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भक्ति के दिक्-काल और सरहदीकरण से आगे
यवनिका तिवारी । तद्भव- 52 वैदहि ओखद जाणै, पद्विनी : इतिहास और कथा-काव्य की जुगलबंदी और अब सद्य: प्रकाशित भक्ति अगाथ अनंत समेत अन्य बहुत-से मोरचों पर आलोचक माधव हाड़ा औपनिवेशिक ज्ञानकाण्ड को चुनौती देते दीखते हैं। भक्ति-साहित्य या भक्ति प्रधान चेतना भारतीय साहित्य के इतिहास की एक मुसलसल प्रकिया है पर पश्चिमी विद्वत्ता के दृष्टिदोष ने भक्ति-चेतना को यादृच्छिकता की हद तक कालबद्ध किया है और इस प्रकार भक्ति-साहित्य की देशजता, परम्पराजीविता, स्मृतिजीविता आदि बहुत-से ठेठ गुणों को झ
यवनिका तिवारी
May 2610 min read


यह वियोग का ही है शोक
रवीन्द्रनाथ ठाकुर (1861-1941 ई.) भारतीय साहित्य का सबसे महत्त्वपूर्ण और चर्चित व्यक्तित्व हैं। उन्होंने कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक आदि सभी विधाओं में लिखा और संगीत और चित्रकला को भी समृद्ध किया। उनका विचारात्मक और आलोचनात्मक लेखन भी प्रचुर मात्रा में है। शांति निकेतन शिक्षा के क्षेत्र उनके नवाचार का साक्ष्य है। उन्होंने अपनी रचना, चिंतन, कर्म और असाधारण व्यक्तित्व से आने वाली कई पीढ़ियों को प्रभावित किया और आज भी वे कई लोगों के आदर्श हैं। उन्हें पश्चिम में पूर्व का एक महान् र

Madhav Hada
May 99 min read


कृष्ण । राममनोहर लोहिया
कृष्ण की सभी चीजें दो हैं : दो माँ, दो बाप, दो नगर, दो प्रेमिकाएँ या यों कहिए अनेक। जो चीज संसारी अर्थ में बाद की या स्वीकृत या सामाजिक है, वह असली से भी श्रेष्ठ और अधिक प्रिय हो गई है। यों कृष्ण देवकीनन्दन भी हैं, लेकिन यशोदानन्दन अधिक। ऐसे लोग मिल सकते हैं जो कृष्ण की असली माँ, पेट-माँ का नाम न जानते हों, लेकिन बाद वाली दूध वाली, यशोदा का नाम न जानने वाला कोई निराला ही होगा। उसी तरह, वसुदेव कुछ हारे हुए से हैं, और नन्द को असली बाप से कुछ बढ़कर ही रुतबा मिल गया है। द्वारका औ

Madhav Hada
Mar 2315 min read
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