसनाथी संप्रदाय भी अपने से पहले और अपने समय की कई धार्मिक परंपराओं के समवन्य हैं। बिस्नोई संप्रदाय की बुनियाद जाँभोजी (1451-1536 ई.) ने रखी। यह कबीर से प्रभावित या उससे प्रेरित संप्रदाय नहीं है, जैसा कि परशुराम चतुर्वेदी ने माना है।[29] जाँभोजी का यह धर्म कई तरह की अंतःक्रियाओं से बना हुआ है। उन्होंने नाथपंथ से तत्त्वज्ञान और योगसाधना ली और अपने समय के प्रचलित हिंदू धर्म की कुछ अच्छी बातों को अपनाया। नाथ पंथियों की पारिभाषिक शब्दावली- देहभेद, योगाभ्यास, घटतत्त्व आदि उनके यहाँ मिलती हैं। नाथपंथ से इसका सीधा संबंध तो है- इसकी भाषा में नाथों की सांध्यभाषा की परंपरा मिलती है। जाँभोजी एक जगह कहते हैं –
“धवणा धूजै पाहण पूजै, बे फरमाई खुदाई।
गुरु चेले कै पाए लागै, देखो लोग अन्याई॥”[30]
हिदुओं के कुछ कर्मकांड जैसे अमावस्या को व्रत रखना, घी से हवन करना भी जाँभोजी के यहाँ भी मिलते हैं। उन्होंने 20 और नौ मतलब 29 आचार-विचार के नियम रखे, जिससे उनका मत बिस्नोई कहलाया। हीरालाल माहेश्वरी ने इसीलिए लिखा है कि “श्री परशुराम चतुर्वेदी ने कबीर द्वारा प्रस्तुत किए गए वातावरण में अपने मत की मूल धारणाएँ निश्चित करने वालों में जाँभोजी का भी नाम लिया है, लेकिन यह ठीक नहीं है।”[31] जसनाथ (1482- 1506 ई.) और उनके संप्रदाय का सीधा संबंध नाथपंथ से है, लेकिन इसमें भी भक्ति और धर्म के कई दूसरे रूपों का समावेश है। यह योग और भक्ति का मिला-जुला रूप बन गया है। संप्रदाय के 16 नियम हैं, जिनकी अनुपालना आवश्यक मानी जाती है। जलम झूलरो, सिद्धजी रो सिरलोको और सिंधुभड़ों का इसमें बहुत महत्त्व है। ये तीनों गेय रचनाएँ हैं, जिनमें से आरंभिक दो में जसनाथ का यशवर्णन और तीसरी में भगवत्महिमा और गोरखनाथ की महिमा का वर्णन है। संप्रदाय में हवन की प्रथा है, जिसमें इन रचनाओं का पाठ आवश्यक है। जसनाथी संप्रदाय पर आंशिक प्रभाव इस्लाम का भी है। जसनाथ की रचनाओं में उल्लेख है कि “हम दरवेश निरंजन जोगी, जुग जुग रा अगवाणी।”[32] जसनाथियों का अग्निनृत्य प्रसिद्ध है, जिसमें इस पंथ के अनुयायी आग जलाकर उसके अंगारों पर नृत्य करते हैं। बिश्नोई और जसनाथ कबीर से नहीं, सीधे नाथपंथ से संबंधित संप्रदाय हैं। यह अलग बात है इन संप्रदायों ने अपने समय के कुछ हिन्दू धार्मिक कर्मकांड और धारणाएँ भी बनाए रखीं। हीरालाल माहेश्वरी ने दोनों मतों में अंतर्निहित प्रेरणाओं पर विचार कर निष्कर्ष निकाला है -
