भारतीय भक्तिचेतना : पहचान , व्याप्ति और वर्गीकरण का पुनरवलोकन
राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
ISBN 978-9377372439 | 2026 | रु. 350
परिचय । INTRODUCTION
भारतीय भक्ति-चेतना के संबंध में उपनिवेशकालीन पश्चिमी ज्ञानमीमांसा और उसके वर्चस्व में पली-बढी आरंभिक भारतीय मनीषा ने यह मान लिया है कि यह ईसाइयत और इस्लाम से संपर्क की देन है, यह यूरोपीय ‘रिनेसाँ’ के समान ‘बिजली की कौंध’ तरह प्रकट हुई, इसमें एकरूपता और संगति नहीं है, इसकी चिंताएँ और सरोकार पारलौकिक हैं, यह अपने चरित्र में एकवचन है और इसकी रचनाएँ श्रुत और स्मृत हैं, इसलिए अप्रामाणिक हैं। यह किताब विमर्श में लगभग मान्य हो गईं इन धारणाओं का पुनरवलोकन है।
भारत में भक्ति प्राग्वैदिककाल से निरंतर है और इसमें कभी कोई व्यवधान और विच्छेद नहीं आया। यह कोई आंदोलन, जागरण और पुनर्जागरण नहीं है, जैसा कि मान लिया गया है। इस्लाम और ईसाई धर्म से यह प्रभावित हुई, लेकिन यह उनके कारण पैदा हुई, यह धारणा निराधार है। रामानुज ने भक्ति को सैद्धांतिक आधार दिया, लेकिन उनसे पहले इसकी मौजूदगी आलवारों और नायनारों की रचनाओं में सदियों से थी। यह सही है कि भक्ति और साहित्य में लोकोत्तर की चिंता है, लेकिन यह लोकोत्तर पार्थिव का ही विस्तार है। देशभाषाओं में भक्ति का होना भारतीय साहित्य के इतिहास की बड़ी परिघटना है। देशभाषाओं में आने से पहले भक्ति की नागरिकता सीमित थी, लेकिन इनमें आने के बाद इसका दायरा बहुत विस्तृत हो गया। देशभाषाएँ संस्कृत के बरक्स जिस हीनता-बोध से ग्रस्त थीं, उसकी जगह इनमें स्वाभिमान का भाव आ गया।
यह भी सही है कि इन रचनाओं में इस-उस ज़रूरत और आग्रह से उलट-फेर और रद्दोबदल हुए हैं, जिसको कुछ विद्वान् ‘एप्रोप्रियेशन’ कहते हैं। यह प्रक्रिया असाधारण नहीं है- यह किसी भी जीवंत और गतिशील समाज में चलने वाली स्वाभाविक प्रक्रिया है। भक्ति-चेतना और उसका अधिकांश साहित्य स्वतंत्रचेता संत-भक्तों का सहित्य है, इसलिए यह अपनी प्रकृति में ही बहुवचन है। अधिकांश भक्ति-चेतना का साहित्य ‘श्रुत’ और ‘स्मृत’ पर निर्भर है, लेकिन इस कारण यह अप्रामाणिक या संदिग्ध नहीं हो जाता। मौखिक का भारतीय परंपरा में बहुत महत्त्व है और सदियों से वेदों सहित अधिकांश भारतीय साहित्य ‘श्रुत’ और ‘स्मृत’ में ही सुरक्षित रहा है।
भारतीय भक्ति-चेतना और उसके साहित्य की पहचान सदियों के सुनियोजित और निरंतर झूठ में कहीं खो गई है। यह किताब उस तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्त करने में सहायक सिद्ध होगी, ऐसी आशा है।

