Kaljayi Kavi aur Unaka Kavya (4) | कालजयी कवि और उनका काव्य (4)
कालजयी कवि और उनका काव्य
राजपाल एंड संज़, मदरसा रोड़ दिल्ली
विद्यापति । 2026 । मूल्य : रु. 215 | ISBN 978-9349162181
मैथिल कोकिल के नाम से विख्यात विद्यापति (1350-1448 ई.) तुलसीदास के बाद उत्तरभारत में सबसे अधिक लोकप्रिय कवि और भक्त हैं। उनकी रचनाएँ मैथिली में हैं, लेकिन आनंद कुमारस्वामी ने उन्हें ‘बंगाली साहित्य का जनक’ कहा है। बंगाली वैष्णव भक्तों- चंडीदास (1370-1430 ई.) और चैतन्य (1486-1535 ई.) ने राधा और कृष्ण के बारे में विद्यापति के प्रेम पदों को वैष्णव भजनों के रूप में अपनाया। रवींद्रनाथ ठाकुर (1861-1941 ई.) भी विद्यापति से प्रभावित थे। उन्होंने विद्यापति को ‘उल्लास का कवि’ कहा है। विद्यापति के आश्रयदाता शिवसिंह ने उन्हें जयदेव का अवतार मानते थे- उन्होंने विद्यापति को ‘अभिनव जयदेव’ उपाधि दी। श्यामसुन्दर दास (1875-1945 ई.) के अनुसार विद्यापति हिन्दी के वैष्णव साहित्य के प्रथम कवि हैं। विद्यापति की ख़ास बात यह है कि वे शृंगारी, भक्त और प्रशस्तिकार एक साथ हैं। विद्यापति आग्रहपूर्वक राज्याश्रित कवि थे, लेकिन उनकी लोकप्रियता जनसाधारण में भी बहुत है। उनका शृंगार वर्णन आश्रयदाताओं की प्रसन्नता और मनोरंजन के लिए है, लेकिन यह जनसाधारण को भी बहुत प्रिय है और सदियों से निरंतर उसकी स्मृति में है। उनकी रचनाओं के राधा-माधव अलौकिक और सामान्य नायक-नायिका, दोनों हैं। उनकी पद रचनाएँ मिथिला में विवाहोत्सवों में गाई जाती हैं और बंगाल में भक्ति रचनाओं की तरह कीर्तन में भी सम्मिलित की जाती हैं। उनकी पद रचनाएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी मिथिला की स्त्रियों का भी कंठहार है। उनकी शिव और गंगा-स्तुतियाँ मिथिला (तिरहुत) में बहुत लोकप्रिय हैं। विख्यात मध्यकालीन इतिहासकार अबुल फ़ज़ल (1551-1602 ई.) ने अपनी किताब आइन-ए-अकबरी में विदयापति के नचारी गीतों की लोकप्रियता का उल्लेख किया है। विद्यापति भारतीय साहित्य के असाधारण उदाहरण हैं, जिनकी रचनाओं में अभिजात और लोक एक-दूसरे में घुल-मिल गए हैं। उनके व्यक्तित्व को शिवप्रसाद सिंह ने इसीलिए ‘परस्पर विरोधी विचारधराओं का स्तबक’ कहा है। विद्यापति ने अपने कुछ पदों में अपने दैन्य की अतिशयता का कारुणिक चित्रण करके स्तुत्य देवता से कृपा की याचना की है। ऐसे पदों के आधार पर कुछ विद्वानों का मानना है कि शुरू में विद्यापति शृंगारिक थे, बाद में वे भक्त हो गए।
विद्यापति की शृंगारिक पद रचनाएँ जयदेव (बारहवीं सदी), गोवर्धनाचार्य (बारहवीं सदी), ज्योतिरीश्वर ठाकुर (1260-1340 ई.) आदि की समृद्ध शृंगार काव्य परंपरा में हैं। उन्होंने शिव और पार्वती के प्रेम और शिव की प्रार्थना के पद भी लिखे। उनकी राजप्रशस्तिविषयक एकाधिक रचनाएँ संस्कृत में हैं और ये उत्तरी भारत के इतिहास को जानने-समझने के आधारभूत स्रोत की तरह इस्तेमाल होती हैं। विद्यापति की पद रचनाओं के माधुर्य ने मैथिली को सरस और मधुर भाषा में