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पद्मिनी : आख्यान, इतिहास, संस्कृति और जीवन मूल्य

Writer: Madhav Hada
Madhav Hada
Sep 5
35 min read

पद्मिनी-रत्नसेन प्रकरण सदियों से लोक स्मृति में ‘मान्य सत्य’ की तरह रहा है। सोलहवीं से उन्नीसवीं सदी तक इस प्रकरण पर निरंतर कथा-काव्य रचनाएँ होती रही हैं और ये अपने चरित्र और प्रकृति में कुछ हद तक ‘इतिहास’ भी हैं। विडंबना यह है कि यह प्रकरण बीसवीं  सदी के छठे-सातवें और इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में व्यापक चर्चा में तो रहा, लेकिन इसकी परख-पड़ताल में इस्लामी, फ़ारसी-अरबी स्रोतों की तुलना में इन रचनाओं का उपयोग नहीं के बराबर हुआ। अधिकांश आधुनिक इतिहासकारों ने इन देशज रचनाओं के बजाय अलाउद्दीन ख़लजी के समकालीन इस्लामी वृत्तांतों- अमीर ख़ुसरो कृत ख़ज़ाइन-उल-फ़ुतूह (1311-12 ई.) और दिबलरानी तथा ख़िज़्र ख़ाँ (1318-19 ई.), ज़ियाउद्दीन बरनी कृत तारीख़-ए-फ़िरोजशाही (1357 ई.) तथा अब्दुल मलिक एसामी कृत फ़ुतूह-उस-सलातीन (1350 ई.) को ही अपनी स्थापनाओं में साक्ष्य की तरह इस्तेमाल किया। उन्होंने इनमें अनुल्लेख के आधार पर देशज रचनाओं को मलिक मुहम्मद जायसी की पद्मावत (1540 ई.) पर निर्भर मानते हुए इस प्रकरण और इन रचनाओं को कल्पित ठहरा दिया। कालिकारंजन कानूनगो की 1960 ई. में प्रकाशित पुस्तक स्टडीज़ इन राजपूत हिट्री के एक लेख “ए क्रिटिकल एनेलेसिस ऑफ़ दि पद्मिनी लिजेंड” की ख़ूब चर्चा हुई, जिसमें उन्होंने इस प्रकरण को पूरी तरह कल्पना मानकर ख़ारिज़ कर दिया। इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस के 1961 ई. अधिवेशन में इतिहासकार दशरथ शर्मा ने कालिकारंजन कानूनगो द्वारा इस्लामी वृत्तांतों की चुप्पी के आधार पर इस प्रकरण को कल्पित ठहराये जाने पर आपत्ति की थी। उन्होंने कहा था कि “उन्होंने (कालिकारंजन कानूनगो) इस तथ्य को ध्यान में नहीं रखा कि मौन से बहस करना तार्किक रूप से भ्रांति है और मात्र मौन के आधार पर की गई परिकल्पना किसी दिन ग़लत साबित हो सकती है।”1 दशरथ शर्मा कालिकारंजन कानूनगो की तुलना में छोटे इतिहासकार थे- उनकी हैसियत क्षेत्रीय इतिहासकार की थी। यह आज़ादी के तत्काल बाद का समय था- इतिहास लेखन में आधुनिकता और उससे प्रभावित सार्वदेशिक वृत्तांतों और आख्यानों का दौर था। उनकी बात आयी-गयी हो गयी- उस पर ध्यान बहुत कम लोगों ने दिया। अब जब इतिहास लेखन में सार्वदेशिक वृत्तांतों और आख्यानों की जगह क्षेत्रीय और देशज का आग्रह और उन पर निर्भरता बढ़ रही है, तो दशरथ शर्मा की इन पंक्तियों का महत्त्व बढ़ गया है। क्या किसी एक रचना या दस्तावेज़ में जो नहीं है या उसका रचनाकार जिसके संबंध में मौन है, उसको महज़ इस आधार पर ‘नहीं है’ कहा जा सकता है? क्या इस तरह का निष्कर्ष तर्कसंगत है? जो एक जगह नहीं है, तो फिर किसी और जगह भी नहीं होगा- यह केवल संभावना या परिकल्पना है और संभावना और परिकल्पना पर निर्भरता तो ‘आधुनिक’ इतिहास की अभिलक्षणाओं में नहीं आती। विडंबना यह है कि जिस तर्क से कानूनगो पद्मिनी कथा को ‘मिथ’ या ‘कल्पित’ कहकर ख़ारिज करते हैं, उसी तर्क से वे पद्मिनी के संबंध में ‘नहीं है’ का निष्कर्ष निकाल लेते हैं। पद्मिनी देशज कथा-काव्यों में है, वंश-प्रशस्ति प्रधान संस्कृत रचनाओं में है और सदियों से लोक स्मृति और स्मारकों में है, लेकिन उनके हिसाब से कोई एक इस संबंध में मौन है, इसलिए वह दूसरी जगह भी कैसे हो सकती है? दशरथ शर्मा की बात उस समय नही सुनी गयी, लेकिन जो उन्होंने कहा उसमें में वे यही तो कहना चाहते थे कि अगर वह वहाँ नहीं है, तो उसके कहीं और होने की संभावना तो है। विडंबना यह है कि पद्मिनी एक अमीर ख़ुसरो की ‘चुप’ के बाहर सब जगह थी, लेकिन केवल एक ‘चुप’ के आधार पर उसका अस्तित्व संदिग्ध कर दिया गया। क्या इस तरह एक चुप पर पर निर्भरता और उसका इस तरह आग्रह दुराग्रह नहीं है?  

साहित्य में कल्पना भी होती है, लेकिन यह कहना सरलीकरण होगा कि उसमें इतिहास नहीं होता। सही तो यह है कि उसमें इतिहास भी होता है, कल्पना भी होती है और कभी-कभी कल्पना और इतिहास, दोनों एक साथ भी होते हैं। इतिहास साहित्य नहीं होता- वह केवल तथ्यों का समूह होता है, यह कहने वाले भी जानते हैं कि इतिहास में तथ्य होता है, लेकिन उसमें तथ्य से आगे और अलग भी बहुत कुछ होता है- उसमें संभावना और परिकल्पना भी होती है। किसी भी आख्यान का, यदि यह तथ्यनिर्भर आख्यान भी है तो भी, उसका प्रस्थान कमोबेश कल्पना से ही होता है और आगे भी उसके तथ्यों के संयोजन में कल्पना का भी कुछ योग तो रहता ही है। यह तो ई.एच. कार ने भी कहा था कि “इतिहास के तथ्य कभी हमें शुद्ध रूप में नहीं मिलते, क्योंकि शुद्ध रूप में न वे कभी रहते हैं और न रह सकते हैं; वे हमेशा लेखक के मस्तिष्क में रंगकर आते हैं।”2 ख़ज़ाइन-उल-फ़ुतूह पद्मिनी के संबंध में मौन है, तो यह केवल तथ्यों का समूह है, यह तो किसी इतिहासकार या विद्वान् ने नहीं कहा। विशेषज्ञ तो इसके संबंध में यह भी कहते हैं कि यह घोर अलंकरण और अतिरंजना प्रधान रचना है।3 कहा तो यह भी गया है कि अमीर ख़ुसरो ने इसमें इतिहास नहीं, कविता लिखी है।4 कविता तो हेमरतन, लब्धोदय, दलपति विजय आदि ने भी लिखी और उसमें पदमिनी है, लेकिन कानूनगो सहित कई आधुनिक इतिहासकारों का मानना है कि उनकी पद्मिनी के संबंध में ‘मुखरता’ तथ्य नहीं है, लेकिन ख़ज़ाइन-उल-फ़ुतूह का ‘मौन’ तथ्य है। यह कैसा इतिहास बोध है, जो मुखरता की अनदेखी और मौन का सम्मान करता है? किसी ने भी इस तथ्य भी पर ध्यान ही नही दिया कि इस्लामी वृत्तांतकारों का मौन प्रयोजनपूर्वक है। ये वृत्तांतकार एक तो इस्लामी धर्मशास्त्र से बँधे हुए थे और दूसरे, उस समय के रिवाज़ के मुताबिक सुल्तान की सराहना और उसकी कमज़ोरियों की छिपाना इनकी आदत और मजबूरी है।