“जाँभोजी और जसनाथ की साधना के मूल प्रेरणा-स्रोत भी गोरखनाथ और नाथपंथ ही है। प्रकारांतर से इनकी वाणी भी वही है, जो गोरखनाथ की है। यौगिक क्रियाओं की पारिभाषिक शब्दावली और विषयवस्तु भी प्रायः वही है, पर कहने ढंग उनका अपना है। जो कुछ भी उन्होंने कहा, उसको अपने जीवन में उतार कर ही कहा और गुरु उन्होंने गोरखनाथ को माना ही है। यही नहीं, जसनाथी और बिश्नोई संप्रदायों में गोरखनाथजी ने सदेह प्रकट होकर, उनके प्रवर्तकों ज्ञान देने और शिष्य बनाने की कथा सत्य ही मानी जाती है। ऐतिहासिक दृष्टि से भले ही इसमें सच्चाई न हो, तथापि इससे इन दोनों का सिद्धों और गोरखनाथ और नाथपंथ से सीधे प्रेरणा ग्रहण करना तो सिद्ध होता ही है। अतः जाँभोजी और जसनाथ पर कबीर का प्रभाव देखना उचित प्रतीत नहीं होता।”[33]
सत्तनामी संप्रदाय पुराना संपदाय है, लेकिन स्थानीय ज़रूरतों के तहत इसमें कई रूपांतरण हुए हैं। सत्तनामी संप्रदाय की शुरुआत के संबंध में कोई बहुत प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती। यह संप्रदाय दाराशिकोह के पक्ष में औरंगज़ेब (1658-1707 ई.) के विरुद्ध विद्रोह (1672-73 ई.) के लिए चर्चा में आया। ऊदादास, वीरभान और जोगीदास के नाम इसके आविर्भाव के साथ जोड़े जाते हैं। डब्ल्यू.एल. एलिसन ने इसका संबंध साध संप्रदाय से भी जोड़ा है।[34] पीतांबरदत्त बर्थवाल मानते हैं कि इसकी शुरुआत दादूपंथी जगजीवनदास (1670-1818) ने की।[35] संप्रदाय की तीन शाखाएँ- नारनौल, कोटवा और छतीसगढी हैं। नारनौल शाखा के चार शिष्य ‘चारपावा’ (दूलनदास, देवीदास, गोसाईंदास और खेमदास) के नाम से प्रसिद्ध हुए। आरंभ में इस मत का विश्वास ईश्वर के निर्गुण स्वरूप में था, लेकिन ‘चारपावा’ की रचनाओं से लगता है कि धीरे-धीरे इस पर वैष्णवमत और उसकी धारणाओं का प्रभाव होने लग गया। दूलनदास की रचनाओं पर सूफ़ियों का गहरा प्रभाव है।[36] यह ऐसा मत-संप्रदाय था, जो किसी सुनिश्चित सैद्धांतिंकी और एक प्रवर्तक के नहीं होने के कारण स्थानीय ज़रूरतों के अनुसार बदलता रहा। छत्तीसगढ़ में गुरु घासीदास (1770-1850 ई.) ने इसको अपने आनुयायियों की ज़रूरतों के अनुसार पूरी तरह बदल दिया।
6.
वैष्णव भक्ति-चेतना के भी अपने समय में प्रचलित और भक्तिरूपों के साथ अंतःक्रिया से कई रूपांतरण हुए। वल्लभ, रामानंदी, निंबार्क, राधावल्लभ आदि संप्रदायों का तो उत्तर भारत में व्यापक प्रसार था ही, अंतःक्रियाओं से इनके कुछ नये रूप भी समाने आए। शुक या चरणदासी और रानस्नेही संप्रदाय इनमें से विशेष रूप से लोकप्रिय हुए। चरणदास (1703-1782 ई.) अपने समय के विख्यात और लोकप्रिय संत थे और उन्होंने अपने जीवनकाल में चरणदासी संप्रदाय को सांस्थानिक स्वरूप दे दिया था। चरणदास अपना संबंध सीधा शुकदेव मुनि से जोड़ते हैं। कहते हैं कि पाँच वर्ष की अवस्था में शुकदेव मुनि ने उनको अपनी गोद में लिया और 19 वर्ष की अवस्था में उनको दीक्षा देकर अपना शिष्य बना लिया। यह उल्लेख चरणदास ने ख़ुद किया है। उन्होंने ज्ञानस्वरोदय के अंत में लिखा है कि “डेहरे में मम जन्म नाम रणजीत बखानो। / मुरली को सुत जान जात दूसर पहिचानो। / बाल अवस्था माहिं बहुरि दिल्ली आयो। / रमत मिले शुकदेव नाम चरणदास धरायो।”