यह वियोग का ही है शोक
- Madhav Hada

- 4 days ago
- 9 min read

रवीन्द्रनाथ ठाकुर (1861-1941 ई.) भारतीय साहित्य का सबसे महत्त्वपूर्ण और चर्चित व्यक्तित्व हैं। उन्होंने कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक आदि सभी विधाओं में लिखा और संगीत और चित्रकला को भी समृद्ध किया। उनका विचारात्मक और आलोचनात्मक लेखन भी प्रचुर मात्रा में है। शांति निकेतन शिक्षा के क्षेत्र उनके नवाचार का साक्ष्य है। उन्होंने अपनी रचना, चिंतन, कर्म और असाधारण व्यक्तित्व से आने वाली कई पीढ़ियों को प्रभावित किया और आज भी वे कई लोगों के आदर्श हैं। उन्हें पश्चिम में पूर्व का एक महान् रहस्यवादी माना जाता है- जापानी नोबेल विजेजा साहित्यकार यासुनारी कावावाता ने एक जगह कहा था कि उनके बालमन में टैगोर की छवि पूरब से आए हुए “प्राचीनकाल के किसी चमत्कारी पुरुष” की है। पश्चिम में ठाकुर की यह छवि बनाने में उनके प्रशंसक मित्रों- डब्ल्यू.बी. येट्स (1865 -1939 ई.), एजरा पाउंड (1885-1972 ई.) आदि की निर्णायक भूमिका है। उनका सांस्कृतिक बोध और अनुभव यूरोप से अलग है, उसकी जड़ें भारतीय परंपरा और संस्कृति में है, लेकिन यह यूरोप की तरफ़ पीठ किए हुए नहीं है। रवींद्रनाथ की चिंताओं और सरोकारों में रहस्यवाद के साथ जागतिक भी बहुत है, लेकिन उनकी वर्चस्वकारी रहस्यवादी की छवि ने इसको दबा दिया। अमर्त्य सेन ने उनको ‘निरंतर कम परंपरावादी और अधिक तर्क आधारित’ दृष्टिकोणवाला का व्यक्ति कहा है। रवींद्रनाथ ग़ैरसांप्रदायिक थे, लेकिन गहरे अर्थों में धार्मिक और आध्यात्मिक थे। ईश्वर से प्रत्यक्ष, आनंदपूर्ण और निर्भय संबंध का भाव उनकी कई रचनाओं में है और ‘गीतांजलि’ तो इसी अनुभव और भाव का जीवंत दस्तावेज़ है। रवींद्रनाथ का यह भावबोध एक सीमा तक पारंपरिक भी है। भारतीय साहित्य में ईश्वर से संबंध का यह भाव कई रूपकों और विधियों में बहुत आरंभ से निरंतर और सघन रूप में मौजूद है। मध्यकालीन संत और भक्तिसाहित्य में तो यह अपने चरम पर है। रवींद्रनाथ की भक्ति-चेतना का मध्यकालीन भक्ति-चेतना के साथ बहुत गहरा और निकट संबंध है।
रवींद्रनाथ ठाकुर की जीवन-यात्रा एक कवि संत और मनीषी की जीवन-यात्रा है। उनका जन्म 7 मई, 1861 ई. कलकत्ता (अब कोलकाता) के उनके पुश्तैनी घर जोड़ासाँको में हुआ। उनका परिवार बंगाल का बहुत संभ्रात और वैभवशाली परिवार था। उनके परिवार के पास अपार संपत्ति और ज़मीदारी थी। उनके दादा द्वारकानाथ ठाकुर अपने वैभव के कारण ‘राजा’ और उनके पिता अपने संतवत् आचरण और विद्वत्ता के कारण ‘महर्षि’ कहलाते थे। उनका परिवार शिक्षित और संपन्न था, लेकिन कट्टरपंथियों निगाह में यह ‘पिराली’ अर्थात् ‘खानपान में भ्रष्ट’ था। रवींद्रनाथ का बाल्यकाल विशालकाय महलनुमा भवन जोड़ासाँको में व्यतीत हुआ। वे अपने ग्यारह भाई-बहनों में सबसे छोटे थे। जोडासाँको की अपनी बाल्यकालीन स्मृतियों को रवींद्रनाथ ने अपनी पुस्तक ‘जीवन-स्मृति’ में अंकित किया है। बचपन में स्कूल रवींद्रनाथ को जेल लगता था- उन्हें स्कूल में पढ़ाने के सभी प्रयत्न व्यर्थ हुए। उनकी आरंभिक शिक्षा घर पर ही हुई। ग्यारह वर्ष की उम्र में उनका जनेऊ संस्कार हुआ और इसके तत्काल बाद वे अपने पिता के साथ पहले बोलपुर और फिर हिमालय की यात्रा पर गए। यात्रा में पिता ने उनको संस्कृत अंग्रेज़ी, गणित, ज्योतिष आदि के साथ उत्तरदायित्वपूर्ण आचरण की शिक्षा दी। यात्रा के दौरान उन्होंने पृथ्वीराज की ऐतिहासिक पराजय पर एक नाटक लिखा।