अधिकांश आधुनिक इतिहासकार मध्यकालीन देशज ऐतिहासिक कथा-काव्यों से उन्नीसवीं सदी के यूरोपीय ढंग के इतिहास की अपेक्षा करते हैं, जो ग़लत है। यह मध्यकालीन शरीर में आधुनिक आत्मा के प्रवेश द्वारा मध्यकालीन अनुभव पाने का निरर्थक प्रयास है। ज़ाहिर है, इस तरह का प्रयास मध्यकालीन और आधुनिक, दोनों प्रकार के अनुभवों से अलग, विचित्र क़िस्म का अनुभव होगा। मध्यकाल को उसके अपने शरीर में, उसकी अपनी आत्मा के साथ अच्छी तरह से समझा जा सकता है। विवेच्य रचनाओं को यहाँ उनके अपने मध्यकालीन सरोकारों, सांस्कृतिक व्यवहारों, विचारधाराओं, साहित्यिक प्रथाओं आदि के साथ समझने का विनम्र प्रयास है। यहाँ आग्रहपूर्वक निर्भरता कथित ‘आधुनिक’ के बजाय ‘देशज’ स्रोतों पर है ज़्यादा है। ‘देशज’ का ‘प्रामाणिक’ के विलोम शब्द के रूप में चलन इतिहास की आधुनिक धारणा के विकास के साथ हुआ। अधिकांश यूरोपीय विद्वानों की धारणा यह है कि इतिहास का ज्ञान के एक अनुशासन के रूप में विकास उनके पूर्वजों ने किया। उनको अपने ग्रीक और रोमन पूर्वजों के स्मृति के रख-रखाव की पद्धति और ढंग पर गर्व भी बहुत है। मार्क ब्लाख़ ने लिखा है कि “औरों से भिन्न हमारी सभ्यता अपनी स्मृतियों के प्रति बेहद सतर्क रही है।”5 इतिहास की उनकी अपनी ख़ास ऐतिहासिक-सांस्कृतिक ज़रूरतों के अनुसार विकसित यह पद्धति उनकी दूसरी चीजों की तरह सार्वभौमिक आदर्श और मानक बन गई। अपने साम्राज्य के अधीन होने के कारण विश्व के कई देश-समाजों का आरंभिक इतिहास भी यूरोपीय इतिहासकारों ने इसी पद्धति के आधार पर लिखा। उन्होंने अपने शासित क्षेत्रों की ज्ञान संपदा को ‘देशज’ (vernacular), इसलिए कुछ हद तक अप्रामाणिक की श्रेणी में रख दिया। यूरोप से अभिभूत और उससे प्रभावित आरंभिक अधिकांश भारतीय मनीषा भी यही करती रही। आरंभिक अधिकांश उत्साही ‘आधुनिक’ भारतीय विद्वान् भी ‘आधुनिक’ इतिहास के आदर्श और मानक लेकर अपनी विरासत की पहचान और पड़ताल करने निकल पड़े। उन्होंने भी यूरोपीय विद्वानों की तरह अपने पूर्वजों के स्मृति के रख-रखाव के ढंग को बेतुका और ‘अपरिष्कृत’ मान लिया। कुछ भारतीय विद्वानों का यह मानना कि यूरोपीय विद्वानों ने भारतीय स्रोतों को अच्छी तरह समझा-परख़ा है6, कुछ हद तक ही सही है। देशज के प्रति हिकारत का औपनिवेशक संस्कार अधिकांश यूरोपीय विद्वानों की चेतना में बद्धमूल है। यह देशज’ हमेशा अप्रामाणिक ही होता है, यह एक तरह का सरलीकरण है। किसी समाज की आत्मा को अच्छी और पूरी तरह से देशज स्रोतों से समझा जा सकता है। रवींद्रनाथ ठाकुर ने सही कहा था कि “अंग्रेज़ हो चाहे फ्रेंच या किसी अन्य देश का वासी, कोई भी इस मामले में एक शब्द में जवाब नहीं दे सकते: किसी के अपने देश का विशिष्ट दृष्टिकोण क्या है या उसकी आत्मा का वास्तविक स्थान कहाँ है? शरीर के अंदर जीवन की तरह यह आत्मा एक सीधी अवधारणात्मक वास्तविकता है। और जीवन की तरह, केवल तार्किक परिभाषाओं के माध्यम से इसे समझना बेहद मुश्किल है। बचपन से ही यह विभिन्न रूपों में, विविध मार्गों के माध्यम से हमारे अन्दर प्रविष्ट होती है; और यह हमारे ज्ञान, हमारे प्यार, हमारी कल्पना में समाहित हो जाती है।”7 विवेच्य ऐतिहासिक देशज कथा-काव्यों की यह परंपरा सोलहवीं से उन्नीसवीं तक, चार शताब्दियों में फैली हुई है, इसलिए इसमें देशकाल के वैविध्य के अनुसार पर्याप्त ‘इधर-उधर’ हुआ है, लेकिन बावजूद इसके मूल प्रकरण की स्मृति इन सभी रचनाओं की बुनियाद में है। 

भारतीय ऐतिहासिक कथा-काव्य परंपरा के अनुसार, विवेच्य पद्मिनी विषयक देशज रचनाएँ सीधे-सीधे यथार्थ नहीं, यथार्थ का प्रतिबिंबन हैं- यह यथार्थ कवि-कथाकर का अपना देखा गया यथार्थ है। यह यूरोपीय इतिहास के यथार्थ की तरह ‘दस्तावेज़ी’, ‘प्रत्यक्ष’ और ‘आनुभविक’ नहीं है, इसलिए केवल कल्पना है, इस तरह का आग्रह भी सही नहीं है। रवींद्रनाथ ठाकुर ने कहीं कहा था कि “सब खेतों में एक जैसी फ़सलें नहीं होतीं।”8 यह फ़सल आपके खेत की फ़सल से अलग है, इसलिए फ़सल ही नहीं है, यह मानना एक तरह का दुराग्रह है। आरंभिक भारतीय मनीषा ने ‘श्रुत’ को बहुत महत्त्व दिया था और उसकी निर्भरता भी कमोबेश श्रुत पर ही थी। बहुत महत्त्वपूर्ण भारतीय आख्यान श्रुत की परंपरा से ही हम तक आए हैं। यह विडंबना है कि जिस समाज में श्रुत की इतनी निरंतर और समृद्ध परंपरा है, वहाँ लोक स्मृति पर निर्भर रचनाओं को केवल ‘गल्प’ की श्रेणी में रखा जाता है। ये रचनाकार गाँव-क़स्बों के अनौपचारिक कवि शिक्षा प्राप्त कवि-कथाकार थे और ‘श्रुत’ पर निर्भर थे। अपनी तरफ़ से इन्होंने नया बहुत कम गढ़ा है- इन्होंने रचनात्मक आग्रह के कारण प्रकरण के मोड़-पड़ावों को केवल इधर-उधर या उनका सरलीकरण किया है। यह इधर-उधर भी इन्होंने उतना ही किया है, जितने की अनुमति परंपरा देती है। यह बात इनमें से से कुछ ने ज़ोर देकर कही भी है। हेमरतन ने कहा भी है कि- सुणिउ तिसौ भाष्यौ संबंधि अर्थात् मैंने जैसा सुना है, वैसा ही संबंध कहा है।9 लब्धोदय ने भी कहा है कि- कहस्यू कवित्त कल्लोल सूँ पूर्व कथा संपेख अर्थात् प्रसन्नतापूर्वक पूर्व कथा को देखकर कहूँगा।10 दलपति विजय ने खुम्माणरासो के पद्मिनी खंड का समाहार करते इसको ‘किंचित पूर्वोक्तम्’ और ‘किंचित ग्रंथाधिकारेण’ कहा है।11  

विवेच्य रचनाएँ चारण और जैन साहित्य की पारंपरिक कथा-काव्य निर्मितियों में हैं, इसलिए भी विद्वानों ने इनको ‘राज्याश्रित’ या ‘धार्मिक’ कहकर दरकिनार किया। मध्यकालीन यूरोपीय और भारतीय इस्लामी इतिहास लेखन के विपरीत, भारत में पारंपरिक इतिहास लेखन धर्मशास्त्र का भाग कभी नहीं रहा। ये रचनाएँ पूरी तरह ग़ैर धार्मिक रचनाएँ हैं। यूरोपीय मध्यकालीन इतिहास अनिवार्यतः क्रिश्चियन धर्म-शास्त्र के अंतर्गत था और यह प्रायः पादरियों द्वारा चर्च में लिखा गया।12 मार्क ब्लाख़ का तो साफ़ कहना था कि‌ “ईसाइयत इतिहासकारों का धर्म है।”13  भारतीय इस्लामी इतिहास लेखन भी धर्मशास्त्र के अंतर्गत और उसका एक भाग था।14 ‘राज्याश्रय’ भी इन रचनाओं की विषयवस्तु के नियमन में बहुत निर्णायक नहीं है, क्योंकि मध्यकालीन क्षेत्रीय शासक बहुत वर्चस्वकारी नहीं थे। चारण और जैन कवि ‘राज्याश्रय’ या शासकीय प्रभाव के बजाय पारंपरिक और पैतृक कवि शिक्षा पर अधिक निर्भर थे।

परंपरानुसार ये रचनाएँ ‘कथा-काव्य’ भी हैं, इसलिए भी अधिकांश आधुनिक इतिहासकारों ने इनको ‘काल्पनिक’ और ‘मनगढ़ंत’ की श्रेणी डाल दिया गया। ख़ास बात यह है कि इन रचनाओं का विन्यास इतिहास और कथा-काव्य की सदियों पुरानी जुगलबंदी की भारतीय परंपरा में है। यह तथ्य नज़रअंदाज़ कर दिया गया कि भारतीय परंपरा में ‘इतिहास’ कथा-काव्य में ही रच-बसकर ही आता है, इसलिए यहाँ कई बार इतिहास रचनाओं को ‘कथा’ कहा गया है। इतिहास और साहित्य दो अलग स्वायत्त अनुशासन हैं, यह चेतना भारतीय परंपरा में बहुत मुखर कभी नहीं रही, इसलिए इसमें कथा प्रकृति की रचनाओं में इतिहास का योग हमेशा रहा है। रवींद्रनाथ ठाकुर ने एक जगह लिखा है कि- “एक समय था, जब रामायण-महाभारत इतिहास थे। आजकल का इतिहास उसके साथ पारिवारिक रिश्ता स्वीकार करने में अनवरत कुंठित महसूस करता है; कहता है काव्य के साथ परिणीत होकर उसका कुल नष्ट हुआ है। अब उसके कुल का उद्धार करना इतना कठिन हो गया है कि इतिहास काव्य कह कर उसका परिचय देना चाहता है। काव्य कहता है, भाई इतिहास तुम्हारे भीतर बहुत कुछ मिथ्या है, मेरे भीतर भी बहुत कुछ सच है। आओ, हम पहले की तरह एक-दूसरे के साथ मिलकर रहें।”15        

1.

पद्मिनी-रत्नसेन प्रकरण पर निर्भर देशज ऐतिहासिक कथा-काव्य भारतीय ऐतिहासिक कथा-काव्य परंपरा की निरंतरता में उसका देशज रूपांतरण हैं। सभी देश-समाजों का इतिहास एक जैसा हो, यह आग्रह सिरे से ही ग़लत है। सभी समाजों की अपनी ऐतिहासिक-सांस्कृतिक ज़रूरत, दर्शन और विचारधारा के तहत बनी अपनी इतिहास चेतना होती है। ऋग्वैदिककाल से ही स्मृति के संरक्षण की भारतीय इतिहास चेतना और उसकी परंपरा भी है। भारतीय इतिहास चेतना और उसके साहित्य में निवेश की पद्धति की अपनी कुछ विशेषताएँ हैं और इनमें से कुछ ऐसी विशेषताएँ भी हैं, जो इसको यूरोपीय इतिहास चेतना से अलग करती हैं। यह कहा गया है कि भारतीय इतिहास चेतना का, चक्रीय कालबोध और सनातनता के आग्रह के कारण, विकास अलग और ख़ास ढंग से हुआ। कुछ हद तक यह बात सही भी है, लेकिन कुछ विद्वानों का यह आरोप निराधार है कि इसमें रेखाकारीय बोध, मतलब देशकाल के संदर्भ का सर्वथा अभाव है। दार्शनिक अरविन्द शर्मा ने तो भारतीय कालबोध के केवल चक्राकारीय होने की धारणा को पूरी तरह ख़ारिज कर दिया। उन्होने लिखा है कि यह “इतना उलटा-पल्टा है कि हमें भूल की दिशा में ले जाता है।”16 वे आगे कहते हैं कि “समय की हिन्दू धारणा एकरंगी नहीं है बल्कि एक बहुरंगी चित्र है। यह एक जटिल अवधारणा है, जिसे केवल चक्राकारीय कहकर समझा नहीं जा सकता।”17 अनिन्दिता एन. बाल्सलेव ने भी यही बात दोहरायी है कि “समय का चक्राकारीय विचार हिन्दू बौद्धिक परम्परा का एक मात्र लक्षण न हो कर “किसी विशिष्ट ब्राह्मणवादी विचारधारा तक का लक्षण नहीं है; यहाँ तक कि यह किसी वाद-विवाद का विषय भी नहीं है।”18 उनके अनुसार हिन्दू दार्शनिक परम्पराओं में अनेक विविधताएँ हैं। स्पष्ट है कि  समय का चक्राकारीय विचार हिन्दू बौद्धिक परम्परा का एक मात्र लक्षण नहीं है और तदनुसार इसकी इतिहास चेतना भी केवल चक्रीय कालबोध तक सीमित नहीं है। देशकाल की चेतना भी इसमें निरंतर और सघन है और इसकी परंपरा में इसके पर्याप्त साक्ष्य भी हैं। 

