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अब तो पार उतरना है

  • Writer: Madhav Hada
    Madhav Hada
  • 4 days ago
  • 9 min read

मुक्ताबाई की कविताओं का भाव रूपांतर

बनास जन । 68। जनवरी-मार्च, 2026


मुक्ताबाई का जन्म 1279 ई. पैठन जिले के अपेगाँव में एक देशस्थ ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता विट्ठलपंत कुलकर्णी अपनी परिवार के परंपरा के अनुसार वेदों के विद्वान् अध्येता थे। उनकी माँ का नाम रुक्मिणीबाई था। कुलकर्णी दंपती की तीन अन्य संतानें- निवृत्तिनाथ, ज्ञानदेव और सोपानदेव मुक्ताबाई से बड़ी थीं। मुक्ताबाई को भी अपने माता-पिता और भाइयों के साथ ब्राह्मणों की उपेक्षा और प्रताड़ना झेलती पड़ी। दरअसल उनके पिता ने काशी जाकर संन्यास ग्रहण किया, लेकिन वे इसए त्यागकर घर लौट आए और सामान्य गृहस्थ जीवन व्यतीत करने लगे। उनकी चारों संतानों को संन्यास की संताने मानकर ब्रह्माणों जाति से बहिष्कृत कर दिया। प्रायाश्चितस्वरूप मुक्ताबाई के माता-पिता ने प्रयाग जाकर गंगा में अपना प्राणांत कर लिया, लेकिन इसके बाद भी उनकी संतानों को ब्राह्मणों ने स्वीकार नहीं किया। मुक्ताबाई और उनके तीनों भाई अनाथ तरह पलकर बड़े हुए। मुक्ताबाई ने बहुत अल्पायु में ही परिवार का दायित्व अपने ऊपर ले लिया। बाद में उन्होंने ज्ञानदेव और सोपानदेव के साथ निवृत्तिनाथ से दीक्षा ली। कहते हैं कि ज्ञानदेव के समाधि लेने के एक वर्ष-दो वर्ष बाद ही मुक्ताबाई निवृत्तिनाथ और सोपानदेव तीर्थयात्रा के साथ पर निकलीं और एक जगह बरसात में चमकती हुई बिजली के प्रकाश में विलीन हो गईं।

मुक्ताबाई के जीवन के संबंध में दो घटनाओं का विवरण मिलता है। कहते हैं कि महाराष्ट्र के विख्यात संत-भक्त नामदेव विट्ठलनाथ के सबसे बड़े भक्त के रूप में मान्य थे। मुक्ताबाई अपने साथी संतों के साथ पंढ़रपुर गईं। सभी ने नामदेव को प्रणाम किया, लेकिन मुक्ताबाई ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने अपने साथी गोराबा कुम्हार से ‘बर्तन जाँचने’ का आग्रह किया। वे इसका आशय समझ गए। वे सभी को डंडों से मारने लगे। मार खाकर अन्य सभी संत शांत रहे, जबकि नामदेव चिल्लाने लगे। गोराबा कुम्हार ने निष्कर्ष निकालकर कहा कि नामदेव अभी कच्चा है। नामदेव को अपने अपूर्ण होने अहसास हो गया। बाद में वे विसोबा खेचर के शिष्य हुए और उनके अधीन उन्होंने संत होने की पूर्णता प्राप्त की। मुक्ताबाई के जीवन की दूसरी घटना चाँगदेव से संबंधित है। चाँगदेव सिद्धियाँ प्राप्त विख्यात संत थे। कहते हैं कि उन्होंने नहाती हुईं मुक्ताबाई को देखकर अपना मुँह दूसरी तरफ़ फेर लिया। मुक्ताबाई ने उनसे कहा कि यदि वे साधु हैं, तो उनमें यह भाव नहीं होना चाहिए। मुक्ताबाई ने चाँगदेव को कहा कि “यदि तुझ पर गुरु कृपा होती, तो ऐसा विकार तेरे अंदर नहीं उठता। दीवार में जैसे आले होते हैं, वैसा ही देख-समझकर तू मेरे सामने आता। जन में, वन में जो गायें घूमती हैं, क्या वे कपड़े पहने रहती हैं? उन पशुओं को जैसे तू देखता है, वैसीही  प्रतीति तुझे मुझे देखकर क्यों नहीं होती?” चाँगदेव को अपनी ग़लती का अहसास हुआ और वे मुक्ताबाई के शिष्य बन गए। “आठ साल की उम्र में मुक्ताई 1400 साल पुराने चांगदेव के आध्यात्मिक गुरु बन गईं।" चांगदेव कृतज्ञतापूर्वक कहते हैं, “मुक्ताई करे लेइले अंजन”। मुक्ताबाई के अभंगों में यहाँ-वहाँ चाँगदेव का का उल्लेख ‘चाँग्यासुत’ (चाँगदेव बेटा) के रूप में आता है।

