आलोचक की बात
- Madhav Hada

- Aug 1, 2025
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आलोचना साहित्य के आस्वाद में भोक्ता की मदद करती है। यह साहित्य के अर्थ-आशय तक भोक्ता की पहुंच को सुगम बनाती है। यह साहित्य के महत्त्व और मूल्य की प्रतिष्ठा भी करती है। यह साहित्य से संबंधित सामान्य सिद्धान्तों का निर्माण करती है और वक्त-जरूरत इनको पुनर्नवा भी करती है। अच्छी आलोचना में यही सब होता है। आलोचना के नाम पर अब तक जो लिखा, उसमें यह सब एक साथ नहीं है। आलोचना की अपनी समझ कई संशयों, दुविधाओं और चिंताओं के बीच गुजरकर धीरे-धीरे बनती है, इसलिए उसमें एक साथ सब अच्छा कभी नहीं होता। उसमें कभी कुछ, तो कभी कुछ के अच्छे होने की गुंजाइइश ही रहती है।

आलोचना को समझने-पहचानने का सिलसिला संभ्रम और संशय के बीच शुरू हुआ। रचनाकारों के साथ उठना-बैठना था और उनकी राय आलोचना के संबंध में अच्छी नहीं थी। वे इसके संबंध कमोबेश में वही कहते थे, जो कभी रिल्के ने कहा था कि “समीक्षा कर्म किसी कला सृजन को छूने तक की क्षमता नहीं रखता; उसके बारे में भ्रांतियों का प्रसार जरूर करता है।” कुछ बड़े रचनाकारों ने इस दौरान नंददुलारे-नगेंद्र टाइप आलोचाना के विरुद्ध मुहिम भी छेड़ रखी थी। ऐसे कई नाराज कवि-कहानीकार खुद आलोचना के मैदान में कूदकर दांव भी आजमा रहे थे। साहित्य को जानने, समझने और परखने की कसौटियों के संबंध में भी कुछ साफ नहीं था। इसमें दायें-बायें किस्म की साफ-साफ धड़ेबंदी थी। कुछ ऐसे थे, जो मानते थे कि साहित्य स्वयं जीवन को जानने-समझने का एक स्वतंत्र ढंग है। यह अपने तरीके से सच्चाई तक पहुंचता और उसको सबके सामने करता है। कुछ दूसरे ऐसे थे जो मानते थे कि साहित्य को समाज के वंचित और गरीब तबके के साथ होना चाहिए। उनका जोर विचारधारा को मानने-अपनाने पर भी था। कुछ मानते थे कि साहित्य जीवन की तस्वीर है, जबकि कुछ की धारणा थी कि साहित्य जीवन से अलग कोई चीज है। कुछ समझ में नहीं आता था कि सही क्या है। कभी इस तरफ, कभी उस तरफ और कभी दोनों तरफ होता था, इसलिए रचना को समझने और उसका आनंद, मतलब मजा लेने, उसकी पैदाइश की बारीकियों का जानने, उसका महत्त्व आंकने और मूल्यांकन करने के कोशिशें इस दौरान अंधेरे में हाथ-पांव चलाने जैसी थीं। इस सब के दौरान एक अच्छी बात की ओर ध्यान गया वो यह थी कि आलोचना को गरियाने–लतियाने के बावजूद कवि-कहानीकार अपनी रचना की आलोचना की अपेक्षा करते थे और इधर-उधर की धड़ेबंदी में भी अच्छी आलोचनाएं थीं। खास बात यह थी की इधर के कुछ लोग उधर की कुछ बातों को अच्छा मानते थे और उधर के कुछ लोग इधर की कुछ बातों से सहमत थे।
उठापटक के इसी माहौल में आलोचना में हाथ-पांव मारना शुरू किया। कभी बात बनी और कभी नहीं बनी। इस तरह हाथ-पांव मारते रहने से एक बात समझ में आ गई कि आलोचना भी कमोबेश रचना जैसा ही मामला है। इसको भी दूसरों से सीखने के साथ, अपनी तरह कमाना-पाना भी पड़ेगा। आलोचना में अपना कमाने-खाने के शुरुआत झिझक के साथ शुरू हुई। शुरू में अपने पर भरोसा नहीं हुआ। पुष्टि और समर्थन मिला, लेकिन हतोत्साहित और उपेक्षा करनेवाले बहुत थे। हिंदी में ऐसा रिवाज है कि आप दूसरों को दोहराएं, तो वाह-वाह और कुछ नया और अलग करें, तो निंदा और उपेक्षा मिलती है।