यूरोपीय अध्येताओं को भारतीय इतिहास के काव्यमय होने पर आपत्ति है। उनका मानना है कि इतिहास का काव्य में होना उसका इतिहास से विचलन है। उनके अनुसार काव्य में होकर इतिहास अपने बुनियादी गुण-धर्म- तथ्य पर निर्भरता, निरपेक्ष दृष्टि आदि से भटक जाता है। प्राचीन भारतीय वाङ्मय का अधिकांश पद्य में ही है- गद्य इसमें बहुत विरल है, इसलिए ऐतिहासिक कथा-काव्यों का काव्यमय होना बहुत स्वाभाविक और परंपरासम्मत है। भारतीय कवि, केवल नहीं है, उससे बहुश्रुत या बहुज्ञ होने की अपेक्षा की जाती थी। भारतीय ज्ञान का संग्रह और संकलन पद्य में ही होता आया है। यह एक तरह से ज्ञान को सूत्रबद्ध करने का ढंग़ है और इससे ज्ञान का सदियों तक स्मृति में परिवहन आसान हो जाता है। ऐतिहासिक घटनाएँ और चरित्र इसीलिए इस परंपरा में काव्य में ढले हुए मिलते हैं। इस बात पर भी कम लोगों का ध्यान गया है कि इतिहास के काव्य में होने का भी अपनी जगह महत्त्व है। यह पाठक-श्रोता के लिए दोहरा लाभकारी है। रवींद्रनाथ ठाकुर ने एक जगह इस ओर संकेत किया है। वे लिखते हैं कि- “काव्य में ग़लती पाऊँ तो इतिहास में उसका संशोधन कर लूँगा। किंतु जिस व्यक्ति को इतिहास पढ़ने का सुअवसर नहीं मिलेगा वह काव्य पढ़ेगा और वह अभागा है। लेकिन जिस व्यक्ति को काव्य पढने का सुअवसर नहीं मिलेगा, वह इतिहास पढ़ेगा और संभवतः वह सबसे अधिक दुर्भाग्यशाली है।”19

इतिहास की यह भारतीय परंपरा भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक ज़रूरतों के अनुसार बनी, इसलिए इतिहास की यूरोपीय ग्रीक-रोमन ईसाई परंपरा से बहुत अलग है। युक्तियुक्तता, कार्यकारण संबंध, तथ्य पर निर्भरता, प्रत्यक्ष अनुभव आदि इसमें उस तरह से नहीं हैं, जिस तरह से यूरोपीय कथित ‘आधुनिक’ इतिहास में होते हैं। इस परंपरा में एक तो स्मृति के दस्तावेज़ी ठहराव के बजाय उसको निरंतर और जीवंत रखने का आग्रह है, दूसरे, इसमें अतीत के यथार्थ का अमूर्तन इस तरह है कि यह वर्तमान में प्रासंगिक और उपयोगी बना रहे और तीसरे, इसमें साहित्यिक प्रथाएँ, कवि-कथा समय भी इस परंपरा के दस्तावेज़ों में पर्याप्त हैं।

उपनिवेशकालीन यह धारणा कि भारतीयों में इतिहास चेतना नहीं है, कुछ हद तक गुजरे जमाने की बात हो गयी है। उपनिवेशकालीन यूरोपीय अधिकांश इतिहासकारों की लगभग मान्य इस धारणा पर अब काफ़ी पुनर्विचार हुआ है और यह मान लिया गया है कि किसी भी अन्य इतिहास सजग समाज की तरह भारतीय समाज भी इतिहास सचेत समाज है और उसकी परंपरा में इसके पर्याप्त साक्ष्य भी हैं। इतिहास सहित इतिहास के 19 आनुषंगिक रूप- ऐतिह्य, पुराकल्प, परक्रिया, अवदान, आख्यान, आख्यायिका, उपाख्यान, अन्वाख्यान, चरित, अनुचरित, कथा, परिकथा, अनुवंश, श्लोक, नाराशंसी, गाथा, आख्यान और पुराण  ‘इतिहास’ के समानार्थक शब्दों के रूप में यहाँ सदियों से प्रयुक्त हो रहे हैं।20 इतिहास शब्द का व्यवहार भी वैदिक संहिताओं, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् ग्रंथों सहित परवर्ती साहित्य में कई जगह मिलता है। राजाओं के वीरतापूर्ण कार्यों और दानों की सराहना में कहे गए छंद इतिहास के प्राचीनतम भारतीय रूप हैं, जिनको वेदों में गाथा और नाराशंसी कहा गया है। परवर्ती ग्रंथ, ख़ासतौर पर निरुक्त और बृहद्देवता ऋग्वेद में इतिहास और आख्यान की मौजूदगी स्वीकार करते हैं। उत्तर वैदिककाल में इतिहास की इस मौखिक परंपरा का विस्तार हुआ और इस दौर में यह मुख्यतः नाराशंसी, गाथा, आख्यान, इतिहास और पुराण के रूप में विकसित हुई। ये सभी इतिहास रूप वैदिक साहित्य में भी थे, लेकिन उत्तर वैदिककाल में आकर ये विशिष्ट साहित्यिक स्वरूप के साथ प्रवृत्तियों के रूप में अस्तित्व में आए। उत्तर वैदिककाल के अंतिम चरण में इतिहास-पुराण परंपरा का विस्तार हुआ। इतिहास की प्राचीन भारतीय परंपरा के निर्माण और विस्तार में भृग्वंगिरसों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है और यह परंपरा बहुत बाद तक जारी रही। महाभारत और रामायण इस समूह की देन है। पुराणों में भृग्वंगिरसों के साथ इतिहास की परंपरा के विकास में सूतों ने भी निर्णायक योग दिया। अब तक इतिहास की मौखिक परंपरा अनुश्रुतियों और अनुभव के रूप मौजूद रही, लेकिन उत्तर वैदिककाल के अंतिम चरण, 400 ई. पूर्व से 400 ई. के बीच यह निश्चित साहित्यिक स्वरूप में ढलने लगी और कुछ हद तक इसका मानकीकरण भी हुआ। धर्म के नये रूप की ज़रूरतों ने इतिहास-पुराण को एक निश्चित साहित्यिक ढाँचे में सीमित कर दिया गया, जिससे कुछ हद तक यह अपने ऐतिहासिक चरित्र से हट गया। वंश की परंपरा जारी रही और इसका ऐतिहासिक चरित्र भी बना रहा। इसकी बौद्ध, जैन और दरबारी, तीन अलग-अलग प्रवृत्तियाँ विकसित हुईं। दरबारी परंपरा का ख़ूब विकास हुआ। मौर्यकाल के बाद राजकीय अभिलेखागारों की परंपरा शुरू हुई। वंश की परंपरा की एक शाखा का विकास राजदरबारों में चरित या जीवनी लेखन के रूप में हुआ। पूर्व मध्यकाल के अंतिम चरण में भारतीय ऐतिहासिक कथा-काव्य की परंपरा में निर्णायक मोड़ आया, जब ऐतिहासिक व्यक्तियों को उपजीव्य बनाकर इतिवृत्तात्मक काव्य रचना की आरंभ हुई और इसका और विस्तार हुआ। 600 से लगाकर 1200 ई. के बीच इसी तरह के कई इतिवृत्त लिखे गए। बाण का हर्षचरित, बिल्हण का विक्रमांकदेवचरित, सोमश्वर तृतीय का विक्रमांकाभ्युदय, जयानक का पृथ्वीराजविजय आदि इसी तरह के रचनाएँ हैं। इतिहास-पुराण की परंपरा भी जारी थी- यह कश्मीर में राजतरंगिणी (1444 ई.) के रूप में फलीभूत हुई, लेकिन कुछ हद तक यह उससे अलग और नवीन भी थी।

संस्कृत के समानांतर प्राकृत सहित देश भाषाओं में साहित्य रचना की परंपरा बहुत पहले से थी। यहाँ तक कि जब “संस्कृत भाषा का प्रसार उत्कर्ष पर था, उस समय भी गैर संस्कृत भाषाओं का प्रयोग करनेवालों की सृजनात्मकता न तो कम हुई और न ही शायद संस्कृत से कम थी।”21 ईसा की दूसरी सहस्राब्दी में देश भाषाओं का तेजी प्रसार हुआ, इन्होंने संस्कृत के सामने चुनौती पेश की और अंततः इसकी जगह ले ली, हो सकता है भारतविद् शेल्डन पोलक की यह धारणा कुछ हद तक सरलीकरण हो22, लेकिन इससे इतना तो साफ़ है कि इस दौरान संपूर्ण दक्षिण एशिया में देश भाषाओं का चलन और उनका साहित्यिक व्यवहार तेज़ी से बढा, जिससे संस्कृत के कुछ अभिव्यक्ति रूपों का रूपांतरण हुआ और क्षेत्रीय ऐतिहासिक-सांस्कृतिक ज़रूरतों के तहत कुछ नये रूप अस्तित्व में आए। गुजरात सहित उत्तरी-पश्चिमी भारतीय प्रदेशों में चौदहवीं-पंद्रहवीं सदी के आसपास इस प्रक्रिया ने जोर पकड़ा। क्षेत्रीय सामाजिक-सांस्कृतिक ज़रूरतों के तहत संस्कृत में प्रचलित साहित्यिक इतिहास रूपों के देश भाषाओं में सरलीकृत नये साहित्यिक इतिहास रूप- रास-रासो, चरित, ख्यात, बही, पाटनामा, कवित्त, चउपई आदि सामने आए। अभिव्यक्ति के इन नये साहित्यिक इतिहास रूपों में कई रचनाएँ हुईं। साहित्यिक इतिहास रूपों की इस परंपरा को राज्याश्रय भी मिला। ख़ासतौर पर देश के पश्चिमी और मध्यवर्ती भागों में इनका चलन बढा। यह चलन इतना व्यापक था कि इनमें प्रयुक्त वस्तु, छंद भाषा आदि पर नयी शास्त्र रचनाएँ भी हुईं। चारण, भाट और जैन यति-मुनियों का इस परंपरा के विस्तार और समृद्धि में महत्त्वपूर्ण योगदान है।

2.