मुक्ताबाई का रचना संसार बहुत सीमित है। उन्होंने केवल 41 अभंगों की रचना की, जिनमें ताटी चे अभंग (द्वार के अभंग) ज्ञानबोध आदि सम्मिलित हैं। उनके कुछ अभंग पंढ़रपुर के माहात्म्य, संत महिमा, उपदेश आदि पर आधारित हैं। ताटीचे अभंग उनकी सबसे चर्चित रचना है। कहते हैं कि आत्मग्लानिवश ज्ञानदेव ने दरवाज़ा बंद कर लिया। मुक्ताबाई अपने 12 अभंगों में विभिन्न तर्क देकर ज्ञानदेव से दरवाज़ा खोलकर बाह्य संसार का एक चुनौती की तरह सामना करने का आग्रह किया। उन्होंने इसमें संसार की रीति-नीति, संत के आचरण, ईश्वर महिमा आदि से संबंधित कई तर्क दिए। उन्होंने ज्ञानदेव को उन संतों का स्मरण करवाया जो उनसे पहले अवतरित हुए और जिनको विरोध और अपमान सहन करना पड़ा। उन्होंने ज्ञानदेव को उनके कुल के वैभव और उनकी योग्यता का स्मरण कराया। उन्होंने ज्ञानदेव से कहा कि “जो लोगों के पापों को सहन करता है वह योगी है। भले ही ब्रह्मांड हमसे नाराज़ हो, हम उस गुस्से को पानी की तरह की शीतलता से बुझा देंगे।” मुक्ताबाई के कुछ अभंगों अपने परिवार के साथ होने वाले अन्याय की व्यथा बोलती है।

मुकताबाई के ये संकलित रचनाएँ उनके अभंगों अंग्रेज़ी और हिंदी अनुवादों पर आधारित भावरूपांतर है। मुक्ताबाई के एकाधिक अंग्रेज़ी और हिंदी अनुवाद मिलते हैं। ख़ासतौर पर रूथ वनिता ने मानुषी के 50, 51 एवं 52 अंक में ताटी चे अभंग का बहुत अच्छा अंग्रेज़ी के अनुवाद किया है। यहाँ भावरूपांतर इन सभी अनुवादों का सहयोग लिया गया है। रूपांतकार सभी के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करता है।

रचनाएँ

नाम-स्मरण

1

जिनके नाम का जप करने से

मनुष्य हो जाता है मुक्त

वही प्रतिमा हमने

खड़ी देख़ी है ईंट पर

पुंडलिक

भगवान् विट्ठल को ले आए पंढ़रपुर

उन्होंने अपने पुण्यों से

संसार का किया उद्धार

पुंडलिक की धर्मपरायणता से

मनुष्यों के मोह हो गए दूर

मुक्ताई ध्यान से हो गई मुक्त

हरिपाठ के जाप से 

उसका अस्तित्व हो गया

भगवान के चरणों में हो गया विलीन

2.

उसे कहते हैं शून्य

लेकिन वह शून्य नहीं है

उसे देखो और समझो

कैसे दिखाता है वह माया?

पंढ़रपुर में ईश्वर हुए हैं प्रकट

नहीं पता कुछ भी

वेदों में कहा गया है नेति-नेति

मुक्ताई को है विठ्ठल से प्रेम

वह है शून्य

लगभग शून्य

3.

संसार-विरत होकर

केवल हरि-नाम के स्मरण से

कोई भी मुक्त आत्मा जा सकती है वैकुंठ

हरि के अलावा

और नहीं है कोई

जो आपकी आत्मा को

हमेशा के लिए कर दे मुक्त

एक वही हैं जो 

संसार के दुर्भाग्य से दिला सकते हैं मुक्ति

वे प्रदान करते हैं आशा

निर्जीव को प्रदान करते हैं जीवन

अपनी आत्मा से

वे जल को करेंगे प्रज्वलित

मुक्ताई संसार से हो गई है

सदा के लिए मुक्त

वे स्वयं हैं अविभाज्य

उन्होंने असमानता को कर दिया है ख़त्म

4.

