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साक्षात्कार । INTERVIEWS

निरंतरता भारतीय चेतना क स्वभाव है । माधव हाड़ा से पल्लव का संवाद

​सम्मुख । 05 फरवरी, 2026

हिंदी के अकादमिक और बौद्धिक जगत में इधर जिन विद्वानों ने निरन्तर अपने गंभीर लेखन कार्य से ध्यान आकृष्ट किया है उनमें प्रो माधव हाड़ा अग्रगण्य हैं। उदयपुर के मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष रहे प्रो हाड़ा ने अपना शोध कार्य समकालीन कविता पर किया था। विगत डेढ़ दो दशकों से वे पहले मीरां और तदन्तर मध्यकालीन भक्ति साहित्य में ऐसे तल्लीन हुए कि इस क्षेत्र में कुछ ही वर्षों में उनके द्वारा लिखित और सम्पादित पुस्तकों की संख्या लगभग तीन दर्जन हो गई। ‘पचरंग चोला पहन सखी री’  शीर्षक से आई उनकी मीरां विषयक आलोचना कृति से उनकी नयी शुरुआत हुई। कालजयी कवि और उनका काव्य पुस्तक शृंखला में ही उनकी 22 पुस्तकें आ चुकी हैं जो अत्यंत लोकप्रिय रही हैं। इस शृंखला में वे किसी प्रसिद्ध और मान्य भारतीय कवि की प्रतिनिधि कविताओं को प्रस्तुत करते हैं और उन कविताओं को (यदि पाठक चाहे) समझने के लिए कठिन शब्दों के अर्थ इत्यादि भी देते हैं। सबके ख़ास बात इन पुस्तकों की भूमिका है जिनमें प्रो हाड़ा उस कवि के समय, समाज और कवि कर्म का गंभीर विश्लेषण करते हैं जो किसी भी पाठक के लिए अत्यंत उपयोगी होता है। इस शृंखला में अब तक अमीर खुसरो,  विद्यापति, कबीर, तुलसीदास, रहीम, सूरदास, मीराँबाई, सहजोबाई, बुल्लेशाह, रसखान, लालन शाह फ़कीर, जायसी जैसे वरेण्य कवियों को प्रस्तुत कर चुके हैं। पिछले दिनों आपने ‘भक्ति अगाध अनंत’ शीर्षक से भारतीय भक्ति कविता का एक वृहदाकार संकलन भी तैयार किया जिसकी अत्यंत सराहना हुई। प्रस्तुत है उनसे शिक्षक -आलोचक पल्लव की बातचीत

पद्मिनी प्रकरण-1 । माधव हाड़ा से विजयबहादुर सिंह की बातचीत

​समालोचन । 6 जुलाई, 2023

 

मध्यकालीन साहित्य और उसके इतिहास पर आधारित आलोचक माधव हाड़ा की इधर कई पुस्तकें और महत्वपूर्ण आलेख प्रकाशित हुए हैं. ‘पद्मिनी : इतिहास और कथा-काव्य की जुगलबंदी’ उनका शोध कार्य है जिसे भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला ने हाल ही में प्रकाशित किया है. सर्वांग सुंदर स्त्री पुरुष-मनोजगत की ऐसी कामना रही है जिसने मृत्यु के पश्चात भी उसका पीछा नहीं छोड़ा है. क्या ‘पद्मिनी’ ऐसी ही कोई रति-कल्पना है. पद्मिनी की कथा का क्या कोई ऐतिहासिक आधार भी है? जैसे प्रश्नों पर प्रतिष्ठित आलोचक विजयबहादुर सिंह ने यह बातचीत माधव हाड़ा से की है. यह अकादमिक संवाद है इसलिए अवसरानुकूल तथ्य भी दिए गये हैं.

पद्मिनी प्रकरण-2 । माधव हाड़ा से विजयबहादुर सिंह की बातचीत

​समालोचन । 10 सितंबर, 2023

 