[37] चरणदास की शिष्या सहजोबाई ने भी लिखा है कि “दादा गुरु सुकदेवजी, पूरण बिस्वाबीस।”[38] दीक्षोपरांत चरणदास ने दीर्घकाल तक तीर्थाटन किया। वे बहुत समय तक ब्रजमंडल में भी रहे, जहाँ उन पर भागवतपुराण का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा और वे कृष्णभक्त हो गए। अंततः देशाटन से विरत होकर उन्होंने दिल्ली को अपना स्थायी निवास बना लिया। यहाँ रहकर उन्होंने 14 वर्ष तक योगाभ्यास किया। अब तक वे अपना मत भी स्थिर कर चुके थे, इसलिए उन्होंने इसको चरणदासी संप्रदाय के रूप में सांस्थानिक रूप दिया। अपने मत के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होंने अपने शिष्यों के नेतृत्व में गद्दियाँ स्थापित कीं। उनके संप्रदाय और मत के 52 शिष्य और 52 शाखाएँ मानी जाती हैं। उनके शिष्यों में रामरूप, जुगतानंद, सहजोबाई, दयाबाई आदि ने अपने गुरु के उपदेशों और विचारों का प्रचार-प्रसार किया। चरणदास ने वर्षों तक देशाटन, स्वाध्याय और साधना करने के बाद अपना, जो मत स्थिर किया, वह मध्यकालीन प्रचलित मत-मतांतरों से कुछ हद तक अलग था। मध्यकालीन संप्रदायों में कही योग तो, कहीं भक्ति, तो कहीं ज्ञान का आग्रह था, लेकिन चरणदास ने अच्छी तरह से सोच-समझकर इन तीनों के समन्वय और संश्लेषण के आधार पर अपने मत की बुनियाद रखी। रामस्नेहीपंथ निर्ग़ुण और सगुण भक्तिरूपों का समन्वय है। यह संप्रदाय अपना आदि आचार्य रामानुजाचार्य का मानता है, जिसमें आगे चलकर रामानंद, अग्रदास आदि हुए। संप्रदाय का लक्ष्य निर्गुण-निराकार श्रीराम का इष्ट रखना और उन्हीं के निर्लेप, निरंजन, परमेश्वर रूप की पराभक्ति से उपासना करना है। वेद, श्रुति, स्मृति, शास्त्र पुराण आदि ग्रथों का प्रचार-प्रसार भी इस मत का उद्देश्य है।[39] राजस्थान में इस मत की तीन शाखाएँ- शाहपुरा, रैण और खेड़ापा है। इन शाखाओं के विश्वास और धारणाएँ लगभग एक हैं, लेकिन इनके प्रवर्तक आचार्य अलग-अलग हैं।
7.
रामानंद द्वारा प्रचारित भक्ति ने उत्तर भारत में आगे जाकर कई रूप धारण किए। तुलसी रामभक्ति का उत्कर्ष थे, लेकिन उनकी रामभक्ति वैधी भक्ति थी। तुलसी के समय माधुर्य भाव की कृष्णभक्ति भी अपने कई रूपों के साथ अपने चरम पर थी। चैतन्य का गौड़ीय संप्रदाय इन सबमें सबसे आगे भी था और पर्याप्त लोकप्रिय भी था। तुलसीदास स्वयं भी माधुर्य भाव की कृष्णभक्ति से प्रभावित थे। गीतावली के उत्तरकांड वे कृष्णभक्त कवियों की तरह माधुर्य भाव की भक्ति से प्रभावित लगते हैं। आगे चलकर माधुर्य भाव की भक्ति व्यापक और गहरा प्रभाव रामभक्ति परंपरा पर दिखायी पड़ता है। यह प्रभाव रामानंद की चौथी पीढ़ी में दिखायी पड़ने लग गया। कृष्णदास पयहारी के शिष्य अग्रदास के यहाँ रामभक्ति में माधुर्य भाव आ गया है। आगे चलकर भक्ति की दोनों परंपराओं में अंतःक्रियाएँ तेज़ होती