रत्नसेन-पद्मिनी संबंधी कथा बीजक पर निर्भर ऐतिहासिक कथा-काव्यों की सोलहवीं से उन्नीसवीं सदी तक विस्तृत परंपरा में पाठ, प्रयोजन और शैली का पर्याप्त वैविध्य है। मलिक मुहम्मद जायसी की पद्मावत (1540 ई.) को छोड़कर ये सभी रचनाएँ इतिहास और आख्यान की भारतीय परंपरा का स्वाभाविक देशज विकास हैं। इन रचनाओं में अपने ढंग के ‘इतिहास’ का आग्रह भी बराबर है और इसको कथा विस्तार और कवि-कथा समयों के बीच भी अलग से पहचाना जा सकता है। अज्ञात कवि कृत गोरा-बादल कवित्त इनमें से सबसे प्राचीन (1588 ई. से पूर्व) है और इसके कुछ अंश इस परंपरा की परवर्ती रचनाओं में उद्धृत किए गए हैं, इसलिए यह रचना हेमरतन और जायसी की इस प्रकरण पर निर्भर रचनाओं से पहले की रचना है। हेमरतन कृत गोरा-बादल पदमिणी चउपई (1588 ई.), जटमल नाहरकृत गोरा-बादल कथा (1623 ई.), लब्धोदय कृत पदमिनी चरित्र चौपई (1649 ई.) और दलपति विजय कृत खुम्माणरासो (1715-1733 ई.) जैन साहित्यिक परंपरा और निर्मिति में हैं, लेकिन इनमें धार्मिक आग्रह नहीं है। ख़ास बात यह है कि ये रचनाएँ परंपरा में हैं- यहाँ पूर्ववर्ती रचना का आगे की रचनाओं में विकास और पल्लवन है। अज्ञात कविकृत पद्मिनीसमिओ (1616 ई.), दयालदास कृत राणारासो (1668-1681 ई.) और अज्ञात रचनाकार कृत चित्तौड़-उदयपुर पाटनामा  (प्रतिलिपि 1870 ई.) चारण-भाट परंपरा की रचनाएँ हैं, जिनमें वंश और प्रशस्ति का विवरण पारंपरिक कवि-कथा समयों, अभिप्रायों और कथा रूढ़ियों के विन्यास में है। इनमें से राणारासो और चित्तौड़-उदयपुर पाटनामा चारण रचनाएँ हैं, जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होकर निरंतरता में हैं। ठहरे या मृत दस्तावेज़ पर निर्भर करने वाले विद्वानों के लिए यह निरंतरता भी अजूबे की तरह है। दरअसल यह अतीत की स्मृति के वर्तमान में व्यवहार का ख़ास भारतीय ढंग है। इनमें से कुछ रचनाओं में उनके रचनाकारों के नाम, उनकी रचना का समय और स्थान का विवरण नहीं हैं। दरअसल एक तो परंपरा से भारतीय रचनाकार ही रचना में अपनी अस्मिता को लेकर बहुत आग्रही नहीं हैं और दूसरे, यहाँ कृति को रचना के बाद मुक्त करने की परंपरा रही है। यहाँ किसी रचना के समान विषय-वस्तुवाली या उससे हटकर या उसको उद्धृत करते हुए अपनी अलग रचना करने की स्वतंत्रता हमेशा रही है। यह भी सही है कि पद्मावत (1540 ई.) इसी कथा बीजक पर निर्भर रचना है, लेकिन इसकी कथा योजना सूफ़ी दार्शनिक रूपक पर एकाग्र है और देशज ऐतिहासिक कथा-काव्य रचनाएँ इससे संबंधित या प्रभावित नहीं हैं। पद्मावत सहित अन्य सूफ़ी प्रेमाख्यानों का काव्यरूप और संगठन अलग प्रकार का है। शेल्डन पोलक ने भी फ़ारसी के प्रभाव में देशभाषा (हिंदावी, हिंदवी और हिंदुई) में चौदहवीं-पंद्रहवीं और इसके बाद विकसित प्रेमाख्यान परंपरा को भारतीय परंपरा से अलग माना है।23 “ये काव्य फ़ारसी और भारत की पुरानी शास्त्रीय परंपराओं दोनों से अलग हैं, ये भारतीय इस्लामिक रचना रूप में हैं। दोनों पुराने सिधांतों से ये दोहरा अंतर रखते हैं, भले ही महत्त्वपूर्ण विचारों और रूढ़ियों को ये उनसे ले लेते है। इस विधा के कवियों ने हिंद्वी का प्रयोग किया, यह बोलचाल की स्थानीय भाषा थी, जिसे साहित्य का माध्यम बनाकर उन्होंने ऊँचा स्थान प्रदान किया। उनके काव्यों की प्राचीनतम पांडुलिपियाँ फ़ारसी लिपि में लिखी हुई हैं। उनके प्रेमाख्यान काव्य ऐसी काव्यशास्त्र के द्वारा सूफ़ी संदेश प्रकट करते हैं, जो अंशतः फ़ारसी से, अंशतः संस्कृत और अंशतः क्षेत्रीय परंपराओं से लिया गया है।”24 

3.

पद्मिनी-रत्नसेन प्रकरण (1303 ई.) संबंधी देशज ऐतिहासिक कथा-काव्य की सुदीर्घ परंपरा लोक में सदियों से प्रचलित कथा बीजक पर आधारित है और इनकी जायसी के पद्मावत (1540 ई.) पर निर्भरता की धारणा सर्वथा निराधार है। पद्मिनी का जन्म सोलहवीं सदी के सूफ़ी आख्यान पद्मावत से हुआ25, यह धारणा उन ‘आधुनिक’ इतिहासकारों-विद्वानों ने बनायी है, जिन्हें लोक में स्मृति के व्यवहार के ख़ास ढंग और इस प्रकरण से संबंधित देशज कथा-काव्यों के संबंध में कोई जानकारी नहीं थी। पद्मावत की ख्याति इसकी रचना के पचास वर्ष में ही जायस से सुदूर राजस्थान में पहुँच गई, यह विश्वसनीय नहीं लगता। जायसी कवि तो बड़े थे, लेकिन वे अपने समय में बहुत लोकप्रिय नहीं थे- उनका उल्लेख पारंपरिक इतिहास और सांप्रदायिक साहित्य में नहीं मिलता। राजस्थान, पंजाब और गुजरात, जहाँ पारंपरिक पद्मिनी-कथा-काव्यों की रचना हुईं, के ग्रंथागारों में पद्मावत की कोई प्रति नहीं मिलती। इन कथा-काव्यों के रचनाकारों ने पद्मावत को कहीं भी उद्धृत नहीं किया, जबकि पारंपरिक कथा-काव्यों में पूर्व की संबंधित रचनाओं के प्रसिद्ध कथनों का उद्धृत करने की परंपरा थी। इस कथा बीजक के आधार पर जायसी ने 1540 ई. में और हेमरतन 1588 ई. में अपनी रचनाएँ कीं, लेकिन इससे पूर्व भी इस बीजक को कथा-काव्य का स्वरूप देने के उपक्रम होते रहे थे। इन दोनों से प्राचीन गोरा-बादल कवित्त (1588 ई. से पूर्व) नामक रचना उपलब्ध है। पद्मिनी प्रकरण का छिताईचरित (1475-1480 ई.) में उल्लेख भी यह भी प्रमाणित करता है कि जायसी के पद्मावत से पूर्व यह कथा बीजक लोक में प्रचलन में था। परवर्ती पद्मिनी प्रकरण  संबंधी  फ़ारसी-अरबी वृत्तांत- मोहम्मद क़ासिम फ़रिश्ता (1560-1620 ई.) कृत तारीख़-ए-फ़रिश्ता, अबुल फ़ज़ल (1551-1602 ई.) कृत आईन-ए-अकबरी और अब्दुल्लाह मुहम्मद उमर अल-मक्की अल-आसफ़ी अल-उलुग़ख़ानी हाजी उद्दबीर कृत (1540-1605 ई.) कृत ज़फ़रुल वालेह बे मुज़फ़्फ़र वालेह भी जायसी की पद्मावत के बजाय पारंपरिक कथा बीजक या पारंपरिक देशज आख्यानों-ख्यातों पर निर्भर है। इन परवर्ती अरबी-फ़ारसी वृत्तांतों की कथा के मोड़ जायसी से अलग और अपनी तरह के हैं। 

4.

