ऐसा ही है मेरा जीवन

चोखामेला के अभंगों का हिंदी भाव रूपांतर

बनास जन । अगस्त-अटूबर्, 2026
चोखामेला (1260-1338 ई.) महाराष्ट्र के विख्यात वारकरी दलित संत-भक्त और कवि थे। उन्हें मराठी का पहला दलित कवि भी कहा जाता है। वर्तमान में, दलित पहचान के रूप में बहुधा प्रयुक्त होने वाले अभिवादन ‘जोहार’ का सबसे पहला प्रयोग चोखामेला के अभंगों में मिलता है। उनकी जोहार पर पूरी अभंग शृंखला है। चोखामेला की ख़ास बात यह है कि उन्होंने अपनी दलित चेतना को ही अपनी भक्ति चेतना में बदल दिया। उनके अभंगों में उनके दलित होने की व्यथा बहुत मर्मांतक है। वे अपने को विट्टल पटिल का महार कहते हैं। चोखामेला वारकरी संप्रदाय से संबंधित थे, जो महाराष्ट्र का सबसे अधिक व्यापक, लोकप्रिय, गतिशील और जीवंत भक्ति संप्रदाय रहा है। महाराष्ट्र के सभी प्रमुख संत-भक्त ज्ञानेश्वर (1275-1296 ई.), नामदेव (1270-1350 ई.), एकनाथ (1533-1599 ई.), तुकाराम (1609-1650 ई.), मुक्ताबाई (1279-1297 ई.), बहिनाबाई (1628–1700 ई.) आदि इसी संप्रदाय में हए। दलित होते हुए भी चोखामेला अपने समय और बाद के, संत समाज और जनसाधारण में, बहुत सम्माननीय थे। उनके समकालीन और गुरु रहे नामदेव के अनुसार उन्हें स्वयं भगवान विट्ठल ने अपनाया। चोखामेला के पूज्य और इष्टदेव भगवान् विट्ठल हैं। विट्ठल उनके लिए सगुण और निर्गुण, दोनों एक साथ हैं। उनके भगवान् विट्ठल सर्वत्रव्याप्त, चराचर सृष्टि के मूल और वेदों के सार हैं, लेकिन भक्तों के प्रेम में वे सदियों से हाथ कमर रखकर पंढ़रपुर में ईंट पर खड़े हुए हैं।
चोखामेला दलित हैं, इसलिए उनका भक्ति का स्वर कुछ हद तक अलग है। वे उपदेशक और सुधारक नहीं हैं। उनके अधिकांश अभंग आत्मकथात्मक हैं, जिनमें उन्होंने अपने दलित होने की व्यथा, उपेक्षा, लांछन, प्रताड़न आदि का वर्णन किया है। दलित होने के कारण उनमें शरणागति का भाव और आत्मनिवेदन अधिक मार्मिक है। ईश्वर से अपनी मुक्ति की ‘रुद्ध कंठ और हाथ जोड़कर’ की गई उनकी याचना भी बहुत करुण है। उनके अभंगों में उनके दलित होने से जुड़ी चिंताओं का आत्मसंघर्ष भी है। अपने कुछ अभंगों में उन्होंने अपने साथ दूसरों का भी नाम-स्मरण जैसे मुक्ति के ‘सुगम मार्ग’ पर चलने का आह्वान किया है। चोखामेला आग्रहपूर्वक कवि नहीं हैं- उनकी कविता में कवि होने कोशिश भी नहीं है। चोखामेला की व्यथा और करुण याचना स्वयं कविता है और यह किसी भी बनायी हुई कथित कविता से अच्छी कविता है।
एक संत-भक्त रूप में उनका योगदान अप्रतिम है। उन्होंने ईश्वर के नाम-स्मरण को मुक्ति का सर्वोपरि साधन मानकर भक्ति को दलितों-वंचितों और स्त्रियों के लिए सुलभ कर कर दिया। उन्होंने भक्ति को सभी की शुद्धता का साधन बनाया। उन्होंने खुलकर कहा कि “खटनट यावै। शुद्ध होऊ नी आवै। दवंडी पीटीभावे डोला।“ अर्थात् बुरा हो या भला, सबको आने दो। सब शुद्ध होकर जाओ और ढोल पीटकर सबको बुलाओ। कुछ हद तक वे अन्यायपूर्ण सामाजिक विधान को ईश्वरीय मानकर स्वीकार कर लेते हैं, लेकिन इसको लेकर उनके मन में दुविधा भी है। यही दुविधा ही मनुष्य के मूल्य प्रतिष्ठा की शुरुआत और यात्रा है, जो आगे चलकर हमारे समय के भीमराव आंबेडकर के विचारों में अधिक स्पष्ट और मुखर होकर मनुष्य के मूल्य की प्रतिष्ठा के स्वतंत्र आग्रह के रूप में फलती-फूलती है। भीमराव आंबेडकर ने भी चोखामेला के महत्त्व को स्वीकार किया था। उनके अनुसार उनका कर्तृत्व आसमान जैसा ऊँचा है।
सभी अभंग मराठी संत साहित्य वेबसाइट संत साहित्य, https://www.santsahitya.in/ से साभार लिए गए हैं। भाव रूपांतर के लिए यथावश्यकता चोखामेला के हिंदी और अंग्रेज़ी अनुवादों का सहयोग लिया है। रूपांतरकार सभी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता है।
चोखामेला के ये अभंग ‘कालजयी कवि और उनका काव्य’ शृंखला के अंतर्गत प्रकाशनाधीन पुस्तक चोखामेला (राजपाल एंड संज़, दिल्ली) में संकलित हैं।
रचनाएँ
1.