गईं और इससे राम की माधुर्य भाव की भक्ति पर एकाग्र संप्रदाय- तत्सुखी और स्वसुखी अस्तित्व में आए। चैतन्य की भक्ति में स्त्री या गोपी भाव प्रमुख था इसलिए आगे चलकर राम को प्रसन्न करने के लिए उनकी स्त्री भाव से उपासना शुरू हुई। चैतन्य संप्रदाय की भक्ति के स्त्री भाव से आगे जाकर इन रामभक्तों ने स्त्रीवेश भी धारण कर किए। ये संप्रदाय अपनी राम की माधुर्य भाव की भक्ति के लिए लोमेसंहिता, भुशुंडि रामायण और महारासोत्सव जैसे ग्रंथों से अपनी धारणाओं की पुष्टि करते थे। इन ग्रंथों में राम की कई रासलीलाओं का वर्णन है। इनके अनुसार रामावतार में राम ने 99 रास किए, केवल एक बाकी रह गया था, जो उन्होंने कृष्ण्वतार में पूरा किया। उन्होंने रामभक्ति की पूरी परंपरा का समाहार भी अपने भीतर कर लिया। उनके अनुसार रामानंद और तुलसीदास भी इसी भाव के उपासक थे। वे मानते थे कि स्वामी रामानंद के आत्मरूप नाम ‘रामानंददायिनी’ और तुलसीदास का आत्मरूप नाम ‘तुलसीसहचरीजी’ था। उनके अनुसार उनके संप्रदाय के आदि प्रवर्तक हनुमान के आत्मरूप शरीर का नाम ‘चारुशीला’ था।[40] रामायण के विख्यात टीकाकार रामचरणदास स्वसुखी संप्रदाय के प्रवर्तक थे। अनकी दृष्टांतबोधिका, कवितावली, रामायण, रामचरित, रसमालिका आदि कई रचनाएँ मिलती हैं। तत्सुखी संप्रदाय के प्रवर्तक जीवाराम का भक्तनाम ‘युगलप्रिया’ था और इनकी दो रचनाएँ पदावली और अष्टयाम मिलती हैं।
8.
भक्ति-चेतना में अंतःक्रियाएँ दक्षिण में भी हुई। दक्षिण में आलवार और नायनार भक्तों और उनका साहित्य जनसाधारण में बहुत लोकप्रिय था। दक्षिण और उत्तर में इस साहित्य का गहरा और व्यापक प्रभाव हुआ और यह आज भी निरंतर है। स्थानीय ज़रूरतों के अनुसार इसमें समय-समय पर रूपांतर भी हुए। आलवारों संत-भक्तों की सक्रियता दक्षिण में पाँचवीं शताब्दी से मानी जाती है। आलवार 12 हैं और उनकी रचनाएँ नालायिरदिव्यप्रबंधम् में संकलित है। शैवमत दक्षिण में बहुत प्रचीनकाल से है। नायनार शैवभक्तों का मार्ग भी प्रेम का मार्ग था। नायनारों के संख्या 63 मानी जाती है, जिनकी रचनाएँ तिरुमरई में संकलित हैं। नायनारों को अपने समय के बहुत प्रभावशाली राजाओं महेंद्र वर्मन (600-630 ई.) आदि बहुत प्रभावशाली शासको का राज्याश्रय मिला। महेंद्र वर्मन शैव होने से पहले जैन था। पांड्य राजाओं (560 -1300 ई.) ने भी नायनारों को बहुत प्रोत्साहन दिया। विख्यात नयनार संत अप्पर भी नयनार शैवमत में दीक्षित होने से पहले जैन थे। आलवार और नायनार दोनों मत एक-दूसरे से भी प्रभावित हुए और इन्होंने जैन और बौद्ध धर्म से भी कई बातें ग्रहण कीं। मलिक मोहम्मद ने अपने दक्षिण भारतीय वैष्णव भक्ति-आंदोलन के अध्ययन में इस प्रभाव को लक्ष्य किया है। उन्होंने लिखा है -