हिमालय की यात्रा के बाद उनका व्यक्तित्व पूरी तरह बदल गया। लौटने के अगले ही वर्ष उनकी माँ का निधन हो गया, लेकिन वे इससे बहुत विचलित नहीं हुए, क्योंकि छोटे होने के कारण घर-परिवार में उन्हें सबका स्नेह सुलभ था। उनकी प्रतिभा को उनके घर के उदार खुले माहौल में खुलने-खिलने का पूरा अवसर मिला। पंद्रह वर्ष की उम्र में एक हिंदू मेले में उन्होंने अपना पहला काव्य पाठ किया। बाद में उन्होंने ‘वनफूल’ नामक एक लंबी कविता लिखी और वैष्णव पदावली के अनुकरण पर कुछ पद रचनाएँ भी कीं। धीरे-धीरे उनकी प्रतिभा के दूसरे आयाम- अभिनय, संगीत आदि भी सामने आने लगे। कवि के रूप में उनकी प्रतिष्ठा बढ़ने लगी। सत्रह वर्ष की उम्र में वे उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेजे गए। उनके पत्रों से लगता है कि वे वहाँ के सामाजिक-साहित्यिक जीवन में सक्रिय थे। विदेश में शिक्षा पूर्ण करने से पहले ही 1880 ई. में वे वापस बुला लिए गए। विदेश से लौटकर उन्होंने ‘वाल्मीकि प्रतिभा’ की रचना की और उनके दो कविता संकलन- ‘प्रभात संगीत’ और ‘सांध्य संगीत’ प्रकाशित हुए। उन्होंने इस दौरान बच्चों के लिए कविताएँ भी लिखीं। बाईस वर्ष की उम्र में उनका मृणालिनी देवी के साथ विवाह हुआ। उनके पाँच संतानें थीं- उन्होंने इन सबके अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था घर पर ही की। रवींद्रनाथ अपनी ज़मीदारी के काम से उत्तरी और पूर्वी बंगाल और उड़ीसा में भी रहे। यहाँ रहकर उन्होंने ग्रामीण जीवन को बहुत निकट से देखा। अपनी ज़मीदारी के गाँव सियालदेह में ही उनकी भेंट बाउल संप्रदाय के लोगों से हुई और यह बाद में इस संप्रदाय से उनके घनिष्ठ संबंध में बदल गई। उनकी कविता पर बाउल गीतों का बहुत गहरा प्रभाव है।
रवींद्रनाथ के मन में बहुत बाल्यकाल से एक अलग क़िस्म के विद्यालय का सपना था। बोलपुर के अपने पिता के आश्रम में उन्होंने शांति निकेतन नाम से एक विद्यालय आरंभ किया। इसके लिए उन्होंने अपना पुरी का मकान बेच दिया और उनकी पत्नी ने अपने गहने दिए। शांति निकेतन बाद में विश्वभारती के रूप में विश्वविद्यालय बना। उन्होंने इसमें देश-विदेश से कई गुणी विद्वानों को निमंत्रित किया। उन्होंने शांतिनिकेतन की एक प्रवृत्ति के रूप में ही शांति निकेतन के सरुल गाँव में ग्रामीण विकास की श्रीनिकेतन नामक परियोजना आरंभ की। रवींद्रनाथ का व्यक्तिगत परिचय महात्मा गाँधी से भी हुआ। गाँधी 1915 ई. शांति निकेतन भी आए। अंग्रेज़ी सरकार ने उनको 1915 ई. में ‘सर’ की उपाधि दी, लेकिन 1919 ई. में जलियावाला बाग़ के हत्याकांड के विरोध में उन्होंने इसे लौटा दिया। उन्होंने कुल ग्यारह बार विदेश यात्राएँ की। कई विदेश कवियों-विद्वानों से उनका परिचय हुआ। प्रसिद्ध कवि डब्ल्यू. बी. येट्स और कलाकार विलियम रोथेन्स्टाइन आदि उनके प्रशंसक बन गए। अपने इन विदेशी