निराकार और अनाम भगवान्
रूप धारण कर खड़े हैं ईंट पर
वे पुंडलिक के प्रेम में अट्ठाईस युगों से
पाँवों पर खड़े हैं पंढ़रपुर में
चोखा कहता है
भगवान् करते हैं भक्तों से प्रेम
वे रखते हैं उनका मान
2.
साक्षात प्रेम की मूर्ति हैं भगवान् विट्ठल
खुली आँखों से करो उनके दर्शन
हो जाओगे जन्म-मरण की आवाजाही से मुक्त
भव-भय हो जाएगा नष्ट
विट्ठल का प्रताप है ऐसा विलक्षण
गाता और नाचता है चोखा
3.
हे करुणा-सागर
रुक्मिणी के स्वामी उदार, धीर पांडुरंग !
मैं दीन-हीन
कैसे करूँ आपका बखान ?
मैं नहीं जानता
कैसे करते हैं आपका गान ?
आपकी पूजा में क्या है सही
क्या है ग़लत ?
मुझे इस संबंध में नहीं है कोई ज्ञान
चोखा कहता है
मैं सचमुच कुछ नहीं जानता
केवल पड़ा रहता हूँ
आपके मंदिर के महाद्वार पर
4.
मैं बार-बार अपसे
कितनी शिकायत करूँ ?
अब मेरा धैर्य हो गया है ख़त्म
अब कुछ नहीं कहना ही है बुद्धिमानी
मैं पत्थर की तरह पड़ा रहूँगा
आपके द्वार पर
कभी तो आपको मेरी याद आएगी
एक यही भाव धारण किए हुए हूँ
चोखा कहता है
जब मेरी याद आएगी आपको
तो मुझे खोजते हुए
आप ख़ुद आएँगे मेरे पास
5.
मेरी कुल जमा पूँजी है
हर क्षण नाम-स्मरण
मैंने निश्चय कर लिया है
मैं अब नहीं करूँगा व्यर्थ विचार
व्यर्थ किच-किच का क्या लाभ ?
मैं बैठ गया हूँ शांत
हे हरि, मैंने आपके द्वार पर
दे दिया है धरना
मैं यहीं पड़ा रहूँगा
मैं आपसे नहीं मागूँगा कुछ
नहीं करूँगा अपनी किसी से तुलना
गाता रहूँगा आपका नाम
चोखा कहता है
मेरी लाज है आपके हाथ
यह है आप पर
आप कैसे रखते हैं
अपने भक्तों का ध्यान
आपने दिया है
भक्तों की रक्षा का वचन
अब चोखा को दिखा दीजिए
आप हैं वचन के पक्के
6.
कितनी ही करूँ व्यर्थ दौड़-धूप
मैं नहीं समझ पाया
क्या है इसका हानि-लाभ?
मैं जो भी करता हूँ
हो जाता है निष्फल
मैं व्यर्थ भोग रहा हूँ दुःख-कष्ट
मैं सब छोड़कर करता हूँ
अपके नाम-स्मरण
मेरा मन नहीं रहता स्थिर
दान-धर्म के लिए नहीं है मेरे पास धन
मैं जन्म से ही भिखारी
चोखा कहता है
हे देवा, मैं हूँ ऐसा अभागा
अब मैं कैसे करूँ आपकी सेवा?
7.
ऐसा ही करना था
तो क्यों दिया मुझे जन्म?
जन्म देकर मुझे क्यों छोड़ दिया एकाकी
आपको दिखाई नहीं देती मेरी वेदना
आप क्यों हो गए इतने निष्ठुर
जब मुझे थी आपकी ज़रूरत
तो कहाँ चले गए थे आप?
आप उस समय कहाँ थे व्यस्त ?
हे केशव !
अब चाहे जो कुछ भी हो
मुझे मत छोड़ें एकाकी
8.
कौन है पवित्र?
कौन है अपवित्र?
इनसे दोनों से अलग हैं मेरे विठ्ठल
किसको-किसकी छूत लगी है
मूलतः सब हैं पवित्र
पाँच तत्त्वों की अपवित्रता
है सबके शरीर में
फिर कौन कर सकता है
अपने पवित्र होने दावा?