“इसमें संदेह नहीं कि आलवारों और नायनारों ने अपने युग की माँग को ध्यान में रखकर बौद्ध और जैन धर्मों से बहुत-सी बातें ग्रहण कीं। लेकिन उन्होंने भक्तिमार्ग को आकर्षक और लोकप्रिय रूप देने के निमित्त ही केवल उन तत्त्वों को ग्रहण किया, जिनको वे ग्राहय समझते थे। (आलवारों और नायनारों ने बौद्धों और जैनों की अनेक बुराइयों का खंडन भी किया है।) हम इन वैष्णवभक्तों और शैवसंतों को सुधारवादी आंदोलन का उन्नायक ही समझते हैं, जिन्होनें अपने युग की माँग के अनुसार परंपरागत भक्ति को एक नया रूप दिया। इसी में इनकी मौलिक देन है।”[41]
ताराचंद ने भी इसकी पुष्टि की है, लेकिन उन्होंने इन संत-भक्तों की अपनी कई मौलिकताओं की अनदेखी की है। उन्होंने अतिरिक्त उत्साह में जो लिखा, वह पूरी तरह मान्य नहीं है। आलवारों और नायनारों की कुछ परंपराएँ तमिल में बहुत पहले से हैं, जिनकी ओर ताराचंद ने आँख मूँद ली है। ताराचंद ने लिखा है -
“क्योंकि उन्होंने बौद्ध धर्म से उसकी भक्ति, संसार की क्षणभंगुरता की भावना, मानवीय मूल्यहीनता की उसकी धारणाएँ, इच्छाओं का दमन और तप, साथ ही उसके कर्मकांड, मूर्तियों और स्तूपों या लिंगों, मंदिरों, तीर्थयात्राओं, व्रतों और मठवासी नियमों की पूजा और सभी जातियों की आध्यात्मिक समानता के उसके विचार ग्रहण किए; जैन धर्म से उन्होंने उसका नैतिक स्वर और पशुजीवन के प्रति उसका सम्मान ग्रहण किया। इन विचारों को पौराणिक धर्मशास्त्र में आत्मसात करना और समग्रता में ताज़ा मानवीय भावना को व्याप्त करना तमिल भूमि के संत भजन-निर्माताओं, प्रसिद्ध आदियार (शैव संत) और आलवर संतों की उपलब्धि थी, जो सातवीं और बारहवीं शताब्दियों के बीच फले-फूले।”[42]
दक्षिण में शैवमत का एक रूप शरण या वीरशैव मत में मिलता है। दक्षिण का यह प्रभावशाली वीर शैवमत इन अंतःक्रियाओं का ही नतीज़ा है। वीरशैव मत के प्रभाव का मुख्य क्षेत्र कर्नाटक है, लेकिन इसका प्रभाव इसके पड़ोसी राज्यों- तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, केरल, महाराष्ट्र आदि में भी है। वीरशैव मत की शुरुआत के संबंध में अभी अनिश्चय है, लेकिन इतना तय है कि शैवपूजा भारतीय सभ्यता में बहुत प्राचीन है और यह अपने समय और समाज की ज़रूरतों के अनुसार बदलती भी रही है। वीरशैव मत के लोग ‘परा-शिव’ को अपना आराध्य और अल्लमप्रभुदेव को उनका अवतार मानते हैं। वीरशैव मत के व्यापक प्रसार का श्रेय बसवन्ना (1131-1196 ई.) को दिया जाता है, जो अपने समय के बड़े संत-भक्त थे। बसवन्ना कलचुरी वंश के राजा बिज्जल (1156-57 ई.) के मंत्री थे। वीरशैव मत तीर्थयात्रा, उपवास, यज्ञ, जातिभेद आदि का विरोधी है। इसमें बाल-विवाह वर्जित और विधवा-विवाह मान्य है। शव को गाड़ने, श्राद्ध आदि नहीं करने और पुनर्जन्म में विश्वास नहीं करने के कारण ताराचंद सहित कुछ विद्वानों की धारणा है कि यह इस्लाम से प्रभावित मत है। उनका मानना है कि इस्लाम का प्रवेश सबसे पहले दक्षिण में काम्बे-किलोन में हुआ, जहाँ से यह शैव मतावलंबियों तक पहुँचा और इस कारण उनकी धारणाओं में रद्दोबदल हुए।