ढाल दिया। सदियों तक मिथिला, बंगाल आदि क्षेत्रों के जनसाधारण के श्रुत-स्मृत में रहने में कारण उनकी रचनाओं के एकाधिक रूपांतर हैं और उनमें भाषायी वैविध्य भी पर्याप्त है। विद्यापति के काव्य में भारतीय साहित्य की एकाधिक परंपराओं के प्रस्थान भी हैं। संस्कृत के बरक्स देशभाषाओं को उन्होंने सम्मान प्रदान किया- उनकी उक्ति 'देसिल बयना सब जन मिट्ठा' देशभाषाओं में कहने-लिखने वालों में आत्मसमान का आधार है।
बिहारी। 2026 । मूल्य : रु. 215 | ISBN 978-9349162426
उत्तरमध्यकालीन कवियों में बिहारी सर्वोपरि हैं। वे मध्यकाल के साहित्य रसिकों में बहुत लोकप्रिय हुए। उनकी लोकप्रियता का आधार उनकी रचना बिहारी सतसई है। यह ऐसी रचना है, जिसकी मध्यकाल और उसके बाद में कई प्रतियाँ हुईं और कई टीकाएँ लिखी गईं। रामचंद्र शुक्ल ने इसके संबंध में लिखा है कि “शृंगार ग्रंथों में जितनी ख्याति और मान बिहारी सतसई का हुआ, उतना और किसी का नहीं।” बिहारी अपने असाधारण काव्यशिल्प के लिए विख्यात हैं। उनके दोहों के संबंध में यह उक्ति प्रसिद्ध है कि “सतसैया के दोहरे, ज्यौ नाविक के तीर। / देखन में छोटे लगत, घाव करैं गंभीर।” उनके टीकाकारों ने उनके काव्य सौष्ठव की जमकर सराहना की है। सतसई की प्रति करने वाले एक कवि-विद्वान् ने लिखा है कि “जानि बिहारी दोहरे, ज्यों हीरा की तौल। / मोल माँह बहु देखियै रूप माँह अहि तौल।” एक और कवि-प्रतिकार ने उनके संबंध में लिखा है कि “ब्रजभाषा बरनी कबिनु बहुविधि बुद्धि विसाल। / सबको भूषण सतसया करी बिहारीदास।” बिहारी की रचनाओं में स्त्री-पुरुष के ऐहिक प्रेम व्यापार और सौंदर्य का वर्णन है। भारतीय साहित्य में ऐहिक प्रेम व्यापार की कविता की बहुत समृद्ध परंपरा है। उसमें स्त्री-पुरुष की कामुकता की कई तरह से पहचान और वर्गीकरण है। हाल कृत गाथासप्तशती, अमरुक कृत शृंगारशतक, गोवर्धन कृत आर्यासप्तशती आदि की यह परंपरा मध्यकाल में भी जारी रही। बिहारी की रचनाएँ में इसी परंपरा में हैं। ऐहिक प्रेम के वर्णन की इस परंपरा में नायक-नायिका की जगह राधा-कृष्ण के नामोल्लेख की परंपरा भी बहुत प्राचीन है। बिहारी ने भी नायक-नायिका की जगह कई बार राधा-कृष्ण का नामोल्लेख किया है। बिहारी की रचनाओं के नायक-नायिका प्रेम व्यापार की मनोदशाओं को व्यक्त करने में किसी अन्तर्बाधा से ग्रस्त नहीं हैं। बिहारी नें आग्रहपूर्वक ‘परकीया प्रेम’ को ख़ास महत्त्व दिया गया है। उनका मनोयोग भी परकीया प्रेम में अधिक है। बिहारी आग्रहपूर्वक शास्त्रसिद्ध कवि हैं। वे ऐहिक प्रेम व्यापार से संबंधित पारंपरिक शास्त्र- नायिका भेद, निख-शिख, अलंकार, रस आदि के ज्ञाता थे और इसका बहुत कुशलतापूर्वक अंतर्नियोजन उनकी रचनाओं में मिलता है। यह अलग बात है कि उन्होंने अपनी रचनाओं को शास्त्रानुसार वर्गीकृत या व्यवस्थित नहीं किया। बिहारी की रचनाओं के आस्वाद के लिए यह शास्त्रज्ञान अपेक्षित है। हज़ारीप्रसाद द्विवेदी ने सही लक्ष्य किया है कि “जो प्राचीन साहित्य की ख़बर नहीं रखता और काव्यशास्त्र