निस्संकोच कहती हूँ 

ईश्वर में ही है गति

एक ईश्वर ही है सत्य 

मुक्ति का मोती रखा है सिरहाने

तुम नहीं हो द्वंद्व-कथा

द्वैत में मुक्ति और अद्वैत में द्वैत

शरीर या नाम

इनका नहीं है कोई मूल्य 

हे मन, धारण करो

शांति, क्षमा, दया, करुणा

ईशवर की सतत वासना

माधव, मुकुन्द और हरिनाम से

पाओ मन से मुक्ति

मुक्ति-धन

हरिनाम का करो उच्चारण 

संसार से मुक्ति का यही है उपाय

5.

मन है सदैव स्वतंत्र

नित्य पाठ करे रामकृष्ण गोविंद

ले हरि स्मरण का आनंद

नित्य जपते रहें नाम

हर तरफ़ है

चेहरों से भरा हुआ दृश्य

हरि-स्मरण है मुक्ति का साधन

हरि ही हैं रूप और चित्ति

जगत के अंत में

शेष है केवल हरिनाम

6.

नाम-स्मरण से

होती है जीव की मुक्ति

हमने देखा है उनका रूप

मूर्ख डूबे रहे भ्रम में

पुंडलिक विट्ठल को ले आया पंढ़रपुर

मुक्ताई विचार से हो गई मुक्त

करती है हरिनाम का पाठ 

 

वैकुंठ

1.

निर्गुण और सगुण के पलँग पर

विश्राम करते हैं केशीराज भगवान् विट्ठल

कितने विचित्र हैं उनके कर्म

वे दिन को बदल देते हैं रात में

सगुण और निर्गुण

दोनों से करते हुए शक्ति-संचय

प्रकट होते हैं एक ही तत्त्व में

उनमें नहीं है कोई अहम्

उनका प्रेम है सभी लिए सुलभ

उनमें विलीन हो जाते हैं

आदि और अंत

मुक्ताई कहती है मैं हूँ धनवान्

मुझे सर्वत्र दिखते हैं

भगवान् नारायण-विष्णु

जिन्होंने दी है मुझे

जीव-आत्मा की अविभाज्य एकता

2.

सुख-दुःख

सभी हैं समान

प्रेम ने छोड़ दिया है विष

पक्ष और विपक्ष की चेतना

आओ, खोजें तर्क का मार्ग

तीर्थ में नहीं है ईश्वर

भक्त का शरीर और आत्मा

है सूक्ष्म मार्ग

घर पर ही है समझ का सार

वेद ज्ञान, कथा श्रवण 

सब हैं प्रलोभन 

जाओ वापस कर्म के पास

सोहम् के जाप में

मुक्ताई है आनंद-मग्न 

3.

भाग्य, धर्म और आचरण की उपज

यही सब हैं हमारे पास

हम निकल पड़े हैं मुक्ति की यात्रा पर

पदार्थ लौट आया है

अपने मूल स्वरूप में

एक बार फिर

हमारे सामने है संसार

सत्य और असत्य का अंतर

हो गया साफ़

भगवान् हरिराज व्याप्त है अब पूरे हृदय में

अव्यक्त पर वाद-विवाद से

समझ में आगए हैं रूप और आकृति

जीवन और आत्मा की अविभाज्य एकता

दिखाई पड़ रही है

वैकुंठ की दिव्य आकृतियाँ

मुक्ताई कहती हैं

मेरे मोक्ष के तट पर हैं मुक्त आत्माएँ

निरंतर प्रकाशमय कृपा से युक्त संपूर्ण स्वर्ग

4.

चींटी उड़ गई

आकाश की ओर

उसे निगल लिया सूरज ने

देखा एक आश्चर्य

बाँझ के हुआ पुत्र-जन्म

बिच्छू के नीचे जाओ

बाकी सिरों को

पैरों से बदल दिया गया है

घर घिरा हुआ मक्खियों से

यह देखकर

हँस पड़ी मुक्ताई

5.

निर्गुण और सगुण के पलँग पर

विश्राम करते हैं केशीराज भगवान् विट्ठल

कितने विचित्र हैं उनके कर्म

वे दिन को बदल देते हैं रात में

सगुण और निर्गुण

दोनों से करते हुए शक्ति-संचय

प्रकट होते हैं एक ही तत्त्व में

उनमें नहीं है कोई अहम्

उनका प्रेम है सभी लिए सुलभ

उनमें विलीन हो जाते हैं

आदि और अंत

मुक्ताई कहती है मैं हूँ धनवान्

मुझे सर्वत्र दिखते हैं

भगवान् नारायण-विष्णु

जिन्होंने दी है मुझे

जीव-आत्मा की अविभाज्य एकता

6.