मध्यकालीन साहित्य और उसके इतिहास पर आधारित आलोचक माधव हाड़ा की इधर कई पुस्तकें और महत्वपूर्ण आलेख प्रकाशित हुए हैं. ‘पद्मिनी : इतिहास और कथा-काव्य की जुगलबंदी’ उनका शोध कार्य है जिसे भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला ने हाल ही में प्रकाशित किया है. सर्वांग सुंदर स्त्री पुरुष-मनोजगत की ऐसी कामना रही है जिसने मृत्यु के पश्चात भी उसका पीछा नहीं छोड़ा है. क्या ‘पद्मिनी’ ऐसी ही कोई रति-कल्पना है. पद्मिनी की कथा का क्या कोई ऐतिहासिक आधार भी है? जैसे प्रश्नों पर प्रतिष्ठित आलोचक विजयबहादुर सिंह ने यह बातचीत माधव हाड़ा से की है. यह अकादमिक संवाद है इसलिए अवसरानुकूल तथ्य भी दिए गये हैं.साहित्य इतिहास में संवेदना का निवेश करता है. उसे समकालीन बनाने की उसकी कोशिश रहती है. इतिहास में रत्नसेन और पद्मावत के अस्तित्व को लेकर भले ही संशय हो. साहित्य ने उन्हें जीवित रखा है. इस पूरे प्रकरण को लेकर मध्यकालीन साहित्य के विद्वान माधव हाड़ा और वरिष्ठ आलोचक विजय बहादुर सिंह की बातचीत के इस दूसरे भाग में आप साहित्य और इतिहास की गझिन पारस्परिकता को देखेंगे. प्रस्तुत है.

परंपरा की जगह कभी-कभी खूँटे ले लेते हैं

माधव हाड़ा  से पीयूष पुष्पम् का संवाद। पाठ। सं. देवांशु। जुलाई-सितंबर, 2024

 

हिंदी में जैसा चलन है सभी शुरुआत आधुनिक से ही करते हैं, मैंने भी वही किया, लेकिन बाद में महसूस होने लगा कि हमें अपने अतीत और विरासत को पहले समझना चाहिए। हिंदी भारतीय मध्यवर्गीय जनसाधारण की ख़ास बात यह है कि अतीत को लेकर उसमें गर्व का भाव तो बहुत है, गाहे-बगाहे वह इसका आग्रह भी बहुत उग्र प्रतिबद्धता के साथ करता है, लेकिन इसकी सार-सँभाल और पहचान की कोई सजगता उसमें नहीं है।वह अपने अतीत को अच्छी और पूरी तरह जानता ही नहीं है। स्वस्थ समाज की स्मृति हमेशा बहुत सघन और मुखर होती है। महात्मा गांधी, रबींद्रनाथ ठाकुर आदि इस बात को जानते थे, इसलिए उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन की एक प्रवृत्ति के रूप भारतीय साहित्य और ज्ञान के पुनरुत्थान की मुहिम शुरू की।

इतिहास को,लेकर हमारा नज़रिया अभी भी औपनिवेशिक है

माधव हाड़ा  से असीम अग्रवाल की बातचीत। नया ज्ञानोदय ।  जुलाई-सितंबर, 2023

 

मीरां का प्रचारित जीवन, उसके असल जीवन से अलग और बाहर, गढ़ा हुआ है। गढ़ने का यह काम शताब्दियों तक निरंतर कई लोगों ने कई तरह से किया है और यह आज भी जारी है। मीरां के अपने जीवनकाल में ही यह काम शुरू हो गया था। उसके साहस और स्वेच्छाचार के इर्द-गिर्द लोक ने कई कहानियाँ गढ़ डाली थीं। बाद में धार्मिक आख्यानकारों ने अपने ढंग से इन कहानियों को नया रूप देकर लिपिबद्ध कर दिया। इन आरंभिक कहानियों में यथार्थ और सच्चाई के संकेत भी थे, लेकिन समय बीतने के साथ धीरे-धीरे इनकी चमक धुँधली पड़ती गई। मीरां के जीवन में प्रेम, रोमांस और रहस्य के तत्त्वों ने उपनिवेशकालीन यूरोपीय इतिहासकारों को भी आकृष्ट किया। उन्होंने उसके सम्बन्ध में प्रचारित प्रेम, रोमांस और रहस्य के तत्त्वों को कहानी का रूप देकर मनचाहा विस्तार दिया। ऐसा करने में उनके साम्राज्यवादी स्वार्थ भी थे। आज़ादी के बाद मीरां के संबंध में कई नई जानकारियाँ सामने आईं, लेकिन कुछ उसके विवाह आदि से संबंधित कुछ नई तथ्यात्मक जानकारियाँ जोड़ने के अलावा उसकी पारंपरिक छवि में कोई रद्दोबदल नहीं हुआ। पुस्तक 'वैदहिऔखदजाणै' के प्रकाशन केअवसर पर लेखक माधव हाड़ा का साक्षात्कार

© 2016 by Madhav Hada

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