पद्मिनी विषयक पारंपरिक देशज कथा-काव्यों कथा और चरित्र योजना एक-दूसरे से अलग होने के साथ मलिक मुहम्मद जायसी के पद्मावत से भी भिन्न हैं। जायसी की कथा बहुत विस्तृत, जटिल और कई मोड़-पड़ावों वाली है, इसमें कई उपकथाएँ हैं, जबकि देशज कथा-काव्यों की कथा अपेक्षाकृत सरल और सीधी है। देशज कथा-काव्यों की कथा में मोड़-पड़ाव भी बहुत कम हैं और ख़ास बात यह है कि इनमें कुछ मोड़-पड़ाव इन सभी कथा-काव्यों में है। पद्मिनी विषयक कथा बीजक के जायसी के कथा विस्तार और पल्लवन में अभिधार्थ और ध्वन्यार्थ अलग-अलग है, इसलिए इसके मोड़-पड़ाव विचित्र हैं और ये कई जगह अटपटे भी लगते हैं। देशज कथा-काव्यों में चरित्रों में से केवल तीन प्रमुख चरित्र- रत्नसेन, पद्मिनी और राघवचेतन पद्मावत में भी हैं। पद्मावत के शेष सभी चरित्र जायसी के अपने और मौलिक हैं। गंधर्वसेन, चंपावती, हीरामन, चित्रसेन, नागमती, यशोवती, कुमुदिनी और देवपाल नामवाचक संज्ञाएँ देशज कथा-काव्यों में नहीं हैं। गंधर्वसेन जायसी के अनुसार सिंहलद्वीप का राजा है, जबकि अधिकांश देशज कथा-काव्यों में पद्मिनी के पिता का नामोल्लेख नहीं मिलता। केवल पाटनामा में उसका समरसिंह पँवार के रूप में नामाल्लेख है। पदमिनी से विवाह से पूर्व रत्नसिंह की पटरानी का नाम जायसी के अनुसार नागमती है, जबकि पारंपरिक देशज कथा-काव्यों में से कुछ में यह नाम प्रभावती है। हीरामन की जायसी के पद्मावत में कथा के लगभग सभी मोड़-पड़ावों में निर्णायक भूमिका में है, लेकिन इस तरह का कोई पात्र देशज कथा-काव्यों में नहीं है।

जायसी के पद्मावत के कथा के अधिकांश मोड़-पड़ाव देशज कथा-काव्यों में नहीं है। पद्मावत का आरंभ देशज कथा-काव्यों से अलग है। जायसी के अनुसार रत्नसेन हीरामन की सराहना पर पद्मावती की खोज में सिंघल द्वीप के लिए प्रस्थान करता है, जबकि देशज कथा-काव्यों में इसका कारण स्वादहीन और अरुचिकर भोजन पर रानी से नाराज़गी और रानी का इसके लिए पद्मिनी ले आने के ताने का कवि-कथा अभिप्राय है। हीरामन तोते का चित्तौड़ पहुँचने का वृत्तांत भी किसी देशज कथा-काव्य में नहीं है। जायसी ने रत्नसेन की सिंघल यात्रा का भौगोलिक विवरण भी दिया, जबकि अधिकांश देशज कथा-काव्यों में यह नहीं मिलता। देशज कथा-काव्यों में रत्नसेन का सिंहलद्वीप पहुँचना चामत्कारिक है- इसमें योगी या योगियों की निर्णायक भूमिका है। पाटनामा में यात्रा में लगने वाले समय के साथ सेतुबंध रामेश्वरम् का उल्लेख आया है, अन्यथा देशज कथा-काव्यों में यात्रा का भौगोलिक विवरण नहीं है। रत्नसेन की गजपति से भेंट, गंधर्वसेन द्वारा रत्नसिंह का बंदी बनाया जाना, नागमती का वियोग, समुद्र की दान याचना, रत्नसेन और पद्मिनी का जहाज के भँवर फँस जाने से अलग-अलग दिशाओं में बह जाना, समुद्र पुत्री लक्ष्मी से भेंट, देवपाल का कुमुदिनी को भेजकर पद्मिनी को आकृष्ट करने का प्रयास, सरजा के माध्यम से पद्मिनी देने का उल्लाउद्दीन का संदेश, अलाउद्दीन का पातुर भेजकर पद्मावती का मन बदलने की चेष्टा, सरजा द्वारा गोरा की हत्या, देवपाल द्वारा सांगी मारकर रत्नसेन को आहत करना, बादल को गढ़ सौंपकर रत्नसेन की मृत्यु, पद्मिनी-नागमती का सती होना बादल की मृत्यु और स्त्रियों का जौहर आदि अनेक प्रकरण जायसी का अपना कथा पल्लवन और विस्तार है। जौहर का प्रकरण जायसी के यहाँ है, लेकिन यह केवल सांकेतिक है। जायसी लिखते हैं कि जौहर भई इस्तिरी, पुरुख भए संग्राम / पातसाहि गढ़ चूरा, चितउर भा इसलाम अर्थात् स्त्रियों ने जौहर कर लिया, पुरुष संग्राम करते हुए अंत को प्राप्त हुए, बादशाह ने गढ़ ध्वस्त कर दिया और चित्तौड़ इस्लाम के नीचे आ गया। कथा पल्लवन के ये रूप देशज ऐतिहासिक कथा-काव्यों में नहीं हैं।

पद्मिनी-रत्नसेन प्रकरण पर निर्भर इन कथा-काव्यों की कथा योजना से यह स्पष्ट है कि भारतीय ऐतिहासिक कथा-काव्य की प्राचीन परंपरा के अनुसार इनमें एक ही कथा बीजक का अलग-अलग तरह से पल्लवन और विस्तार है। जैन धार्मिक रचनाकारों की कथा योजना में कोई धार्मिक आग्रह तो नहीं है, लेकिन स्वामिधर्म, पातिव्रत्य, यौन शुचिता आदि मूल्यों की प्रतिष्ठा के साथ मनोरंजन का उद्देश्य इनमें सक्रिय है। चारण और अन्य रचनाकारों का आग्रह इन मूल्यों की प्रतिष्ठा के साथ इतिहास और वंश प्रशस्ति का भी है। ख़ास बात यह है कि यहाँ कथा योजना किसी एक आशय या योजना में सीमित और रूढ‌ नहीं है। यहाँ रचनाकार के अपने विवेक और प्रयोजन के अनुसार कथा बनती-बदलती है। इतिहास इनमें कहीं आधार है, तो कहीं रीढ़ और कहीं केवल सहारा, लेकिन यह इनमें है। यह इनमें कुछ दूर दिखता, फिर कुछ दूर ओझल रहता है और फिर एकाएक दिख जाता है। यह ऐतिहासिक कथा-काव्य रचना की ख़ास भारतीय पद्धति में है। यहाँ इतिहास कथा में और कथा इतिहास में इस तरह घुल-मिल जाते हैं कि इनकी अलग पहचान मुश्किल हो जाती है।

5.

पदमिनी-रत्नसेन प्रकरण पर निर्भर ऐतिहासिक कथा-काव्य सर्वथा मिथ्या या मनगढ़ंत नहीं है। उनमें इतिहास का नियोजन भारतीय ऐतिहासिक कथा-काव्य परंपरा के अनुसार है, इसलिए इनमें इतिहास के साथ रचनात्मक विस्तार के लिए प्रयुक्त मिथ-अभिप्रायों और कथा-रूढ़ियों का नियोजन ख़ूब है। ये अभिप्राय और कथा रूढ़ियाँ भी केवल कल्पना नहीं हैं- इनके प्रस्थान में यथार्थ की मौजूदगी है और भारतीय ऐतिहासिक काव्यों की निर्मिति, कवि स्वभाव और शिक्षा के कारण ये इनमें सहज ही आ गयी हैं। इन कथा-काव्यों में वर्णित पद्मिनी-रत्नसेन प्रकरण की आंशिक पुष्टि अलाउद्दीन ख़लजी के समकालीन इस्लामी वृत्तांतकार अमीर ख़ुसरो (1253-1325 ई.) के वृत्तांत से भी होती है, जिसमें उसने अपने को सेबा की रानी बिलक़ीस का समाचार लाने वाले सुलेमान के पक्षी ‘हुद हुद’ के समान बताया है। ज़ियाउद्दीन बरनी (1285-1357 ई.) और अब्दुल मलिक एसामी (1311 ई.) ने अलाउद्दीन के चित्तौड़ अभियान का विवरण तो दिया है, लेकिन इसमें इन दोनों ने पद्मिनी और गोरा-बादल के उल्लेख नहीं किया। इस्लामी इतिहास लेखन की परंपरा के अनुसार इन्होंने इस प्रकरण का वही विवरण दिया, जो शासक अलाउद्दीन ख़लजी को अच्छा लगता था। परवर्ती इस्लामी वृत्तांतकारों- अबुल फ़ज़ल (1551-1602 ई.), महम्मद क़ासिम फ़रिश्ता (1560-1620 ई.) और हाजी उद्दबीर (1540-1605 ई.) ने भी इस प्रकरण का अपनी-अपनी तरह से विवरण दिया है और इनमें पद्मिनी और गोरा-बादल का उल्लेख आ गया है। अलाउद्दीन के समकालीन कक्कसूरि का नाभिनंदनजिनोद्धारप्रबंध (1336 ई.) और परवर्ती रचना मुँहता नैणसीरी ख्यात (1610-1670 ई.) और रावल राणारी वात (1680-1698 ई.) में इस प्रकरण का संदर्भ मिलता है। विवेच्य कथा-काव्यों के अनुसार रत्नसेन ने चित्तौड़ पर आक्रमण केवल राजीनितिक प्रयोजन के लिए नहीं किया- पद्मिनी पाने की लालसा की इसमें निर्णायक भूमिका थी। इस तथ्य का समर्थन छिताईचरित्र (1475-1480 ई), हम्मीररासो 1390 ई.), हम्मीरायण (1481 ई.) आदि देशज रचनाओं के साहित्यिक साक्ष्य भी करते हैं। विवेच्य रचनाओं में अलाउद्दीन स्त्री लोलुप और कामांध वर्णित किया गया है। यह बात सही है, क्योंकि सभी देशज स्रोत और स्त्रियाँ पाने के लिए किए गए उसके युद्ध अभियान भी इसी ओर संकेत करते हैं। रचनाओं में वह अपार शक्तिशाली और क्रूर भी दिखाया है, जो वह था। इस्लामी स्रोतों- ख़ासतौर पर तारीख़-ए-फ़रिश्ता में जियाउद्दीन इस तरह का विवरण देता है। समरसिंह (1273-1303 ई.‌) का उत्तराधिकारी रत्नसिंह (1302-1303 ई.) अलाउदद्दीन के 1303 ई. के आक्रमण के समय चित्त्तौड़ का शासक था और वह इन कथा-काव्यों का निर्विवाद नायक है। यह अलग बात है कि कुछ आधुनिक इतिहासकारों को आरंभ में उसके अस्तित्व लेकर संदेह था। यह संदेह इसलिए हुआ, क्योंकि मेवाड में राणा शाखा के शासन के दौर में बने कुछ शिलालेखों सहित कुछ साहित्यिक साक्ष्यों में रावल शाखा से संबंधित होने के कारण रत्नसिंह का नाम नहीं है। बाद में दरीबा (1303 ई.) और कुंभलगढ़ (1460 ई.) के शिलालेखों में 1303 ई. में उसका मेवाड़ में सत्तारूढ़ होना प्रमाणित हो गया। पद्मिनी इन रचनाओं के केंद्र में है, लेकिन कतिपय इतिहासकारों ने उसको जायसी की कल्पना मान लिया, जो ग़लत है। पदमिनी का उल्लेख अलाउद्दीन के समकालीन वृत्तांतकारों ने नहीं किया, लेकिन ख़ुसरो के ख़जाइन-उल-फ़ुतूह में उसका सांकेतिक उल्लेख है। परवर्ती  देशज  स्रोत- मुँहता नैणसीरी ख्यात (1610-1670 ई.), रावल राणारी वात (1680-1698 ई.) सहित राजप्रशस्तिमहाकाव्य (1661-1681 ई.) और अमरकाव्यम् (1683 से 1693 ई.) में उसका उल्लेख मिलता है। पद्मिनी सदियों से लोक स्मृति का भी हिस्सा रही है। वह पद्मिनी कोटि की स्त्री है, जिसका विवाह रत्नसेन से हुआ है। पाटनामा में उसका नाम मदन कुँवर है। विवेच्य अधिकांश रचनाओं में रत्नसेन को युक्तिपूर्वक अलाउद्दीन की क़ैद से मुक्त करवाने वाले योद्धा गोरा-बादल हैं और इन रचनाओं में से कुछ का नामकरण ही उनके नाम के आधार पर हुआ है। अलाउद्दीन के समकालीन वृत्तांतकारों ने उनका उल्लेख नहीं किया, लेकिन सभी दूसरे साहित्यिक और परवर्ती इस्लामी स्रोतों में उनका उल्लेख मिलता है। उनसे संबंधित सदियों पुराने स्मारक भी भी हैं, जो उनके ऐतिहासिक होने की पुष्टि करते हैं। राघवचेतन इन रचनाओं में से कुछ में एक, तो कुछ में दो व्यक्ति हैं। आधुनिक इतिहासकारों को राघवचेतन के ऐतिहासिक अस्तित्व पर भी संदेह है। राघवचेतन का उल्लेख भी अलाउद्दीन के समकालीन वृत्तांतकारों ने नहीं किया, लेकिन उससे संबंधित कांगड़ा की ज्वालामुखी प्रशस्ति (1433-1446 ई.), वृद्धाचार्य प्रबंधावली (1569 ई.), शार्गंधरपद्धति (तेरहवीं सदी के अंतिम चरण में) आदि पर्याप्त पुरालेखीय और साहित्यिक साक्ष्य उपलब्ध हैं। राघवचेतन से संबंधित जैन साहित्यिक साक्ष्य और कांग़ड़ा की ज्वालामुखी प्रशस्ति तो अलाउद्दीन की लगभग समकालीन हैं।

