top of page
Search


अब तो पार उतरना है
मुक्ताबाई की कविताओं का भाव रूपांतर बनास जन । 68। जनवरी-मार्च, 2026 मुक्ताबाई का जन्म 1279 ई. पैठन जिले के अपेगाँव में एक देशस्थ ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता विट्ठलपंत कुलकर्णी अपनी परिवार के परंपरा के अनुसार वेदों के विद्वान् अध्येता थे। उनकी माँ का नाम रुक्मिणीबाई था। कुलकर्णी दंपती की तीन अन्य संतानें- निवृत्तिनाथ, ज्ञानदेव और सोपानदेव मुक्ताबाई से बड़ी थीं। मुक्ताबाई को भी अपने माता-पिता और भाइयों के साथ ब्राह्मणों की उपेक्षा और प्रताड़ना झेलती पड़ी। दरअसल उनके पिता ने

Madhav Hada
4 days ago9 min read


पद्मिनी: इतिहास और कथा-काव्य की जुगलबंदी
समीक्षालेख । बी एल भादानी । सामाजिकी । अक्टूबर-दिसंबर, 2025, अंक- 1 माधव हाड़ा द्वारा लिखित सद्य प्रकाशित कृति ‘पद्मिनी: इतिहास और कथा-काव्य की जुगलबंदी’ एक अद्वितीय शोधपूर्ण रचना है। उनकी यह रचना पद्मिनी-रत्नसेन पर उपलब्ध सम्पूर्ण ऐतिहासिक साहित्य (काव्य एवं गद्य) का विवेचनापूर्ण अध्ययन है, जो निश्चित ही उनकी गहन शोध दृष्टि का परिचायक है। इस ग्रन्थ में साहित्य एवं इतिहास में उनकी चहलकदमी अत्यंत दिलचस्प है एवं पाठक के मन में जिज्ञासा जागृत करने वाली है। उन्होंने इस अध्ययन को

Madhav Hada
Nov 30, 202511 min read


भारतीय भक्ति-चेतना : पार्थिव चिंताएँ एवं सरोकार
तद्भव । अंक - 51 भारतीय भक्ति-चेतना में केवल लोकोत्तर सरोकार और चिंताएँ नहीं है, इसमें पार्थिव सरोकार और चिंता भी है। यह व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक और कुछ हद तक राजनीतिक चेतना भी है। भारतीय परंपरा में उपनिवेशकाल से पहले तक ‘धर्म’ शब्द बहुत व्यापक अर्थ में प्रयुक्त होता था। मध्यकाल और उससे पहले तक अधिकांश सामाजिक-राजनीतिक-गतिविधियाँ धर्म के दायरे के भीतर ही होती थीं। किसी भी सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक गतिविधि की सामाजिक स्वीकार्यता लिए उसका धर्म के दायरे में होना ज़रूरी था।

Madhav Hada
Nov 6, 202523 min read
bottom of page