बहरहाल अपने पर भरोसे से बात आगे बढी। धीरे-धीरे यह समझ में आ गया कि सहित्य को समझने-जानने का आपका नजरिया बहुत व्यापक होना चाहिए। यह नजरिया अपने आप नहीं बनेगा। आप इसे अपने से पहले और अपने समय के लोगों की इससे संबंधित धारणाओं में अपनी जोड़-बाकी से बनाएंगे। मनुष्य की सीमाएँ है- उसके हित-अहित और राग विराग हैं, इसलिए जो समझ बनेगी, उस पर इन सब का प्रभाव होगा। यह संभावना रहेगी कि यह समझ सीमित और छोटी हो, इसलिए तमाम तरह की संकीर्णताओं से बचना भी पड़ेगा। इसमें समय और स्थान की भिन्नता से फर्क भी पड़ेगा। एक समय और स्थान पर बनी समझ दूसरे समय और स्थान के लिए अनुपयोगी हो जाएगी। आप बहुत सारा दूसरों से लेंगे, फिर अपने विवेक से जांचेंगे-परखेंगे, उसमें से कुछ लेंगे, कुछ छोड़ देंगे और कुछ अपना मिलाएंगे। कोई समझ अंतिम भी नहीं होगी- इसमें रद्दोबदल की गुंजाइश भी हमेशा रहेगी।
आलोचना को अपनी ही धुरि पर पाने-समझने की जद्दोजहद के दौरान हिंदी की प्रचलित आलोचना की अंतर्बाधाएं बन गईं कुछ रूढ़ियों से छूटने में बहुत समय लगा। ये ऐसी रूढ़ियां थीं, जो लगभग संस्कार जैसी हो गई थीं। साहित्य को समझने-परखने की शुरुआत अपने समय और इसमें भी तत्काल के साहित्य से हुई। हिंदी में प्रायः यही होता है- आलोचना की शुरुआत अधिकांश लोग तत्काल होनेवाले साहित्य से ही करते हैं। धीरे-धीरे, बहुत समय बाद, समझ में आया कि यह ठीक नहीं है। इस तरह आप अपनी विरासत, परंपरा से रूबरू होने से रह जाते हैं। अपनी विरासत और परंपरा की खूबियों और कमजोरियों से आपका सामना ही नहीं होता। आप अपनी परंपरा और मुहावरे को जाने बिना अपने वर्तमान को समझने-परखने लगते हैं। आपको यह समझ में नहीं आता कि वर्तमान ने पहले का क्या लिया और क्या छोड़ दिया है। इसी तरह आप यह भी नहीं समझ पाते कि वर्तमान में एकदम नया क्या है। जब समझ आई और देखना-टटोलना शुरू किया, तो लगा कि हमने वर्तमान पर आने की हड़बड़ी और जल्दबाजी अपनी विरासत और परंपरा के बहुत मूल्यवान को अनदेखा छोड़ दिया है। बाद में यह भी लगा कि हमारे वर्तमान में अतीत का भी बहुत कुछ है, जिसकी अभी पहचान नहीं हई है। यह भी लगा कि अतीत की कोई पहचान अंतिम नहीं होती, समय के साथ इसको फिर जांचते–परखते रहना चाहिए।
शुरू में तो नहीं, लेकिन बाद में यह लगने लगा कि हमारी आलोचनात्मक समझ और विवेक में औपनिवेशिक संकार की जड़ें बहुत गहरी और मजबूत हैं। यह इतनी गहरी और मजबूत हैं कि हमें अपनी विरासत और परंपरा में, जो भी है, सब छोटा और घटिया लगता है। अपनी समझ, विवेक, भाषा, मुहावरा सब हमको खराब लगते हैं। उनके प्रति हमारा नजरिया हिकारत और घृणा का है, जबकि यूरोप और बाहर से जो भी आया है, वो हमारी निगाह में श्रेष्ठ और अच्छा है। यह एक ऐसी अंतर्बाधा है, जो अपनी परंपरा और विरासत को ठीक पहचानने में अवरोध की तरह आलोचना की दो-तीन पीढ़ियों में निरंतर है। यह विडंबना ही है कि हमारी निर्भरता अभी भी बाहर पर है। हम अपने समाज की सांस्कृतिक जरूरत के अनुसार कोई देशज आलोचनात्मक विवेक बना ही नहीं पाए। देशज आलोचनात्मक विवेक के बिना हम भारतीय साहित्य की ठीक से पहचान और परख कर पाएंगे, इसकी गुंजाइश बहुत कम है। भारतीय साहित्य उसकी देश भाषाओं में है, लेकिन औपनिवेशिक संस्कार के कारण देशभाषाओं का साहित्य उपेक्षा का शिकार है। देश भाषाओं के साहित्य की समझ और परख की बात तो दूर, हमारे यहां तो इन भाषाओं का पठन-पाठन ही शुरू नहीं हुआ है।
