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Madhav Hada is a distinguished literary critic and academic. His primary areas of interest include medieval literature.
मुनि जिनविजय | Muni Jinvijay

साहित्य अकादेमी, नयी दिल्ल्ली

संस्करण 2016, मूल्य रु. 50ISBN 978-81-260-5180-9

परिचय | Introduction

मुनि जिनविजय साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली की 'भारतीय साहित्य के निर्माता' शृंखला के अंतर्गत प्रकाशित विनिबंध है। प्राचीन भारतीय साहित्य के अन्वेषी और संपादक-पाठालोचक मुनि जिनविजय आज़ादी के आंदोलन की एक प्रवृत्ति के रूप में भारतीय ज्ञान और साहित्य की पहचान और पुनरुत्थान की महात्मा गाँधी की मुहिम में जुटे प्रकांड विद्वानों मे से एक थे।

 

ज्ञानार्जन के लिए अपने आरंभिक जीवन में उन्होंने कई रूप की और वेश धारण किए। महात्मा गाँधी के आग्रह पर अपने साधुजीवन की बँधी हुई दिनचर्या छोड़ दी और प्राचीन साहित्य के अनुसंधान और संपादन-पाठालोचन के काम में जुट गए। उन्होंने प्राचीन ग्रंथागारों में बंद 200 से अधिक ग्रंथों का संपादन, पाठालोचन और प्रकाशन किया। ये ग्रथ उनकी सिंघी जैनग्रंथमाला, राजस्थान पुरातन ग्रंथमाला आदि गमें प्रकाशित हुए और इनसे भारतीय साहित्य के नयी और समृद्ध पहचान बनी। उनका अन्वेषित साहित्य हिंदी भाषा और साहित्य की प्रवृत्तियों की बुनियाद की तरह था। इससे प्राचीन भारतीय इतिहास के भी नए पहलू सामने आए।

 

काशीप्रसाद जायसवाल, हीरानंद शास्त्री, हजारीप्रसाद द्विवेदी, गौरीशंकर हीराचंद ओझा, राहुल सांकृत्यायन आदि कई विद्वानों ने उनके अन्वेषित साहित्य का उपयोग किया।

 

गुजरात पुरातत्त्व विद्यामंदिर, भारतीय विद्या भवन, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, शांतिनिकेतन की जैन विद्यापीठ, भांडारकर ओरियंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट आदि कई शीर्ष सांस्कृतिक संस्थाओं से उनका जुड़ाव रहा। देशसेवा के लिए उन्होंने राजस्थान के चंदेरिया (जिला चित्तौड़गढ़) में सर्वोदय साधना आश्रम स्थापित किया। जर्मन ओरियंटल रिसर्च सोसायटी ने में उनको उनकी प्राच्यज्ञान संबंधी विद्वता और कार्यों के लिए अपनी मानद सदस्यता प्रदान की और भारत सरकार ने उनको पद्मश्री से सम्मानित किया।

समीक्षाएँ | Reviews

मुनि जिनविजय की कीर्ति गाथा | बनास जन |  दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

 

साहित्य अकादेमी की ‘भारतीय साहित्य के निर्माता’ श्रंखला  के अंतर्गत विश्रुत विद्वान मुनि जिनविजय के जीवन और उनके साहित्यिक अवदान पर केंद्रित माधव हाड़ा का यह विनिबंध एक बहुत बड़ी आवश्यकता की पूर्ति करता है. 27 जनवरी, 1889 को भीलवाड़ा ज़िले के रूपाहेली गांव में किशनसिंह  नाम से जन्मे और बाद में मुनि जिनविजय के रूप में जाने गए इस विद्वान की जीवन गाथा जितनी रोमांचक और रोचक है उतना ही वैविध्यपूर्ण है उनका साहित्य कर्म. महात्मा गांधी के आग्रह पर साधु जीवन की बंधी हुई दिनचर्या को त्याग कर भारतीय ज्ञान और साहित्य के अन्वेषण, संशोधन-संपादन  और प्रकाशन में रत हो जाने वाले मुनि जी ने अपने जीवन में जितना काम कर लिया, उसे देखकर सहज विश्वास कर पाना कठिन है कि एक व्यक्ति यह सब कर सका होगा. अफ़सोस की बात यह कि भारतीय साहित्य के इस मनीषी के बारे में बहुत कम जानकारियां उपलब्ध हैं. अपनी दो आत्मकथाओं जिनविजय जीवन-कथा और मेरी जीवन प्रपंच  कथा में उन्होंने अपने जीवन के प्रारंभिक इक्कीस वर्षों के जीवन का वृत्तांत लिखा है और जिनविजय जीवन कथा की भूमिका में बाद की जीवन यात्रा का संक्षिप्त और सांकेतिक वर्णन...........

© 2016 by Madhav Hada

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