[43] यह धारणा निराधार है। रामधारीसिंह दिनकर सहित कई विद्वान् इसको ख़ारिज कर चुके हैं। दरअसल यह भ्रांति ‘अल्लम’ शब्द से हुई है। कन्नड में ‘अल्लम’ का अर्थ ‘अल्लाह’ नहीं, ‘लिंगायत’ अथवा ‘वीरशैव संत’ है और ‘वीर’ का अर्थ ‘उग्र व्यक्ति’ अथवा ‘युद्धवीर’ है।[44] अल्लम भी बसवन्ना के समकालीन संत-भक्त थे। उनकी वाणी कन्नड़ भाषा में मिलती है। वीरशैव मत के साहित्य की सभी धारणाएँ वेदों और आगमों से आती है, इसमें हिंदू के अलावा और किसी धर्म उल्लेख नहीं है और इसमें अरबी-फ़ारसी भाषा का कोई शब्द प्रयुक्त नहीं हुआ है। इसी तरह इसके मानने वाले मांसाहार नहीं करते हैं और इनके आचार-विचार भी बहुत पवित्र और शुद्ध हैं, इसलिए इसका संबंध इस्लाम से जोड़ना किसी भी तरह से युक्तिसंगत नहीं है। वीरशैवों के यहाँ जो उग्रता है, यह कैसे आई यह तय करना बहुत मुश्किल काम है। संभवतया यह इस मत में बहुत पहले से विद्यमान रही हो या स्थानीय ज़रूरतों से इसका समावेश इस मत में हुआ हो। रामधारीसिंह दिनकर के शब्दों में “यह सामान्य शैव धर्म का अति विकास है।”[45] स्थानीय गाहर्स्थ्य और संन्यास की हिंदू धार्मिक परंपराओं में अंतःक्रिया से इसमें कई रूपांतरण हुए होंगे। रामधारीसिंह दिनकर ने लिखा है -
“संन्यास शैव धर्म की आत्यंतिक साधना का सोपान है। इसलिए, उसके कितने ही आचरण प्राचीनकाल से, गृहस्थों के आचरण से भिन्न रहे हैं। वीरशैवों ने उग्र साधना के लिए संन्यास को गार्हस्थ्य में पचा लिया।”[46]
भारतीय भक्ति-चेतना का विकास और व्यापक प्रसार इसके विभिन्न रूपों में अंतःक्रियाओं से हुआ। भारत में सांस्कृतिक वैविध्य बहुत है, इसलिए भक्ति-चेतना का प्रसार भी इस वैविध्य के अनुसार हुआ। वैदिक-पौराणिक, बौद्ध, सिद्ध-नाथ, लोकायत, भागवत और पंचरात्र धर्म और इस्लाम-सूफ़ी भक्ति परंपराओं में परस्पर अंतःक्रियाओं से धर्म और भक्ति के नये रूप समाने आए। धर्म और भक्ति-चेतना ने क्षेत्र विशेष की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक ज़रूरतों के अनुसार भी अपने को रूपांतरित कर नए रूप धारण कर लिए। पंजाब में सिख, महाराष्ट्र में वारकरी, छत्तीसगढ में सत्तनामी और दक्षिण में वीरशैव जैसे प्रभावकारी मत-संप्रदाय इसी तरह अस्तित्व में आए। भक्ति का कोई रूप निरंतर एकरूप कभी नहीं रहा। यह जिस क्षेत्र में गया, वहाँ पहले से मौजूद धर्म और भक्ति के रूपों के साथ अंतःक्रिया से बदल गया। ओड़िशा में पंचसखा, बंगाल में बाउल और उतरी-पश्चिमी भारत में शुक (चरणदासी) संपदाय इसी तरह बने-बदले। भक्ति कोई रूप कभी ख़त्म नहीं हुआ- अंतःक्रियाओं से इसका नया रूप बन गया, लेकिन इसक पहलेवाला रूप भी ज़ारी रहा। राजस्थान में प्रचलित बिश्नोई और जसनाथी संप्रदायों में स्थानीय वैष्णव परंपराओं के साथ अतःक्रियाओं के बावजूद सदियों से गोरखनाथ की परंपराएँ भी जीवित हैं।