विद्वान् मित्रों के आग्रह और प्रोत्साहन पर उन्होंने अपनी कुछ कविताओं के अंग्रेज़ी अनुवाद किए, जो ‘गीतांजलि’ के नाम से प्रकाशित हुए। ‘गीतांजलि’ को 1915 में नोबल प्राइज से सम्मानित किया गया। वे पहले ग़ैरयूरोपीय साहित्यकार थे जिनको यह सम्मान दिया गया। सम्मान से उनकी लोकप्रियता विश्वव्यापी हो गई। उन्होंने भारतीय स्वाधिनता आंदोलन में भी भागीदारी की। उनका निधन 7 अगस्त, 1941 ई. को हुआ। रवींद्रनाथ का व्यक्तित्व असाधारण था- वे सुंदर थे, उनकी कद-काठी सुडोल थी और उनकी वाणी धीर-गंभीर थी। दिखावा और आडंबर उनके आचरण में बिल्कुल नहीं था और वे अंधानुकरण के सख़्त ख़िलाफ़ थे।
भक्ति और अध्यात्म स्वर उनकी कविता में केन्द्रीय और प्रमुख है। उनकी कविताओं को पढ़कर लगता है जैसे यहाँ आकर भक्ति की भारतीय परंपरा अपने उत्कर्ष पर पहुँच गई है। छद्म आधुनिकता के उस दौर में कई कवि अपनी परंपरा से विमुख कर हो गए, लेकिन रवींद्रनाथ कविता में यह निरंतर है। उनकी रचना ‘गीतांजलि’ की भक्ति और अध्यात्म की रचनाएँ चमत्कृत करती हैं। परमसत्ता के साथ ऐक्य का उनका अनुभव बहुत विलक्षण है। अपने एक गीत वे कहते हैं- “मुझे बनाया अनंत / ऐसी है तुम्हारी लीला / यह क्षणमंगुर पात्र / तुम खाली करते हो बार-बार / भरते हो उसमें नया जीवन।” एक और गीत मे वे कहते हैं कि “तू प्रेम के वशीभूत / अपने को देता है मुझे / फिर मुझमें ही / अनुभव करता है पूर्णानंद।” प्रार्थना का रवींद्रनाथ का स्वर बहुत करुण है। अपने एक गीत में कहते हैं कि “तुम्हारे महान् आकाश के नीचे / एकाकी और विनम्र हृदय लेकर / क्या मैं खड़ा रहूँगा। तुम्हारे सम्मुख?” परमसत्ता से अपने पृथक् होने की चेतना उनके गीतों में कई तरह से है। अपने गीत में उन्होंने इसको बहुत प्रभावकारो ढंग से व्यक्त किया है। वे कहते हैं कि “हे तेजोमय सूर्य! / मैं हूँ शरद मेघ का भटककर बचा हुआ टुकड़ा / अभी तुम्हारे स्पर्श से / प्रकाश में नहीं हुआ मेरा विलय / मैं गिन-गिन काट रहा हूँ / वर्ष, महीने और घड़ियाँ।” परमसत्ता से पृथक् होने की वियोग चेतना उनके अनुसार सर्वव्यापी है। संसार के असंख्य रूपों का कारण यही वियोग चेतना है। अपने एक गीत उन्होंने कहा है कि “यह वियोग की पीड़ा ही है? जो फैली है भुवन में / आकाश मंडल में उत्पन्न कर रही है असंख्य रूप / यह वियोग का ही है शोक / रात में तारे एक-दूसरे की ओर लगाए हुए हैं टकटकी / सावन की रात में अँधेरे में हिलती पत्तियों से निकलती है वीणा की ध्वनि।” मृत्यु से साक्षात्कार और उसका अनुभव रवींद्रनाथ के गीतों की सबसे बड़ी ख़ासियत है। यह उनकी कविताओं में कई तरह से आता है। अपने एक गीत में कहते हैं कि “मित्रो! यह है मेरे जाने की बेला। / मेरे लिए करें शुभकामनाएँ / उषा से रक्त वर्ण हो गया है आकाश / मेरा मार्ग है सुहावना / मत पूछना क्या मेरे पास वहाँ ले जाने के लिए? / मैं हूँ खाली हाथ आशाएँ हैं हृदय में।”
रवींद्रनाथ की गीति रचनाएँ संत-भक्तों की पदरचना की परंपरा में हैं। ये अपनी अभिव्यक्ति में बहुत गूढ़ और सांकेतिक हैं- इनका अर्थ धीरे-धीरे खुलता है। ‘गीतांजलि’ रवींद्रनाथ के अभिव्यक्ति कौशल का भी उत्कर्ष है।
रचनाएँ
1.