चोखा कहता है
मेरे विठ्ठल हैं सबसे पवित्र
ईंट पर खड़े हुए
वे हैं सबसे अलग
9.
यदि जन्म है अपवित्र सूतक
यदि मृत्य भी है यही
तो जो शुद्ध जीवित हैं
वे भी अंत में हो जाएँगे अपवित्र
रोते-बिलखते मर जाते हैं लोग
भूलकर भ्रम में
नहीं करते ईश्वर का गुणगान
इस देह का इतना अभिमान क्यों?
जिसे समझते हो
सुख का साधन
अंत में छोड़ जाएगी तुम्हार साथ
चोखा कहता है
कोई मत करो इसका भरोसा
अंत में यम का बंधन पड़ेगा गले में
10.
अछूत के स्पर्श से
भगवान् हो गए अपवित्र
पानी से नहला कर
लोग करते हैं उनको शुद्ध
देखनेवाले की दृष्टि का है खोट
मूल में ईश्वर नहीं होते
शुद्ध या अशुद्ध
जब अपने को शुद्ध मानने वालों के यहाँ
वे रहते हैं शुद्ध
तो अपने को अशुद्ध मानने वालों के पास
क्यों नहीं रह सकते अशुद्ध?
चोखा कहता है
अपनी आँखों से
मैंने किए हैं उनके दर्शन
वे शुद्ध-अशुध से हैं परे और अलग
7.
पंच तत्त्वों से निर्मित है
सभी का शरीर, सारा संसार
सभी निर्मित हैं पंच तत्त्वों से
तो फिर कौन है पवित्र
कौन है अपवित्र ?
सभी के पास है समान शरीर
यदि जन्म है अशुद्धि
मृत्य भी है अपवित्र
फिर कौन है जो करता है
अपने पवित्र होने का दावा ?
8.
मेरा शरीर नहीं है शुद्ध नहीं
मेरी जाति है अशुभ
मुझमें भरी हुई हैं बुराइयाँ
मैं करता हूँ विचार
तो मेरे चारों तरफ़ है अनाचार
और क्या मैं कहूँ
मेरी वाणी नहीं है शुद्ध
मुझे नहीं आता वाक्-चातुर्य
सब लोग धिक्कारते हैं मुझे
कोई भी नहीं बैठता मेरे पास
कोई नहीं छूता मुझे
ऐसा ही है मेरा जीवन
9.
हे करुणाकर !
हे रुक्मिणी के स्वामी !
हे उदार और धीर पांडुरंग !
मैं पामर नही जानता आपका
आपका प्रशस्ति गान
मुझे नहीं है ज्ञान
इसकी विधि-अविधि का
मुझे नहीं आते कर्मकांड
मैं कुछ भी नहीं जानता-समझता
इसलिए पड़ा हूँ चुपचाप
आपके मंदिर के महाद्वार पर
10.
गन्ना है टेढ़ा-मेढ़ा
लेकिन रस है उसमें पूरा
धनुष है आड़ा-तिरछा
लेकिन तीर लगता है निशाने पर
नदी नहीं बहती सीधी
लेकिन उसके जल में नहीं है कोई खोट
चोखा है कुरूप और नीच
लेकिन उसकी भक्ति है पूर्ण और पवित्र
रंग-रूप है केवल दिखावा
क्या करना है उसका?
11.
हे केशिराज[1]!
कोई अच्छा और कोई बुरा
आप क्यों करते हैं लोगों में भेदभाव?
मुझे होता है आश्चर्य
एक को सिंहासन, पहनने को वस्त्र
दूसरा भटकता है नग्न
एक को ख़राब अन्न, दूसरे को मिष्ठान्न
और कुछ ऐसे भी हैं
जिनको नहीं माँगने पर भी
नहीं मिलता कोरा अन्न
एक पास वैभव और राज्यपद
दूसरा माँगता है गाँव-गाँव भीख
चोखा पूछता है
क्या यही आपका न्याय?
या फिर यह है कर्मों का फल
12.
अब दौड़कर आओ
मत चलो धीरे-धीरे
ये बड़वे[2] मार रहे हैं मुझे
आख़िर क्या है मेरा अपराध ?
वे पूछते हैं मुझसे
कैसे आया विठोबा का हार तुम्हारे गले में?
वे दे रहे हैं मुझे गालियाँ
पीट रहे हैं मुझे
वे कहते हैं
मेरी छूने से भगवान् हो गए हैं अपवित्र
हे दाता !
मैं हूँ आपके द्वार का कुत्ता
मुझे मत कीजिए दूर
हे चक्रपाणि !
मेरी इस हालत के जिम्मेदार हैं आप
[1] केशवराज, भगवान् विट्ठल
[2] ब्राह्मण, पुजारी




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