कैसे हो

सिद्धांतों की भूल-भूलैय्या में

परमतत्त्व की पहचान?

सोहम् का प्रभाव क्या है?

ऊपर-नीचे कैसे होते हैं?

यह संज्ञान नहीं, केवल ज्ञान है

संज्ञान है

आत्मा की धन-संपत्ति

मुक्ताई है सभी तरह से मुक्त

मुक्त ही पाता है

आत्मबोध से मुक्ति

 

चाँगदेव

1.

ईश्वर से निकटता के बावजूद

क्यों नहीं छूटा आपका अहंकार

मान, अपमान और ईर्ष्या की

खेती करते हैं आप

दिन में भी

आपके हाथ में रहता है दीपक

परमब्रह्म की संगति में करते हैं क्रीड़ापूर्वक निवास

फिर भी आप क्यों हैं

अंधों की मूर्खताओं में लिप्त?

इच्छओं को पूर्ण करने वाले

कल्पतरु वृक्ष के नीचे बैठकर भी

आपके हाथों में है भिक्षापात्र

2.

नहीं

ख़ुशी पाप नहीं है

नहीं

कर्म कोई विचार नहीं है

कोई मोक्ष या भवबंधन नहीं है

वे कहते हैं कि

वटेश्वर ब्रह्म नहीं है

सहज भाव से

कहती हैं मुक्ताई

3. 

जब आप स्वतंत्र होते हैं

तो बंधन समाप्त हो जाता है

हमने बाँध ली हैं

अपनी ही रस्सियाँ

घर में रहकर 

घर के बंधन तोड़ना है आसान

अतीत की दुनिया खो गई है

अच्छे वटेश्वर प्रार्थना करते हैं

नयी दुनिया के लिए

4.  

सुख के अंत में

आता है दुःख

घूमने के लिए बहुत अच्छा है

सुख से दुःख की ओर

दुःख से दुःख की ओर

दोनों हैं अज्ञान के कारण 

मुक्ताई है मुक्त और स्वतंत्र 

वटेश्वर हैं स्वयंभू

5.

निर्गुण की शाखा पर

लगाया पालना

सो गया

उसमें मुक्ताबाई का लाल चाँगदेव

सो जाओ, मत करो हठ

मैं बजाती हूँ अनाहत की ताली

न निद्रा है, न जागरण

है केवल उन्मन का भोग

पवन की डोर से

बुना हुआ पालना

अजपा में करो स्थिर

नहीं है नींद, नहीं जागना

यहाँ क्या सोना है?

हे चाँगदेव!

अब तो पार उतरना है

 

खोलो द्वार

1.

शुद्ध है जिनका अंतःकरण

वे संत सहन कर लेते हैं

अपने प्रति किए गए अपराध

वे पानी बनकर प्रसन्नतापूर्वक

शांत कर देते हैं 

संसार का उफनता हुआ क्रोध

शब्दों के शस्त्र से किए हुए

आघातों को

वे सहन कर लेते हैं चुपचाप

वे मानते हैं इनको उपदेश 

विश्व है एक वस्त्र

ब्रह्म है उसको सिलने वाला तार

हे ज्ञानेश्वर! खोलो द्वार

2.

प्रभु के आनंद-सागर में लीन

व्यक्ति के लिए

कौन है छोटा, कौन है बड़ा?

नाटकों के अभिनेता की तरह

कई भूमिकाएँ निभाते हुए

कभी एक समान नहीं

एक होते हुए भी कई होते हुए

बन रहो स्थितप्रज्ञ

अस्तित्व और अस्तित्व का साक्षी होकर

वेदों ने जिसे कहा ॐ

व्यक्ति में हो सकती है

गर्व की इच्छा

या वह हो सकता है अभिमानी

छोड़ दो इसे

धारण करो शांति के वस्त्र

हे ज्ञानेश्वर! खोलो द्वार

3.

पहनता है भगवा वस्त्र

लेकिन मरी नहीं हैं जिसकी इच्छाएँ

उसे मत कहो साधु

वह है स्वयं है अपना उपहास

वह है स्वयं अपने लिए अवरोध

करो अपने और पराये की पहचान

बुद्धि से करो उसका सामना

सहेज कर रखो

अपनी आशा और अभिमान

हे ज्ञानेश्वर! खोलो द्वार

4.