पाटनामा को छोड़कर ये सभी रचनाएँ एक राय हैं कि रत्नसेन और अलाउद्दीन ख़लजी के बीच हुए युद्ध में विजय रत्नसेन की हुई और बादशाह भाग गया, जबकि जौहर का उल्लेख इनमें से किसी भी रचना में नहीं है। पाटनामा के अनुसार दुर्ग ध्वस्त हुआ और बादशाह की फ़ौज भाग गयी। रत्नसेन की इन रचनाओं में विजय हुई, लेकिन देशज कुछ साहित्यिक स्रोत और पुरालेखीय अभिलेख मानते हैं कि रत्नसेन की पराजय हुई और कुछ समय के लिए दुर्ग सल्तनत के अधीन रहा। रचनाओं में रत्नसेन की विजय का उल्लेख स्वाभाविक है- अकसर रचनाकार पराजय को विजय के रूप में चित्रित कर अपने जाति-समाज के स्वाभिमान को खाद-पानी देते हैं। जौहर का उल्लेख इनमें से किसी भी रचना में नहीं है और यह भी स्वाभाविक है, क्योंकि जौहर की परिस्थिति तो तब बनती, जब रत्नसेन की पराजय होती। परवर्ती देशज साहित्यिक वंशावली अभिलेखों-राजप्रशस्तिमहाकाव्य, अमरकाव्य और राजरत्नाकरकाव्य में भी जौहर का उल्लेख नहीं है, जबकि इस तरह का उल्लेख प्रतिष्ठाकारी था। जौहर केवल जायसी की पद्मावत, अबुल फ़ज़ल की आईन-ए-अकबरी और मुँहता नैणसीरी ख्यात और रावल राणारी वात में है और यह इनमें कहाँ से आया, यह कहना बहुत मुश्किल काम है। पद्मिनी-रत्नसेन प्रकरण पर अलाउद्दीन के समकालीन इस्लामी वृत्तांतकारों का मौन बहुत स्वाभाविक है। आधुनिक इतिहासकारों ने इस आधार पर इस प्रकरण को जायसी की कल्पना मान लिया, जो सही नहीं है। यह विडंबना है कि आधुनिक कुछ इतिहासकारों ने मध्यकालीन भारत के सन्दर्भ में दरबारी इतिहास को ही प्राथमिक स्रोत या आधिकारिक स्रोत का दर्जा देते हुए इनमें दर्ज़ हुई हर सूचना को वस्तुपरक सत्य मान लिया गया, जो पूरी तरह ग़लत है। पी. हार्डी ने इस संबंध में साफ़ सचेत करते हुए लिखा है कि “आधुनिक इतिहासकारों के लिए मध्ययुगीन मुस्लिम भारत के इतिहास के संबंध में इन लेखकों के विवरणों पर अंध निर्भरता ठीक नहीं है। जो वे कहते हैं वह इतिहास नहीं है, बल्कि इतिहास का कच्चा माल है, जिसे तैयार उत्पाद में बदलने के लिए उसके निर्माण की आवश्यकता होती है।”26 अलाउद्दीन के समकालीन तीनों समकालीन वृत्तांतकारों- अमीर ख़ुसरो, ज़ियाउद्दीन बरनी और अब्दुल मलिक एसामी पर पूरी तरह निर्भरता इस प्रकरण के संबंध में ग़लत निष्कर्ष पर पहुँचा देती है। दरअसल एक तो इन तीनों वृत्तांतकारों में से अमीर खुसरो तो मूलतः कवि था और एसामी की इच्छा भी कवि होने की ही थी और दूसरे, उस समय का रिवाज़ के मुताबिक अलाउद्दीन की सराहना और उसकी कमज़ोरियों की छिपाना उनकी आदत और मजबूरी थी।

6.

पद्मिनी-रत्नसेन प्रकरण निर्भर कथा-काव्यों में तत्कालीन संस्कृति-प्रशासन और जीवन मूल्य और आस्था-विश्वास आदि का जो रूप बनता है, वह उपलब्ध अन्य पुरालेखीय और साहित्यिक साक्ष्यों से बहुत अलग नहीं है। मेवाड़ में सदियों से गुहिलवंशियों का वर्चस्व रहा है, जो सूर्यवंशी क्षत्रीय राजपूत हैं। यह धारणा निराधार है कि क्षत्रिय और राजपूत, दो अलग जातियाँ हैं और राजपूतों की उत्पत्ति विदेशी मूल की है। दरअसल राजपूत प्राचीन क्षत्रिय परंपरा का ही मध्यकालीन विस्तार है। विवेच्य रचनाओं में ‘खित्रिवट” (क्षत्रियत्व) शब्द का ही व्यवहार हुआ है। शक, हूण आदि जिन जातियों से राजपूतों की उत्पत्ति मानी जाती है, वे सभी जातियाँ हमारे प्राचीन शास्त्रों में क्षत्रिय जातियों में परिगणित की गयी हैं। इसी तरह मध्य एशिया, जहाँ से उनका आगमन माना जाता है, वहाँ छठी-सातवीं सदी में भारतीय सभ्यता की मौजूदगी के प्रमाण मिले हैं। गुहिल वंश का ईरान के नौशरवाँ आदिल वंश से संबंध और मेवाड़ में उसके वल्लभी से आने की धारणा भी युक्तिसंगत नहीं है। पुरालेखीय प्रमाण- आगरा में 1865 ई. में राजा गुहिल के 2000 से अधिक चांदी के सिक्कों की उपलब्धता, चाटसू (जयपुर) के आसपास वि.सं 1000 (943 ई.) के शिलालेख में वहाँ गुहिलवंशी राजा भर्तृभट्ट के वंशजों शासक होने के उल्लेख और अजमेर जिले के नासूण गाँव के शिलालेख वि.सं. 887 (830 ई.) इसके आगरा की तरफ़ से आने की पुष्टि करते हैं। यह धारणा भी निराधार है कि गुहिल वंश की उत्पत्ति नागर ब्राह्मणों से हुई। सभी पुरालेखीय साक्ष्य- आहाड़ का शिलालेख वि.सं.1034 (976 ई.), एकलिंगजी मंदिर का राजा नरवाहन के समय का शिलालेख वि.सं.1028 (971 ई.), श्यामपार्श्वनाथ मंदिर का शिलालेख वि.स.1335 (1278 ई.), आबू का शिलालेख वि.सं.1342 (1285 ई.), मुँहता नैणसीरी ख्यात आदि इसके क्षत्रिय होने की पुष्टि करते हैं।

यह माना जाता है कि गुहिल राम के पुत्र कुश के वंशज राजा सुमित्र के वंश में 560 ई. में राजा गुहिल हुआ, जिससे इस वंश की शुरुआत हुई। गुहिल के बाद बाद इसमें बप्पा, खुम्माण आदि कई शासक हुए। बप्पा ने मोरियों से चित्तौड़ छीनकर अपने राज्य में मिलाया। खुम्माण भी बहुत पराक्रमी था- बाद में यह नाम मेवाड़ के शासकों का विशेषण हो गया। हैं। कई शासकों के बाद तेरहवीं सदी में तेजसिंह के उत्तराधिकारी समरसिंह (1273-1301 ई.) के बाद उसका पुत्र रत्नसेन (1302-1303 ई.) सत्तारूढ़ हुआ। मेवाड़ के कुछ वंशावली अभिलेखों में रत्नसेन का नामोल्लेख नहीं मिलता, लेकिन विवेच्य रचनाओं और नये उपलब्ध पुरालेखीय साक्ष्यों से इतना तो तय है कि 1303 ई. अलाउद्दीन ने जब चित्तौड पर आक्रमण किया, तो उस समय रत्नसेन वहाँ का राजा और पद्मिनी उसकी रानी थी। चित्तौड़ जीतने बाद अलाउद्दीन ने वहाँ का शासन अपने पुत्र ख़िज्र ख़ाँ को दिया। बाद में निरंतर उपद्रवों के कारण ख़िज्र ख़ाँ की जगह अलाउद्दीन ने क़िला जालोर के मालदेव सोनगरा को सौंप दिया। गुहिल वंश के ही सिसोदा की जागीर के स्वामी हम्मीर ने 1326 ई. के आसपास दिल्ली सल्तनत के कमज़ोर होते ही मालदेव को परास्त कर मेवाड़ पर फिर अपना आधिपत्य कायम कर लिया।

