पचरग चोला पहर सखी री | Pachrang Chola Pahar Sakhi Ri

पचरंग चोला पहर सखी री

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संस्करण 2015, ISBN 978-93-5072-925-0, मूल्य : रु. 375

परिचय

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मीरां की कविता को सदियों तक लोक ने अपने सुख-दुःख और भावनाओं की अभिव्यक्ति के माध्यम की तरह बरता इसलिए यह धीरे-धीरे ऐसी हो गई कि सभी को उसमें अपने लिए जगह और गुंजाइश नजर आने लगी और इससे सांचों-खांचों में काट-बांट कर अपनी-अपनी मीरांएं गढ़ने का सिलसिला शुरू हो गया। धार्मिक आख्यानकार केवल उसकी भक्ति पर ठहर गए, जबकि उपनिवेशकालीन इतिहासकारों ने उसके जीवन को अपने हिसाब से प्रेम, रोमांस और रहस्य का आख्यान बना दिया। वामपंथियों ने केवल उसकी सत्ता से नाराजगी और विद्रोह को देखा, तो स्त्रीविमर्शकारों ने अपने को केवल उसके साहस और स्वेच्छाचार तक सीमित कर लिया। इस उठापटक और अपनी-अपनी मीरां गढ़ने की कवायद में मीरां का वह स्त्री अनुभव और संघर्ष अनदेखा रह गया जो उसकी कविता में बहुत मुखर है और जिसके  संकेत उससे संबंधित आख्यानों, लोक स्मृतियों और इतिहास में भी मौज़ूद  हैं।

पचरंग चोला पहर सखी री  में  मीरां के  छवि निर्माण की प्रक्रियाओं को समझने के साथ विभिन्न स्रोतों में उपलब्ध उसके स्त्री अनुभव और संघर्ष के संकेतों की पहचान और विस्तार का प्रयास है। मीरां इतिहास, आख्यान, लोक और कविता में से किसी एक में नहीं है-वह इन सभी में है, इसलिए उसकी खोज और पहचान में यहां इन सभी ने गवाही दी है। मीरां का स्वर हाशिए का नही, उसके अपने जीवंत और गतिशील समाज का सामान्य स्वर है। यह वह समाज है जो मीरां को होने के लिए जगह तो देता ही है, उसको सदियों तक अपनी स्मृति और सिर-माथे पर भी रखता है।

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यहां पहली बार इस समाज की अपने ढंग की नयी पहचान भी है और खास बात यह है कि इस पहचान में कोई औपनिवेशिक, वामपंथी और अस्मिता विमर्शी सांचा-खांचा और आग्रह नहीं है। यहां इस समाज की पहचान में निर्भरता दैनंदिन जीवन व्यवहारों और अपने देश भाषा स्रोतों पर है।इस किताब का स्वाद अलग और नया है। हिन्दी की पारंपरिक ठोस-ठस आलोचना से अलग इतिहास, आलोचना और आख्यान के मिलेजुले आस्वाद वाली यह किताब उपन्यास की तरह रोचक और  पठनीय है और ख़ास बात यह कि इसे कहीं से भी पढ़ा जा सकता है । उम्मीद की जा सकती है कि मीरां के जीवन और समाज को सर्वथा नए ढब और ढंग से खोजती यह किताब हिन्दी आलोचना के लिए एक नया प्रस्थान बिंदु सिद्ध होगी।

सम्मतियाँ
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          ''इसमें कोई शक नहीं कि मीरां पर बहुत से लोगों ने लिखा, लेकिन माधव हाड़ा ने मीरा के जीवन, संघर्ष और सृजन तीनों पर व्याख्या दी है। मीरां के विषय पर अनेक संकलन छपे हैं, जिसमें सिर्फ मीरां की भक्ति की छवि उभरती है। इस छवि को तोड़ने के लिए तथ्यों के साथ एक पूरी की पूरी किताब माधव हाड़ा ने लिखी है।''

- प्रो. नामवर सिंह (सबद निरंतर, दूरदर्शन )

          ''अभी एक किताब आयी है माधव हाड़ा की ‘पचरंग चोला पहर सखी री’, इसको पढ़ा है, कल इसकी चर्चा करूंगा. मीरां पर उन्होंने ये अद्भुत किताब लिखी है।"

- प्रो. नामवर सिंह (प्रभात खबर)

          '' देशभाषा स्रोतों और व्यवहारों को गंभीरता से पढ़ते हुए माधव हाड़ा जिन निष्कर्षों पर पहुंचते हैं, वे विचारोत्तेजक तो हैं ही, इस बात को रेखांकित भी करते हैं कि भक्ति के संदर्भ में 'लाइन लंबी फंडे गोल' प्रकार की पालिटिकल लाइनबाजियों से मुक्त हो कर ही मतलब की बात की जा सकती है... इस किताब पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए।"

-प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल (फेसबुक)

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समीक्षाएँ
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