संत वही है

जो है दया और क्षमा की प्रतिमूर्ति

जिसके मन नहीं है

लोभ और अहंकार

जो है संसार-विरत

जो सुखी है इस और उस लोक में

जिसकी जिह्वा पर है सरस्वती

मिथ्या विचारों को करो दूर

हे ज्ञानेश्वर, खोलो द्वार

5.

यदि कोई मान ले

अपने आप को साधु

तो क्या अन्य सब हैं व्यर्थ?

मूल ब्रह्म से ही उत्पन्न होते हैं भेद

किन्तु यह है केवल भ्रम 

यह भ्रम तब उखड़ जाएगा समूल

जब जगत् अपने आरंभ

या अंत में हो जाएगा एक

यह जानकर ही संत

होते हैं सुखी

सभी चिंताएँ, सभी क्रोध करो दूर

हे ज्ञानेश्वर, खोलो द्वार

6.

ब्रह्म ही है एक सत्य  

पंचतत्त्वों के अलावा

शेष है सब कुछ 

यदि तुम्हारा हाथ तुम्हें ही लग जाए

तो क्या क्रोधित होते हो तुम?

नहीं, न ! 

यदि दाँत कट जाए जीभ से 

तो क्या कोई तोड़ देता है

सभी दाँत? 

भविष्य के लिए एक सबक है

बड़ा दुःख या अपमान  

जो चबा सकता लोहे के चने

वही हो सकता है ब्रह्मलीन

अनासक्त हो जाओ

मन को डालो मार

हे ज्ञानेश्वर! खोलो द्वार 

7.

स्वयं बन जाओ सुख का समुद्र

जगत् को दो

अपने अनुभव का ज्ञान

ज्ञान देते समय मत करो कोई भेद

साधु के लिए न कोई है अपना

नहीं है कोई पराया

अयोग्य व्यक्ति से मत करो घृणा

उसके उत्थान के लिए

अपने प्राण त्यागने को रहो तैयार

हे ज्ञानेश्वर! खोलो द्वार

8.

तुम पर कोई

कैसे कर सकता है क्रोध?

तुम हो स्वयं हो ज्ञान के धाम

तुम जानते हो अच्छी तरह

सभी प्राणियों में

बसता है भगवान्

हम उनकी सेवा के लिए हैं प्रतिश्रुत

हम नहीं छोड़ सकते अपना प्रण

आ गया यदि क्रोध

तो तुम कैसे हुए योगी?

अपनी सष्टि का करो विस्तार

हे ज्ञानेश्वर! खोलो द्वार 

9.

भेदों का परित्याग ही है

साधु की सामधि

कौन किससे करता है वाद-विवाद? 

द्वैत-अद्वैत पर करता है आक्रमण?  

पक्षी जब ऊँचे उड़ता है आकाश में

तब भी धरती पर होते हैं उसके पैर

मन ले जाता है भ्रम की भूल-भूलैय्या में 

कोई कुछ नहीं करता

जो कुछ होता है

वह है भगवान् की इच्छा 

अपनाओ सही मार्ग

हे ज्ञानेश्वर! खोलो द्वार 

10.

क्रोध और कामना का

त्याग नहीं किया जिसने

उसके लिए क्या हैं पहाड़ और गुफा? 

ऐसा व्यक्ति नहीं है संन्यासी

जो दूसरे से करता है ईर्ष्या

वह भले ही रहे पहाड़ों पर

लेकिन सुख के लिए भटकता है दर-दर

जब हृदय नही है इच्छारहित

तो क्या उपयोग है योग और धर्म का?  

अपने हृदय को गंगाजल की तरह

पवित्र कर, करो विचार

हे ज्ञानेश्वर! खोलो द्वार 

11.

जिसके हैं भाव शुद्ध

भगवान नहीं हैं उससे दूर

यह शुद्ध भाव भी है ज्ञान

यह नहीं मिलता बाजार में

हम स्वयं वही एक हैं

यह जान लेने पर आत्म-भाव

हो जाता है नष्ट

स्वामी, सच्चे गुरु

जो हैं भगवान के पिता द्वारा

ऐसे सिखाए गए व्यक्ति को

कोई और क्या सिखा सकता है? 

मुक्ताबाई कहती हैं

जो कहा है प्रेमपूर्वक

उसके सार पर करो विचार

अब भी नहीं बदला है तुम्हार आत्म

ब्रह्मांड को ले जाओ अपने साथ

हो जाओ पार

हे ज्ञानेश्वर! खोलो द्वार

 

 

 

 
 
 

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