की तत्काल प्रचलित मान्यताओं को नहीं जानता, वह बिहारी सतसई का अच्छा विद्यार्थी नहीं हो सकता।” यह अवश्य है कि शास्त्र पर निर्भरता के बावजूद बिहारी ने “दुनिया को अपनी आँखों से देखने का कार्य बंद नहीं किया था।” बिहारी के यहाँ परलोक की चिंता भी कहीं-कहीं में आती है। सतसई की शुरुआत ही ‘भवबाधा’ से मुक्ति की चिंता से हुई है, लेकिन उनकी चिंता संत-भक्तों से अलग, संसार में आकंठ डूबे एक मनुष्य की चिंता है।
आंडाल । 2025। मूल्य : रु. 215 | ISBN 978-9349162112
बारह आलावरों में से एक आंडाल (आठवीं सदी) दक्षिण भारत की सबसे अधिक लोकप्रिय संत-भक्त कवयित्री हैं। ‘आंडाल’ शब्द ‘आलवार’ अर्थात् वह जो शासन करता है का स्त्रीलिंग रूप है, जिसका अर्थ ‘वह जो शासन करती है’। कहते हैं कि भगवान् आंडाल के अधीन थे- वे उसकी इच्छा और रुचि का सम्मान करते थे। वे दक्षिण भारत में इतनी लोकप्रिय हैं कि मार्गशीर्ष माह में उनकी रचना तिरुप्पावै घर-घर में गाई जाती हैं। वे साक्षात् लक्ष्मी और भूमिपुत्री के रूप में विख्यात हैं। आलवार संप्रदाय में उन्हें ‘शूडिक् कोडुत नाच्चियार’ ‘आमुक्तमाल्यदा’ भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है वह देवी जिसकी पहनी हुई पुष्पमाला भगवान् को अर्पित की गई। वे वाटिका में पुष्पों के बीच मिली थी, इसीलिए उन्हें ‘कौदे’ या ‘गोदा’ भी कहा जाता है, जिसका अर्थ पुष्पों का गुच्छा है।
आंडाल की रचनाएँ पति और प्रिय के रूप में भगवान् श्रीनारायण की कामना, उनसे विरह और संयोग की कामना पर आधारित हैं। उनकी रचनाओं के प्रेम और विरह की ऐंद्रिकता अपने चरम पर है। आंडाल ने अपने नगर श्रीविल्लिपुत्तूर को वृंदावन, वहाँ के देव वटपत्रशायी भगवान् श्रीनारायण को श्रीकृष्ण और अपने साथ अपनी सखियों को गोपियाँ मान लिया है। आंडाल की रचनाएँ रामानुजाचार्य (1017-1137 ई.) के विशिष्टाद्वैतवाद की सैद्धांतिकी का आधार हैं। आंडाल की तिरुप्पावै उनकी प्रिय रचनाओं में से थी। वे इसको डूबकर से गाते थे, इसलिए उनका नाम ‘तिरुप्पावैजियर्’ प्रसिद्ध हो गया, जिसका अर्थ तिरुप्पावै से प्रभावित संन्यासी है।
रामानुज संप्रदाय में आंडाल की मान्यता बहुत है। विशिष्टाद्वैतवाद के विख्यात मनीषी आचार्य वेदांत देशिक (1268-1369 ई.) उनसे प्रभावित थे। उन्होंने आंडाल की स्तुति में गोदास्तुति नामक कृति की रचना की। दक्षिण में उनकी लोकप्रियता का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि विजयनगर के शासक कृष्णदेवराय (1471-1529 ई.) ने उनकी स्तुति में आमुक्त माल्यदा की रचना की। आंडाल की दो रचनाएँ तिरुप्पावै और नाच्चियार तिरुमोलि आलवारों की रचनाओं के विख्यात संचयन नालायिर दिव्य प्रबंधम् में सम्मिलित हैं।
आंडाल की रचनाओं का प्रस्तुत चयन मूल तमिल के हिंदी अनुवादों पर आधारित भावरूपांतर है।
नामदेव । 2025। मूल्य : रु. 115 | ISBN 978-9349162273