मुझे बनाया है अनंत
ऐसी है तुम्हारी लीला
यह क्षणभंगुर पात्र
तुम खाली करते हो बार-बार
भरते हो उसमें नवजीवन
बाँस की इस नन्हीं बाँसुरी को
फिराया है पहाड़ों-घाटियों में
निकाला है उससे नित्य नया स्वर
तुम्हारे अमृतमय स्पर्श से
मेरा हृदय खो देता है
अपने आनंद की सीमा
फिर उसमें उठते हैं
अनिर्वचनीय उद्गार
मेरे क्षुद्र हाथों पर होती है
अहर्निश तुम्हारे दान की वर्षा
बीतते जाते हैं युग पर युग
जारी है तुहारी वर्षा
शेष है भरने के लिए स्थान
2.
तुम कैसे गाते हो?
मैं सुनता हूँ आश्चर्यचकित
ध्यानमग्न
तुम्हारे गान से
आलोकित है संपूर्ण जगत्
तुम्हारे गान की प्राण वायु
दौड़ रही है देश-देशांतर
तुम्हारे गान की वेगवान् धारा
बह रही है
पथरीले अवरोधों को काटती हुई
मेरा ह्दय
होना चाहता तुम्हारे गान में सहभागी
नहीं निकलता स्वर
नहीं बनता गीत
बस, मैं मान लेता हूँ अपनी हार
हे स्वामी!
मेरा हृदय बंदी है
तुम्हारे गान के अंतहीन जाल में
3.
मैं आया हूँ
तेरे गीत गाने के लिए
तेरे मंदिर के एक कोने में है
मेरी भी है जगह
तेरी सृष्टि में मेरे लिए नहीं है कोई काम
मेरे अर्थहीन जीवन से
कभी-कभी निकल सकती है निरर्थक धुन
जब आधी रात को
मंदिर में हो घंटनाद
मुझे गाने के लिए
सम्मुख खडा होने की दें आज्ञा
सुबह के हवा में
जब सुनहरी वीणा का मिलाया जाता है सुर
मेरा मान रख
मुझे होने दें उपस्थित
4.
जगत् के उत्सव का
मुझे मिला निमंत्रण
जीवन हुआ सफल
मैं देख भी चुका
सुन भी चुका
उत्सव में
वीणा-वादन का दायित्व मिला मुझे
जो मुझसे हुआ, मैंने किया
आ गया है अंत समय
अब पूछता हूँ
क्या भीतर आकर करूँ
तुम्हारे मुखारविंद के दर्शन?
क्या समर्पित करूँ
अपना नीरव नमस्कार?
5.
क्या तुमने नहीं सुनी
उसकी पदचाप की मंद ध्वनि?
वह आता है, वह आता है
वह नित्य आता है
हर समय, हर दिन, हर रात, हर घड़ी
वह आता है, वह आता है
वह नित्य आता है
मैंने सभी मनोदशाओं
गाए हैं उसके गीत
यही हुआ उद्घोषित
वह आता है, वह आता है
वह नित्य आता है
ये हैं उसी के पदार्विंद
जो शोक और दुःख में
दबाते हैं मेरा ह्दय
जिनका संसर्ग
करता है मेरे ह्दय में
आनंद का संचार
5.
हे ईश्वर!
मेरे जीवन के भरे हुए पात्र से
क्या रसपान करना चाहते हो तुम?