दुर्भाग्य से हिंदी आलोचना में रूढ़ि और रूपक का रिवाज था, इसलिए शुरू इन्हीं से किया, लेकिन बाद में यह समझ में आया कि साहित्य की एक जरूरी पहचान यह भी है कि यह रूढ़ि और रूपक से बाहर और आगे होता है। हिंदी का दुर्भाग्य है कि इसकी आलोचना रूढ़ि और रूपक से बाहर ही निकलती। राममनोहर लोहिया ने सही कहा था कि ‘‘मार्क्सवाद सहित भारत में बाहर से लाए गए हर सिद्धांत का एक दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि वह निष्प्राण कर दिया जाता है।” हिंदी में आलोचना में यही हुआ- कई सिद्धांत बाहर से लाए गए और ये जल्दी ही निष्प्राण होकर रूढ़ि और रूपक में बदल गए। पहले हिंदी आलोचना में विचार का रूपक हावी था और अब विमर्श के रूपक चल निकले हैं। लोग इनको लेकर इनके नाप-जोख के हिसाब से साहित्य की काट-छांट में लगे हुए हैं। यह धीरे-धीरे ही में समझ आया कि साहित्य में रूढ़ि और रूपक के नाप-जोख के अनुसार चरित्र और घटनाएं नहीं होतीं। उसमें इस नाप-जोख से अलग और इधर-उधर भी बहुत होता है। हिंदी आलोचना में रूढ़ि और रूपक का बोलबाला इतना ज्यादा है कि उसमें नए आने वालों को अपना विवेक इस्तेमाल नहीं करने की आदत हो जाती है। इस विवेकहीनता ने हिंदी आलोचना में दाखिल-खारिज को बढ़ावा दिया। जो अच्छा था, उसमें सब अच्छा ही खोजा-देखा गया और जो खराब था, उसमें कुछ भी अच्छा नहीं है, यह मान लिया गया। इस दाखिल-खारिज से अलग अच्छे में खराब और खराब में अच्छा खोजने-तलाशने की समझ भी बहुत बाद में आई। विवेकहीनता से हिंदी आलोचना में खूंटे बन गए और लोगों की उन पर निर्भरता बढ़ गई। खूंटों से फतवे जारी होने लग गए और इनके अनुसार अपने और पराए का विभाजन हो गया। नवाचार, प्रतिभा और अध्यवसाय को पीछे ढेलकर गतानुगतिकता आगे आ गई। ऐसे माहौल में अपने विवेक पर भरोसा करना अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारने जैसा था, लेकिन धीरे-धीरे यही किया।
एक और बात जो अब बार-बार कचोटती है कि हमारी आलोचना अपनी परंपरा से इस तरह कटी हुई क्यों है? हमारे यहां आलोचना की भरत से लगाकर विश्वेशर पंडित तक दो हजार वर्ष से अधिक लंबी और समृद्ध परंपरा है, लेकिन यह विडंबना है कि हमारी आज की आलोचना में उसका कोई संस्कार और स्मृति नहीं है। यह सही है कि शास्त्र कई बार साहित्य के उन्मुक्त उगने-बढ़ने में बाधा बनता है, लेकिन यह भी सही है कि उसके अभाव में साहित्य अपनी मूल संकल्पना से हट भी जाता है। हिंदी में शास्त्र के प्रति अरुचि से माहौल ऐसा बना कि साहित्य कर्म के लिए किसी संस्कार, शिक्षा और अध्यवसाय को गैरजरूरी मान लिया गया। शास्त्र के अभाव में हिंदी में इस धारणा को बल मिला कि साहित्य अनायास है और इसके लिए किसी शिक्षा, संस्कार और अभ्यास की जरूरत नहीं है। आलोचना का एक काम शास्त्र निर्माण और सिद्धांत रचना भी है, लेकिन हिंदी में इस दिशा में कोई पहल ही नहीं हुई। सिद्धांत बने भी तो ये इतने इतने तात्कालिक थे कि चार पांच साल में ही दम तोड़ गए। हमारी परंपरा में एक हजार वर्ष तक भरत, आनंधवर्धन और वामन ने जो सिद्धांत दिए, अगले एक हजार वर्ष तक अभिनव गुप्त, कंतक आदि उनकी व्याख्याएं करके उनको पुनर्नवा करते रहे।
अब अपनी धुरि पर अपने ढंग की आलोचना सध गई है, ऐसा बिल्कुल नहीं है। दुविधाएं और चिंताएं अब भी हैं और आगे भी रहेंगी। ये हमेंशा रहेंगी और बदल-बदल कर रहेंगी। इनके बीच में ही कुछ अलग और नया निकलेगा। अपने सही होने को लेकर दुविधा हमेशा रहेगी, अलबत्ता आप कभी सही कहेंगे, तो आत्मविश्वास जरूर बढ़ेगा।
आलोचना के नये क्षितिज । माधव हाड़ा । शृंखला संपादक : पल्लव। कौटिल्य बुक्स, नई दिल्ली, 2025




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