नामदेव (1270-1350 ई.) मध्यकाल के पहले और सबसे अधिक मान्य और पूज्य संत-भक्त और कवि हैं। वे मध्य, पश्चिमी और उत्तरी भारत के उन आरंभिक संत-भक्तों में से एक हैं, जिनकी विरासत आधुनिक महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, उत्तरी भारत और पंजाब के क्षेत्रों में फैली। वे गुरु नानक (1469-1539 ई.) और कबीर (1398-1515 ई.) से लगभग डेढ़-दो शताब्दी पहले हुए। उनके संबंध में सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि उनका जन्म महाराष्ट्र में हुआ, लेकिन उनकी लोकप्रियता और मान्यता महाराष्ट्र के साथ मध्यकाल में पंजाब में भी थी। पंजाब में उनकी लोकप्रियता का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि उनकी वाणी को गुरुग्रंथसाहिब में सम्मिलित किया गया। महाराष्ट्र में उनकी गणना ‘संत पंचायतन’ अर्थात् पाँच प्रमुख संतों का समुदाय में होती है। उनके अलावा इस समूह में ज्ञानदेव, एकनाथ, समर्थ रामदास और तुकाराम सम्मिलित हैं। मराठी के विख्यात संत तुकाराम नामदेव को अपना आध्यात्मिक आदर्श मानते थे। लोक में प्रसिद्ध है कि एकनाथ ज्ञानदेव और तुकाराम नामदेव के अवतार थे। वे मध्यकाल में एक साथ वारकरी, दादू और सिख संप्रदाय में पूज्य और मान्य हुए। कबीर, नानक, दादू, रैदास, रज्जब, नरसी मेहता आदि संतों ने नामदेव को सम्मानपूर्वक अपने पूर्वज संत-भक्त की तरह की तरह स्मरण किया है। मध्यकालीन लगभग सभी भक्तमाल और भक्तनामावली रचनाओं में उनका उल्लेख मिलता है। नामदेव की वाणी में एक साथ नाथपंथी, वैष्णव, वारकरी आदि परंपराओं का संयोग और समन्वय है।
नामदेव के समय महाराष्ट्र में नाथ और महानुभाव पंथ प्रभावी थे, बाद में इसमें वैष्णव भक्ति भी शामिल गई, इसलिए इन तीनों का समवेत प्रभाव उन पर है। बाद में इन तीनों पंथों का समाहार महाराष्ट्र के सबसे दीर्घकालीन और लोकप्रिय पंथ वारकरी में हो गया। नामदेव इसी प्रक्रिया में वारकरी संप्रदाय के आदि संतों में मान्य हुए। नामदेव की वाणी का सगुण-निर्गुण में विभाजन संभव नहीं है। उन पर नाथपंथ का प्रभाव है, लेकिन वैष्णव चेतना उनकी वाणी में सबसे अधिक मुखर है। वे अपने परिवार के भक्ति संस्कार के कारण विट्ठलनाथ के उपासक थे। कहते हैं कि महाराष्ट्र एक और संत ज्ञानदेव नामदेव के बहुत घनिष्ठ मित्र और आत्मीय थे। माना जाता है कि दोनों ने एक साथ कई यात्राएँ कीं। वारकरी संप्रदाय की एक महिला संत बहिनाबाई के अनुसार “ज्ञानदेव रचिला पाया। उभारिले देवालय॥ / नामा त्याचै किंकर। तेणे केलासे विस्तार॥” अर्थात् ज्ञानदेव ने नींव रखी, मंदिर खड़ा किया, किंतु उसका विस्तार उनके सेवक नामदेव ने किया। उनकी वाणी बहुत सीधी-सादी और सहज संप्रेष्य है। मध्यकाल में उनके बाद के अधिकांश संत-भक्त कवियों की रचनाओं में उनकी वाणी की स्मृति और संस्कार हैं।
प्रस्तुत संचयन में नामदेव की कुछ चुनी हुई हिंदी और साधुभाषा की रचनाएँ सम्मिलित हैं। यहाँ उनकी गुरुग्रंथसाहिब में संकलित सभी रचनाएँ ली गई हैं। उनकी 179 हिंदी और साधुभाषा की रचनाएँ भी यहाँ संकलित हैं, जिनमें कुछ रचनाएँ ऐसी भी हैं, जिनमें मराठी की शब्दावली और मुहावरा साफ़ दिखता है।




