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भारत में भक्ति की चेतना
'साहित्य तक’ पर श्री जयप्रकाश पांडेय से संवाद भारत में भक्ति की चेतना प्राग्वैदिककाल से निरंतर है। देश के विभिन्न क्षेत्रों की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक ज़रूरतों के तहत इसके कई रूप और प्रवृत्तियाँ रही हैं और सदियों से इनमें अंतःक्रियाएँ और रूपांतरण होता रहा है। भक्ति अगाध अनंत’ (राजपाल एंड संज़ एवं रज़ा न्यास का सह प्रकाशन) में इस सब्को समेटने का प्रयास किया गया है। यह सीमित अवधि का कोई ‘आंदोलन’ या ‘क्रांति’ नहीं है। यह केवल परलोक-व्यग्र चेतना भी नहीं है- मनुष्य की पार्थिव चिंताएँ

Madhav Hada
Nov 5, 20251 min read


मैंने लाख त्रिया चरित्र किए
राजमती । नरपति नाल्ह । बीसलदेवरास ‘बीसलदेवरास’ कुछ विद्वानों के अनुसार हिंदी का पहला काव्य है, लेकिन इसकी रोचक और सरस कथा के संबंध में कम...

Madhav Hada
Sep 13, 202524 min read


पद्मिनी : इतिहास और मिथ
अकसर पद्मिनी-रत्नसेन विषयक देशज ऐतिहासिक कथा-काव्यों को ‘मिथ’ कहा जाता है। 1 यहाँ ‘मिथ’ शब्द का यह प्रयोग व्यापक रूप से मान्य और...

Madhav Hada
Sep 7, 202562 min read
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