विवेच्य कथा-काव्यों और दूसरे उपलब्ध साक्ष्यों से लगता है कि प्रकरणकालीन मेवाड़ में अपने ढंग की सामंती प्रशासनिक व्यवस्था थी। यह व्यवस्था यूरोपीय और शेष भारत की सामंतवादी व्यवस्था से कुछ हद तक अलग और ख़ास प्रकार की थी। कुछ विद्वानों की ‘भारतीय फ़्यूडलिज़्म’ की अवधारणा के साथ इसका कोई मेल नहीं है। ‘भारतीय फ़्यूडलिज़्म की परिकल्पना’ वास्तव में यूरोप में विकसित और पतित फ़्यूडलिज़्म की हेनरी पिरेन द्वारा प्रतिपादित परिकल्पना के अनुरूप थी, जिसे रामशरण शर्मा ने कार्बन कॉपी की तरह भारतीय तथ्यों और साक्षियों पर चस्पा कर दिया।27 मेवाड़ में राजनीतिक-प्रशासनिक सत्ता का विकेन्द्रीकरण ब्राह्मणों को भूमिदान से नहीं हुआ। यह सही है कि यहाँ बहुत शुरू से ब्राह्मणों और मंदिरों को भूमिदान दिया जाता रहा है और इस तरह अभिलेख भी निरंतर मिलते हैं, लेकिन यह उनको आजीविका के लिए दिया जाता था और इस पर उनका स्वामित्व स्थायी नहीं था। यहाँ भूमि सैन्य सेवा के बदले अपने कुटुम्बियों और अन्य बाहरी क्षत्रिय योद्धाओं की दी गयी और सत्ता का विकेंद्रीकरण भी इसी आधार पर हुआ। राजाज्ञा यहाँ सर्वोपरि थी और उसकी अनुपालना भी आवश्यक थी, लेकिन अधीनस्थ सामंतों का युद्ध आदि मसलों में परामर्श भी आवश्यक था और कुछ मामलों में वे स्वायत्त और ताक़तवर भी थे। मेवाड़ की यह व्यवस्था शेष राजस्थान की रियासतों से भी अलग थी- अन्य रियासतों में अधीनस्थ सामंतों को मेवाड़ जितने अधिकार नहीं थे। दरअसल मेवाड़ राजस्थान के दूसरे राज्यों की तुलना में बहुत पुराना राज्य था। टॉड के शब्दों में “यह वंश ऐसे प्राचीन समय स्थापित हो चुका था, जबकि अन्य पुनर्जीवित या अभी गर्भावस्था में ही थे। इस कारण मेवाड़ की रीति-नीति और विधि-विधान अन्य राज्यों से स्पष्ट रूप से भिन्न हैं।”28 यहाँ के सामंत और उपसामंत केवल सैन्य सेवा के लिए उपलब्ध व्यक्ति नहीं थे, उनके कुछ पारम्परिक अधिकार थे और राज्य की रीति-नीति के निर्धारण में उनकी निर्णायक भूमिका थी। कई बार वे राजा के चयन और अयोग्य शासक की पदच्युति में प्रभावी भूमिका निभाते थे। राजा उनसे परामर्श और सहयोग लेने के लिए लगभग बाध्य था। काश्तकार उत्पादन और आर्थिक के मामले में लगभग स्वतंत्र थे और इसके अलावा कुछ हद तक उनका अपनी काश्तभूमि भूमि पर विधिक अधिकार भी था। उनसे आमतौर पर उत्पादन का 1/3 या 1/4 बतौर राजस्व लिया जाता था और कृषि दासता जैसी स्थिति यहाँ कभी नहीं रही।

विवेच्य रचनाओं और दूसरे साक्ष्यों से यह भी लगता है बाहय आक्रमणों और निरंतर होनेवाले युद्धों के कारण यहाँ कुछ खास प्रकार के सांस्कृतिक मूल्यों का विकास हुआ, जिनकी जड़ें हमारे प्राचीन शास्त्रों और स्मृतियों में थीं। सांस्कृतिक मूल्यों का विकास और उनमें परिवर्तन ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में होता है। उनका मूल्यांकन हम अपने समय की ज़रूरतों के आधार पर करने लगते हैं, जो ग़लत हैं। समता, स्वाधीनता, न्याय और इन पर निर्भर विचारधाराएँ और विमर्श मनुष्य की विकास यात्रा की हमारे समय की उपलब्धियाँ हैं। हमारे समय के सांस्कृतिक मूल्यों और व्यवहार की कसौटी पर इसलिए मध्यकालीन सांस्कृतिक व्यवहार और मूल्यों के महत्त्व का आकलन नहीं हो सकता। अलग और ख़ास प्रकार के मध्यकालीन ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में ही इनको समझा जाना चाहिए। शौर्य, पराक्रम, युद्ध, शरणागति और प्रजा की रक्षा आदि मूल्य क्षत्रियत्व की प्रमुख अभिलक्षणाओं में हमेशा से थे, लेकिन मध्यकाल में इनका आग्रह बढ़ गया। मध्यकाल में युद्ध की एक संस्कृति बन गयी, जिसमें मरना-मारना और पीठ नहीं दिखाना योद्धा के ज़रूरी गुण मान लिए गए। “युद्द्ध उन दिनों के राजपूत राजाओं के लिए आवश्यक कर्त्तव्य हो गया था। लड़नेवाली जातियों के लिए सचमुच ही चैन से रहना असंभव हो गया था। क्योंकि उत्तर, पूरब, दक्षिण, पश्चिम सब ओर से ओर आक्रमण की संभावना थी। निरंतर युद्ध के लिए प्रोत्साहित करने का भी एक वर्ग आवश्यक हो गया था। चारण इसी श्रेणी के लोग थे। उनका कार्य ही था- हर प्रसंग में आश्रयदाता के युद्धोन्माद को उत्पन्न कर देने वाली घटना योजना का आविष्कार।”29 विवेच्य रचनाओं में ‘खित्रिवट’ (क्षत्रियत्व) ‘रिणवट’ (युद्ध की रीत) की ख़ूब सराहना हुई है। कर्मफल और नियतिवाद मध्यकालीन आचरण में सम्मिलित था, लेकिन धीरे-धीरे यह युद्ध संस्कृति के साथ भी जुड़ गए। विवेच्य रचनाओं में इस धारणा को पुष्ट किया गया है कि युद्ध में मृत्यु से यश के साथ स्वर्ग भी मिलता है। स्वामिधर्म भी इन रचनाओं में केद्रीय सरोकार है। गोरा-बादल के चरित्रों की योजना इस मूल्य को चरितार्थ करने के लिए ही हुई है। निरंतर बाह्य आक्रमणों और आक्राताओं के स्त्रीलोलुप आचरण और स्वभाव के कारण मध्यकाल में स्त्रियों की शील की रक्षा और यौन शुचिता का आग्रह और चिंता में भी वृद्धि हुई। विवेच्य रचनाओं में इसका आग्रह बहुत है। यहाँ पद्मिनी अपने शील और यौन शुचिता की रक्षा के निमित्त मर जाने के लिए संकल्पित है और उसके परिजन भी इसके लिए मरने और मारने के लिए तत्पर हैं।

7.

पद्मिनी-रत्नसेन प्रकरण पर निर्भर ऐतिहासिक कथा-काव्य इस्लामी विजय की हिंदवी फारसी साहित्यिक प्रवृत्ति का प्रतिरोध नहीं है, जैसाकि कुछ विद्वान मानते हैं। अज़ीज़ अहमद सहित कुछ विद्वान् रासो आदि रचनाओं को इस्लामी विजय की साहित्यिक रचनाओं- ख़जाइन-उल-फूतूह आदि का प्रतिरोध मानते हैं। अज़ीज़ अहमद ने इस इस संबंध में लिखा कि “मुस्लिम प्रभाव और शासन ने दो साहित्यिक प्रवृत्तियों को जन्म दिया: विजय का एक मुस्लिम महाकाव्य, और प्रतिरोध और मनोवैज्ञानिक अस्वीकृति का एक हिंदू महाकाव्य। दो साहित्यिक प्रवृत्तियाँ दो अलग-अलग संस्कृतियों; दो अलग-अलग भाषाओं- फ़ारसी और हिंदी और दो समान रूप ख़ास धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टिकोणों द्वारा अपनपायी गयी। ये दोनों प्रवृत्तियाँ आक्रामक शत्रुता के साथ एक-दूसरे का सामना करती हैं।”30 यह धारणा सही नहीं है- ये रचनाएँ सदियों पुरानी ऐतिहासिक प्रबंध-चरित कथा-काव्य की परंपरा में है और ये किसी प्रवृत्ति का प्रतिरोध नहीं हैं। इन रचनाओं में कहीं भी कोई हिंदू धार्मिक आग्रह नहीं है। यहाँ तक कि जैन यतियों, मुनियों और श्रावकों की रचनाएँ भी कहीं भी धार्मिक नहीं है। अधिकांश आधुनिक इतिहासकार इस प्रकरण के लिए जिन इस्लामी वृत्तांतकारों पर निर्भर करते हैं वे सभी आग्रहपूर्वक धार्मिक हैं। वे समकालीन अवश्य थे, लेकिन अपने समय के शासकों के सभी कृत्यों और उनके परिणामों का मूल्यांकन धार्मिक नज़रिये से करते थे। “ये सभी इतिहासकार उलेमा थे। ये प्रत्येक घटना का इस्लामी धर्मशास्त्र के आधार पर आकलन करते थे। वे सल्तनत को धर्मतंत्र का आधार मानते थे।.....ये लेखक ग़ैर मुसलमानों के साथ युद्ध को ज़िहाद कहते हैं।”31 इनके विपरीत चारण या जैन वृत्तांतकार ऐसा नहीं करते। अलाउद्दीन ख़लजी की विजय इस्लामी वृत्तांतकारों लिए इस्लाम की विजय है और युद्ध में हिंदुओं की मौत काफ़िरों की मौत की तरह है, लेकिन चारण-जैन वृत्तांतकार इसमें धर्म को बीच में नहीं लाते। चित्तौड़ की विजय के बाद वहाँ से अलाउद्दीन के प्रस्थान का वर्णन करते हुए अमीर ख़ुसरो लिखता है कि “10 वीं मुहरर्म  के बाद पैगंबर के ख़लीफ़ा के झंडे को (अल्लाह उसे ऊँचे से ऊंचे ले जाए) आश्चर्यजनक रीति से हिंदुओं के सिर पर फहराने के बाद इस्लाम के शहर दिल्ली की तरफ़ चलने का हुक्म हुआ। उसने सभी हिंदुओं को जो इस्लाम की पहुँच के बाहर हों, वध करना अपनी जुल्फ़कार (काफ़िर को मारनेवाली तलवार) का ऐसा कर्तव्य बनाया कि अग्र मुसलमान राफ़िज़ी (सांप्रदायिक भेद मानने वाले) नाम मात्र को अपना हक़ माँगे तो ख़ालिस सुन्नी इस अल्लाह की क़सम खा लेंगे।”32  जैन और चारण वृत्तांतकारों का नज़रिया इससे अलग है। उनके लिए यह धर्म युद्ध नहीं है। यह केवल रत्नसेन और अलाउद्दीन, दो शासकों की सेनाओं के बीच का युद्ध है। हेमरतन लिखता है कि- पदमिणी राखी राजा लीउ, गढनउ भार घणौ झीलीउ। / रिणवट करीनइ राखी रेह नमो नमो बादिल गुणगेह॥ अर्थात् (बादल ने) पद्मिनी की रक्षा करते हुए राजा को मुक्त करवा लिया। उसने दुर्ग की रक्षा का दायित्व निभाया। उसने यद्ध करके मर्यादा की रक्षा की। गुणों के घर बादल को नमन है।33 पाटनामा का समापन भी कमोबेश इसी तरह होता है। पाटनामाकार लिखता है कि-“पछै पातशाही फ़ौज भागी अर अठीने गढ़ चीतोड़ भागो।” अर्थात् फिर बादशाह की फ़ौज भागी और और चित्तौड़ गढ़ ध्वस्त हुआ।34 अलाउद्दीन के समकालीन अन्य इस्लामी वृत्तांतकारों- ज़ियाउद्दीन बरनी और अब्दुल मलिक एसामी का नज़रिया भी अमीर ख़ुसरो से अलग नहीं था। ज़ियाउद्दीन बरनी के लिए इतिहास धर्मशास्त्र का एक अंग है और अतीत उसके अनुसार अच्छाई और बुराई का संघर्ष है।35 वह कट्टर सुन्नी मुसलमान था और उसका दृष्टिकोण बड़ा ही संकीर्ण था।36 एसामी की फुतूहस्सलातीन (1350 ई.) भी एक सांप्रादायिक और संकीर्ण दृष्टिकोणवाली रचना है।37    