संदर्भ और टिप्पणियाँ:
[1] सुवीरा जायसवाल, वैष्णव धर्म का उद्भव और विकास, ग्रंथ शिल्पी, तीसरा संस्करण 2005, पृ. 172
[2] वही, पृ. 171
[3] हज़ारीप्रसाद द्विवेदी, हिंदी साहित्य: उद्भव और विकास, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023 (मूल संस्करण 1956), पृ. 70
[4] पीतांबरदत्त बर्थवाल, ‘स्वामी राघवानंद और सिद्धांतपंचमात्रा’, योग प्रवाह, काशी विद्यापीठ, वाराणसी, 1945, पृ. 1-14
[5] “रामानंद जी घरु १ ੴ सितगुर प्रसादि ॥ कत जाईऐ रे घर लागो रंगु ॥ मेरा चितु चलै मनु भइओ पंगु ॥१॥ रहाउ ॥ एक दिवस मन भई उमंग ॥ घिस चंदन चोआ बहु सुगंध ॥ पूजन चाली ब्रहम ठाइ ॥ सो ब्रहमु बताइओ गुर मन ही माहि ॥१॥ जहा जाईऐ तह जल पखान ॥ तू पूरि रिहओ है सभ समान ॥ बेद पुरान सभ देखे जोइ ॥ ऊहां तउ जाईऐ जउ ईहां न होइ ॥२॥ सितगुर मै बिलहारी तोर ॥ जिनि सकल बिकल भ्रम काटे मोर ॥ रामानंद सुआमी रमत ब्रहम ॥ गुर का सबदु काटै कोटि करम ॥३॥१॥” - गुरुग्रंथसाहिब, पन्ना, 1195
[6] “गांगेय मृत्यु गंज्यो नहीं, त्यों कील्ह करन बस कालबश ॥ रामचरण चिंतवनि, रहति निशिदिन लौ लागी ।
सरवभूत शिर निमित्त, सूर बहनांद बहागी ॥ सांख्य योग, मत सुदृढ़ कियो अनुभव हस्तामल । ब्रह्म रंध्र करि गौन बह्ये हरि तन करनी बल सुमेरदेव सुत जग बिदित भू बिस्तारयौ बिमल यश । गांगेय मृत्यु गंज्यो नहीं, त्यों कील्ह करन बस कालबश ॥” 40 (174) नाभादास, भक्तमाल (प्रियादासजी प्रणीत टीका-कवित्त सहित, संपा. भगवान्प्रसाद रूपकला, तेज कुमार बुक डिपो, लखनऊ, 2011, पृ. 309
[7] श्यामसुंदरदास, ‘रामावत संप्रदाय’, नागरी प्रचारिणी पत्रिका, https://sufinama.org/articles/nagari-pracharini-patrika-articles-65?lang=hi
[8] परशुराम चतुर्वेदी, वैष्णवधर्म, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2008, पृ. 117
[9] मोबिन जहोरोद्दीन, भक्ति, भाषा और पॉलिमिक्स, सेतु प्रकाशन, दिल्ली, 2022, पृ. 12
[10] प्रभात मुखर्जी द्वारा दी हिस्ट्री ऑफ़ मिडीवल वैष्णविज़्म इन ओड़ीसा (आर. चटर्जी, कलकत्ता, 1940) में पृ. 20 पर उद्धृत
[11] बलदेव उपाध्याय, भागवत धर्म, नागरी प्रचारिणी सभा, काशी, 1953, पृ. 535
[12] प्रभात मुखर्जी, दी हिस्ट्री ऑफ़ मिडीवल वैष्णविज़्म इन ओड़ीसा, पृ.112
[13] मुहम्मद अब्दुल शाह, ‘मरमी कवि लालन शाह’, लालन शाह-साधना और साहित्य, संपा. रामेश्वर मिश्र, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2021, पृ. 59
[14] उपेंद्रनाथ भट्टाचार्य, बाँग्लार बाउल ओ बाउल गान, ओरियंट बुक कंपनी, कोलकाता, पाँचवाँ संस्करण, 2019, पृ. 30
[15] वही, पृ. 127
