top of page
Search


कृष्ण । राममनोहर लोहिया
कृष्ण की सभी चीजें दो हैं : दो माँ, दो बाप, दो नगर, दो प्रेमिकाएँ या यों कहिए अनेक। जो चीज संसारी अर्थ में बाद की या स्वीकृत या सामाजिक है, वह असली से भी श्रेष्ठ और अधिक प्रिय हो गई है। यों कृष्ण देवकीनन्दन भी हैं, लेकिन यशोदानन्दन अधिक। ऐसे लोग मिल सकते हैं जो कृष्ण की असली माँ, पेट-माँ का नाम न जानते हों, लेकिन बाद वाली दूध वाली, यशोदा का नाम न जानने वाला कोई निराला ही होगा। उसी तरह, वसुदेव कुछ हारे हुए से हैं, और नन्द को असली बाप से कुछ बढ़कर ही रुतबा मिल गया है। द्वारका औ

Madhav Hada
Mar 2315 min read


भारतीय भक्ति-चेतना : अंतःक्रियाएँ और रूपांतरण
नागरीप्रचारिणीपत्रिका । पुंनर्नवांक : 1 । 2026 भारतीय भक्ति-चेतना के विकास में इसमें होने वाली अंतःक्रियाओं का बहुत महत्त्व है। भारतीय भक्ति-चेतना की कोई प्रवृत्ति, धारा और रूप अपने आरंभ से लगाकर अपने उत्कर्ष तक एकरूप और एकरैखिक कभी नहीं रहे। इन अंतःक्रियाओं के कारण इसमें प्रतिरोध, समाहार, आत्मसातीकरण, समन्वय, एकीकरण जैसी प्रक्रियाएँ चलती रहीं। भक्ति-चेतना के विकास को समझने के लिए इन अंतःक्रियाओं और इनके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक प्रेरकों की पहचान और समझ बहुत ज़रूरी है। अभी तक भा

Madhav Hada
Feb 2528 min read


अब तो पार उतरना है
मुक्ताबाई की कविताओं का भाव रूपांतर बनास जन । 68। जनवरी-मार्च, 2026 मुक्ताबाई का जन्म 1279 ई. पैठन जिले के अपेगाँव में एक देशस्थ ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता विट्ठलपंत कुलकर्णी अपनी परिवार के परंपरा के अनुसार वेदों के विद्वान् अध्येता थे। उनकी माँ का नाम रुक्मिणीबाई था। कुलकर्णी दंपती की तीन अन्य संतानें- निवृत्तिनाथ, ज्ञानदेव और सोपानदेव मुक्ताबाई से बड़ी थीं। मुक्ताबाई को भी अपने माता-पिता और भाइयों के साथ ब्राह्मणों की उपेक्षा और प्रताड़ना झेलती पड़ी। दरअसल उनके पिता ने

Madhav Hada
Feb 89 min read
bottom of page
