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चलो अगम के देश :मीरां का जीवन और कविता
संंपादन : माधव हाड़ा । प्रदीप त्रिखा
साहित्य अकादेमी ,नई दिल्ली , 2026 | मूल्य : रु. 400 | ISBN : 978-93-6183-090-7
परिचय । I INTRODUCTION
यह साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली और जनार्दन राय नागर विद्यापीठ विश्वविद्यालय, उदयपुर संयुक्त तत्त्वावधान में 21 एवं 22 फ़रवरी, 2025 को उदयपुर संपन्न मीरां महोत्सव के अवसर पर आयोज्य राष्ट्रीय संगोष्ठी में पढ़े गए आलेखों का संकलन है। संकलन की पूर्णता के लिए मीरां साहित्य के विशेषज्ञों से कुछ और आलेख निमंत्रित कर इसमें सम्मिलित किए गए हैं। मीरां भारतीय भक्ति-चेतना का प्रतिनिधि स्त्री स्वर है और ख़ास बात यह है कि यह निरंतर जीवंत और प्रासंगिक है। मीराँ की लोकव्याप्ति बहुत है। उनकी रचनाएँ कई भारतीय भाषाओं में मिलती हैं। साहित्य अकादेमी के हिन्दी परामर्श मंडल ने यही ध्यान में रखकर एक मीरां-महोत्सव का प्रस्ताव किया। यह भी तय किया गया कि उसमें हिंदीतर उर्दू, राजस्थानी, गुजराती, कश्मीरी, डोगरी आदि भाषाओं के मीरां साहित्य से सबंधित विदवानों को भी निमंत्रित किया जाए। संगोष्ठी में उद्घाटन और समापन के अलावा तीन विचार सत्र हुए। उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलाधिपति सम्माननीय श्री भँवरलाल गुर्जर ने की और उद्घाटन भाषण विश्वविद्यालय के सम्माननीय कुलपति प्रो. शिवसिंह सारंगदेवोत ने दिया। हिंदी के विख्यात समालोचक प्रो. विजयबहादुर सिंह उद्घाटन समारोह के मुख्य अतिथि थे और इसमें अकादेमी के ओर से स्वागत वक्तव्य अकादेमी के उपसचिव श्री देवेंद्रकुमार देवश ने दिया। समापन समारोह में समापन भाषण गुजराती के विख्यात साहित्यकार प्रो. बलवंत जानी ने दिया और इसकी अध्यक्षता सम्माननीय कुलपति प्रो. शिवसिंह सारंगदेवोत ने की। महोत्सव के पहले दिन सायंकाल मीरां के भजनों के गायन का कार्यक्रम हुआ, जिसमें मुंबई की श्रीमती निहारिका सिन्हा और विख्यात लंगा कलाकार श्री भुट्टे ख़ान और उनके दल ने अपनी प्रस्तुतियाँ दीं।
हिंदी परामर्श मंडल ने अपनी बैठक में अकादेमी की नीति निर्णय किया कि गोष्ठी में पढ़े गए आलेखों को पुस्तकाकार प्रकाशित किया जाए। संकलन में विचार सत्रों में सहभागी प्रो. बलवंत जानी, प्रो, विजय बहादुर सिंह, प्रो मलय पानेरी, प्रो. मंजु चतुर्वेदी, प्रो. ब्रजरतन जोशी, प्रो. सरवत ख़ान, डॉ रउफ़ अहमद आदिल, श्री खजूरसिंह ठाकुर और डॉ. विशाल विक्रम सिंह ने सहभागिता की। गोष्ठी अंतरअनुशासनिक थी- इसमें पुरातत्त्वविद् प्रो. जीवनसिंह खरकरवाल और इतिहासविद् डॉ. हेमेंद्र चौधरी भी ने अपने विचार रखे। यहाँ संकलित आलेखों में प्रो. बलवंत जानी ने मीरां के पदावली में उसकी उभरने वाली पहचान पर विचार किया है। उन्होंने इस निमित्त साक्ष्य के रूप में मीरां की गुजराती में उपलब्ध रचनाओं को उद्धृत किया है। प्रो. विजय बहादुर सिंह ने अपने आलेख में मीरां के परंपरा-भिन्न और अनूठे कवि-व्यक्तित्व को अपनी निगाह में