हे मेरे कवि!
मेरी आँखों से
क्यों देखा चाहते हो अपनी ही सृष्टि?
मेरे कानों के द्वार पर खड़े होकर
अविनश्वर गान सुनने में
क्या आनंद आता है तुम्हे?
तेरे जगत् से ही
मैं करता हूँ शब्द-सृष्टि
तेरे आनंद से आता है उसमें संगीत
तू प्रेम के वशीभूत
अपने को देता है मुझे
फिर मुझमें ही
अनुभव करता है पूर्णानंद
6.
हे मेरे जीवन के स्वामी!
क्या मैं हमेशा खड़ा रहूँगा
तुम्हारे सम्मुख?
तुम्हारे महान् आकाश के नीचे
एकाकी और विनम्र ह्दय लेकर
क्या मैं खड़ा रहूँगा
तुम्हारे सम्मुख?
तुम्हारे कर्मबहुल, संग्रामग्रस्त
दौड़धूप और कोलाहलपूर्ण
आकुल-व्याकुल लोगों के संसार में
क्या मैं खड़ा रहूँगा
तुम्हारे सम्मुख?
हे महाराज!
जब संसार में नहीं रहेगा मेरा काम
तब एकांत और नीरव
क्या मैं खड़ा रहूँगा
तुम्हारे सम्मुख?
7.
हे तेजोमय सूर्य!
मैं हूँ शरद मेघ का
भटककर बचा हुआ टुकड़ा
अभी तुम्हारे स्पर्श से
प्रकाश में नहीं हुआ मेरा विलय
मैं गिन-गिनकर काट रहा हूँ
वर्ष, महीने और घड़ियाँ
यदि यही है तुम्हारी इच्छा
तो रंग दें
मेरे तुच्छ क्षणभंगुर अस्तित्व को
सोने से कर दे सुनहरा
चंचल वायु को सौंपकर
फैलने दें कई रूपों में
जब रात में
तुम ख़त्म करना चाहोगे खेल
तो सबह की मुस्कान के साथ
निर्मल, शीतल पवित्रता में परिणत होकर
मैं हो जाऊँगा लोप
8.
यह वियोग की पीड़ा ही है
जो फैली है भुवन में
आकाशमंडल में उत्पन्न कर रही है
असंख्य रूप
यह वियोग का ही है शोक
रात में तारे एक-दूसरे की ओर
लगाए हुए हैं टकटकी
सावन की रात में अँधेरे में हिलती पत्तियों
निकलती है वीणा की ध्वनि
यह वियोग की ही है सर्वव्यापी वेदना
जो मनुष्य-घरों में होती है
प्रेम और वासना शोक और आनंद में घनीभूत
मेरे कवि हृदय से बहती है
कल-कल गीतों के रूप में
9.
मित्रो!
यह है मेरे जाने की बेला
मेरे लिए करें शुभकामनाएँ
उषा से रक्तवर्ण हो गया है आकाश
मेरा मार्ग है सुहावना
मत पूछना
क्या है मेरे पास वहाँ ले जाने के लिए?
मैं हूँ खाली हाथ
आशाएँ हैं हृदय में
मैं पहनूँगा
विवाह की वरमाला
राहगीरों की तरह
मेरे पास नहीं हैं भगवे वस्त्र
मार्ग में हैं कई संकट
पर नहीं है मेरे मन में कोई भय
यात्रा ख़त्म होने पर निकलेगा सांध्यतारा
बजाई जाएगी राजद्वार पर
मधुर रागिनियाँ
10.
आकारों के समुद्र में
मैं लगाता हूँ डुबकियाँ
कोई निराकार पूर्ण मोती आ जाए हाथ
मैं अब नहीं फिरूँगा घाट-घाट
इस टूटी-फूटी
समय की मार खाई नौका में
बीत गए पुराने दिन
जब लहरों के थपेड़ें खाना था मेरा खेल
अब मै उत्सुक हूँ
मर कर हो जाऊँ अमर
मै अपनी वीणा ले जाऊँगा वहाँ
जहाँ अथाह गहराई के सभागार में
होता है तालरहित गायन
मैं इसे नित्यता के राग में करूँगा स्थित
अंतिम स्वर निकलने के बाद
मैं इसे समर्पित करूँगा
उस शांतिमय के चरणों में




Comments