[16] जेने ओपनशॉ, सीकिंग बाउल्स ऑफ़ बंगाल, केम्ब्रिज युनिवर्सिटी प्रेस, नयी दिल्ली, 2002, पृ. 169
[17] माधव हाड़ा, ललद्यद (कालजयी कवि और उनका काव्य), राजपाल एंड सन्ज़, दिल्ली, 2024 पृ. 14
[18] रंजीत होसकोटे, आई, लला- दी पोयम्स ऑफ़ ललदेद, पेंग्विन बुक्स, गुड़गाँव, 2011, पृ. xxix
[19] वही, पृ. xxix
[20] जयालाल कौल, लल द्यद, साहित्य अकादेमी, 1980, पृ. 4
[21] आर. के परिमु, हिस्ट्री ऑफ़ मुस्लिम रूल इन कश्मीर, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, 1969, पृ. 104
[22] आर.सी. टेंपल, दी वर्ड ऑफ़ लला, गुलशन बुक्स, रेजीडेंसी रोड, श्रीनगर, 2005 (प्रथम संस्करण 1924), पृ. 1
[23] जयालाल कौल, लल द्यद, पृ. 4
[24] जयालाल कौल द्वारा लल द्यद में पृ. 20 पर उद्धृत
[25] देखिए, धर्मदास, अनुराग सागर, वेंकटेश्वर प्रेस, मुंबई, 1927
[26] परशुराम चतुर्वेदी, उत्तरी भारत की संत-काव्य परंपरा, भारती भंडार, प्रयाग, 1951, पृ. 281
[27] हज़ारीप्रसाद द्विवेदी, हिंदी साहित्य: उद्भव और विकास, पृ. 72
[28] ताराचंद, इनफ्लुएन्स ऑफ इस्लाम ऑन इडियन कल्चर, इंडियन प्रेस, इलाहाबाद, 1936, पृ. 184
[29] परशुराम चतुर्वेदी, उत्तरी भारत की संत-काव्य परंपरा, पृ. 370
[30] जाँभोजी,श्रीजंभगीता, प्रकाशक स्वामी भोलाराम महंत, ग्राम पीपलगट्टा, होशंगाबाद, 1925, पृ. 274
[31] हीरालाल माहेश्वरी, राजस्थानी भाषा और साहित्य, आधुनिक पुस्तक सदन, कलकत्ता, 1960, पृ. 277
[32] सिद्ध चरित्र, संपा. सूर्यकरण पारीख, सिद्ध साहित्य-शोध संस्थान, रतनगढ़ 1957, पृ. 99
[33] वही, पृ. 274
[34] डब्ल्यू.एल. एलिसन, दी साध्स- रिलिजियस लाइफ़ ऑफ़ इंडिया, वाई.एम.सी.ए. पब्लिशिंग हाउस, कलकत्ता,1935, पृ. 14
[35] पीतांबरदत्त बर्थवाल, हिंदी काव्य में निर्गुण संप्रदाय, अंग्रेज़ी से अनुवाद परशुराम चतुर्वेदी, अवध पब्लिशिंग हाउस, लखनऊ, 1950, पृ. 81
[36] देखिए, दूलनदास की बानी, बेल्वेडियर प्रेस, इलाहाबाद, 1931
[37] श्यामचरण दास, भक्ति सागर ग्रंथ, रामकुमार प्रेस, लखनऊ, 1951, पृ. 150
[38] सहजोबाई, सहजप्रकाश, बेलवेडियर प्रेस, प्रयाग, 1915, पृ. 1
[39] मोतीलाल मेनारिया, राजस्थान का पिंगल साहित्य, हितैषी पुस्तक भंडार, उदयपुर, 1952, पृ, 201
[40] हज़ारीप्रसाद द्विवेदी, हिंदी सहित्य का उद्भव एवं विकास, पृ. 139
[41] मलिक मोहम्मद, वैष्णव भक्ति आंदोलन का अध्ययन, राजपाल एंड संज़, दिल्ली, 1971, पृ. 99
[42] ताराचंद, इनफ्लुएन्स ऑफ़ इस्लाम ऑन इंडियन कल्चर, पृ. 86-87
[43] वही, पृ. 133
[44] किट्टेल फर्डिनेंड, किट्टेल्स कन्नड़-अंग्रेजी डिक्सनरी, मद्रास युनिवर्सिटी, 1968-1971, पृ. 18 एवं 99
[45] रामधारीसिंह दिनकर, संस्कृति के चार अध्याय, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2012, पृ. 267
[46] वही, पृ. 267




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