लिया है। प्रो. मलय पानेरी, प्रो. मंजु चतुर्वेदी और डॉ. विशालविक्रम सिंह के आलेख मीरां के जीवन के परिप्रेक्ष्य में उनकी कविता का आकलन और मूल्यांकन प्रस्तुत करते हैं। प्रो. ब्रजरतन जोशी ने मीराँ की कविता पर सर्वथा नए ढंग से विचार किया है- उनका मानना है कि मीरां सबसे पहले कवयित्री है। डॉ. खजूरसिंह ठाकुर डॉ. श्री रउफ़ अहमद आदिल के आलेख मीरां की लोकव्याप्ति के प्रमाण हैं। खजूरसिंह ठाकुर ने अपने आलेख में डोगरी भाषा में मीरां कविता की मौजूदगी पर विचार किया है, जबकि रउफ़ अहमद आदिल ने अपने आलेख में कश्मीर की विख्यात संत कवयित्री ललद्यद के साथ मीरां की तुलना की है। प्रो. जीवनसिंह खरकवाल का शोध आलेख सर्वथा नये विषय पर एकाग्र है- यह मध्यकाल में मीरां द्वारा की गई यात्राओं और मार्ग में आनेवाले स्थलों का पहली बार ऐतिहासिक-पुरातात्त्विक विवरण प्रस्तुत करता है। डॉ. हेमेंद्र चौधरी का आलेख भी मीरां के संबंध में सर्वथा नयी ऐतिहासिक जानकारियाँ प्रस्तुत करता है- उन्होंने अपने आलेख में उदयपुर स्थित जगतशिरोमणि मंदिर में उत्कीर्ण मीरां की जीव यात्रा और वहाँ उपलब्ध शिलालेख पर विचार किया है।
डॉ पल्लव, डॉ. लोकेशकुमार गुप्ता, डॉ रेणु व्यास, डॉ. एकता मंडल और डॉ. विमलेश शर्मा के आलेख संकलन की पूर्णता के लिए बाद में आमंत्रित किए गए हैं। सुप्रसिद्ध आलोचक-संपादक डॉ. पल्लव ने मीरां के जीवन और कविता में अंतर्निहित प्रतिरोध की चेतना पर नए सिरे से विचार किया है। डॉ. लोकेशकुमार गुप्ता का आलेख भी मीरां के जीवन और कविता के कुछ नए पहलू हमारे सामने रखता हैं। युवा समालोचक डॉ. रेणु व्यास ने हिंदी आलोचना ने मीरां के जीवन और कविता पर हुए अब तक हुए विचार की मीमांसा प्रस्तुत की है। डॉ. एकता मंडल ने अपने मीरां बनाम पितृसत्ता पर नए ढंग से विचार किया है। डॉ. विमलेश का आलेख समावेशी है- यह मीरां की जीवन और कविता के कई पहलुओं को अपने भीतर समेटता है।
संगोष्ठी की सफलता का श्रेय अकादेमी के सम्मानीय अध्यक्ष श्री माधव कौशिक, उपाध्यक्ष प्रो. कुमुद शर्मा, हिन्दी परामर्श मंडल के संयोजक श्री गोविन्द मिश्र और विश्वविद्यालय के उदार और समावेशी दृष्टिकोणवाले कुलपति प्रो. शिवसिंह सारंगदेवोत को जाता है। संकलन को यह रूप देने में साहित्य आकादेमी के सचिव डॉ. के. श्रीनिवासराव का प्रोत्साहन बहुत उत्साहवर्धक रहा। साहित्य अकादेमी के उपसचिव श्री देवेंद्रकुमार देवेश, सहायक संपादक श्री अजय शर्मा और विश्वविद्यालय की मीरां शोधपीठ के प्रभारी श्री यज्ञ आमेटा की भी इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका है। यह संकलन इस रूप में आपके हाथों नहीं होता, यदि संगोष्ठी में सहभागी और अन्य विद्वान् बहुत तत्परता और उदारतापूर्वक ये आलेख हमें उपलब्ध नहीं करवाते। हम इस उपक्रम में सहभागी सभी महानुभाव के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं।
आशा है, यह संकलन मध्यकाल की आज भी जीवंत और प्रासंगिक महत्त्वपूर्ण संत-भक्त और कवयित्री मीरां को नए सिरे से समझने में मददगार सिद्ध होगा।