8.

पद्मिनी-रत्नसेन पर निर्भर कथा-काव्यों की रचनात्मकता के मूल्यांकन के दौरान यह ध्यान में रखना ज़रूरी है कि ये रचनाकार शास्त्र सिद्ध और निष्णात कवि नहीं हैं। इनकी कवि शिक्षा अनौपचारिक- पैतृक या गुरु प्रदत्त है। मध्यकाल में संस्कृत की काव्यशास्त्रीय स्थापनाओं का भी प्राकृत-अपभ्रंश और परवर्ती देश भाषाओं में समय की ज़रूरतों के अनुसार सरलीकरण और विस्तार हुआ। संस्कृत के साथ इन भाषाओं में भी छंद, अलंकार आदि से संबंधित कवि शिक्षा ग्रंथ लिखे गये। ख़ासतौर पर पश्चिमी भारत में इस तरह के कई ग्रंथों की रचना हुईं। ये सरलीकृत ग्रंथ जैन और जैनेतर, दोनों तरह के विद्वानों ने लिखे और ये ही इन अधिकांश रचनाकारों के आदर्श थे। ये रचनाएँ मूलतः ऐतिहासिक कथा रचनाएँ थीं, इसलिए इनमें रचनात्मकता के निवेश की गुंजाइश भी सामान्य काव्य रचनाओं की तुलना में कम थी। यह भी कि इन रचनाओं का लक्ष्य श्रोता भी मध्यम श्रेणी का जनसाधारण यजमान या लोक समाज था, इसलिए इनकी रचना के दौरान उनकी रुचियाँ और समझ का स्तर भी रचनाकारों के मन में रहा होगा।

काव्यरूप इन रचनाओं में चरित वर्णन पर एकाग्र संस्कृत और प्राकृत-अपभ्रंश में प्रचलित काव्य रूप हैं, जिनका इनमें क्षेत्रीय सांस्कृतिक ज़रूरतों के अनुसार सरलीकरण हुआ। “अपभ्रंश में मंगलाचरण, काव्य लिखने का कारण, विषय वस्तु की महत्ता, कवि का विनम्रता प्रदर्शन, पूर्व कवियों की प्रशस्ति, नायक के देश और नगर का वर्णन करने प्रथा प्रचलित रही है। यह अपभ्रंश कवियों की निजी विशेषता थी, जिसे हिंदी काव्य ने भी अ‍पनाया।”38 चरित, गाथा, आख्यान आदि कथा-काव्य रूपों ने अपभ्रंश और परवर्ती देश भाषाओं में कई रूप धारण किए। अज्ञात कविकृत गोरा-बादल कवित का काव्य रूप कथा बीजक काव्य रूप है। छप्पय (कवित्त) में होने के कारण इसको ‘कवित्त’ कहा गया है। डिंगल और राजस्थानी में इस तरह का काव्य रूप मिलता है। दयालदास कृत राणारासो और दलपति विजय कृत खुम्माणरासो ‘रास-रासो’ काव्य रूप में हैं। ‘रास’ जैन परंपरा और ‘रासो’ चारण काव्य परंपरा के लोकप्रिय काव्य रूप हैं। हेमरतन कृत गोरा-बादल पदमिणी चउपई और लब्धोदय कृत गोरा-बादल चरित्र चौपाई में कथा विस्तार के लिए चौपाई छंद का प्रयोग हुआ है, इसलिए इनको ‘चउपई’ या ‘चौपाई’ कहा गया है। दरअसल ये दोनों ही चरित काव्य रूप में हैं। पदमिनीसमिओ को ‘समिओ’ कहा गया, जो खंड या अध्याय का पर्याय है। यह रास-रासो का संक्षिप्त काव्य रूप प्रतीत होता है। चित्तौड़-उदयपुर पाटनामा वंश और ख्यात का मिलाजुला रूप है। ‘ख्यात’ राजस्थानी भाषा का लोकप्रिय साहित्य रूप है, जो आख्यान का देशज रूपांतरण है। चित्तौड़-उदयपुर पाटनामा अपनी तरह की अकेली वंश और ख्यात रचना है। जटमल नाहर कृत गोरा-बादल कथा भी दरअसल चरित काव्य रूप में है। चरित काव्य के लिए प्राकृत-अपभ्रंश और परवर्ती देश भाषाओं में ‘कथा’ या ‘कहा’ शब्द का प्रयोग चलन में रहा है। भाषा इन रचनाओं की सोलहवीं से लगाकर उन्नीसवीं सदी के विस्तार में बनने-बदलनेवाली उत्तरी-पश्चिमी भारत के कुछ क्षेत्रों में प्रयुक्त देशभाषा है, जिसमें प्राकृत-अपभंश और डिंगल की कई प्रवृत्तियाँ अवशेष रूप में मौजूद हैं। जैन रचनाओं में स्थानीय बोलियों का भी मुखर प्रभाव दिखता है। शब्दों में तत्सम, अधर्तत्सम और देशज के साथ फ़ारसी-अरबी शब्दों का भी प्रयोग हुआ है। छंदों का प्रयोग इनमें पारंपरिक है और इनका महत्त्व भी बहुत है। इनमें से कई रचनाओं के नामकरण उनमें प्रयुक्त प्रमुख छंद के आधार पर कवित्त, चउपई और चौपाई किए गए हैं। मध्यकाल में कथा के छंद चौपाई और दोहा थे, इसलिए इनमें इनका सबसे अधिक इस्तेमाल हुआ है। वस्तु वर्णन, ख़ासतौर पर युद्ध वर्णन के लिए छप्पय आदि छंद इस्तेमाल किए गए हैं। अलंकरण में आनुप्रासिकता इनके कवि स्वभाव में है। उपमा, उत्प्रेक्षा और उदाहरण अलंकारों का प्रयोग इनके यहाँ ख़ूब है। ऐसा लगता है जैसे इनका प्रयोग कर ये रचनाकार अपने कवि होना प्रमाणित कर रहे हैं। वस्तु वर्णन की गुंजाइश इन सभी रचनाकारों ने निकाली है, क्योंकि रचनात्मकता के लिए जगह इसी में निकलती है। अवसर आने पर दुर्ग, नगर, ऋतु वर्णन इनके यहाँ है। युद्ध वर्णन इन सभी के यहाँ है। परंपरा आग्रही होने के कारण इन्होंने कथा रूढ़ियों और अभिप्रायों का प्रयोग आग्रहपूर्वक किया है। भोजन के स्वादहीन होने के कारण राजा की नाराज़गी और रानी के इस निमित्त पद्मिनी ले लाने के ताने की लोक प्रचलित कथा रूढ़ि इनमें से अधिकांश में है। लोक व्यवहार में ये सभी कुशल लगते हैं- अवसर आते ही मुहावरों और लोकोक्तियों का प्रयोग इनके कवि स्वभाव में शामिल हैं। यथावश्यकता इन्होंने शास्त्र और लोक के प्रसिद्ध कथन या कवि सूक्तियों को भी यथास्थान उद्धृत किया है।


संदर्भ और टिप्पणियाँ:

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22. शेल्डन पोलक की इस धारणा पर भारत में व्यापक और तीखी प्रतिक्रिया हुई। संस्कृत समर्थक विद्वानों ने संस्कृत के विस्थापन या रीप्लेसमेंट को ग़लत बताया है। पोलक ने किताब के परिचय में लिखा कि “यह पुस्तक पूर्व-आधुनिक भारत में संस्कृति और शक्ति में परिवर्तन के दो महान क्षणों को समझने का एक प्रयास है। पहला क्षण ईस्वी की शुरुआत के आसपास आया, जब लंबे समय से धार्मिक व्यवहार तक सीमित एक पवित्र भाषा संस्कृत को साहित्यिक और राजनीतिक अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में पुनर्निर्मित किया गया था। इस विकास से एक अद्भुत यात्रा की शुरुआत हुई, जिसने अफ़गानिस्तान से जावा तक अधिकांश दक्षिणी एशिया में संस्कृत साहित्यिक संस्कृति को फैलाया। सत्ता का वह रूप जिसके लिए यह अर्ध-सार्वभौमिक, क्षितिज के छोर तक, ”हालाँकि ऐसी साम्राज्यवादी राजनीति वास्तविकता की तुलना में आदर्श के रूप में अधिक बार मौजूद थी। दूसरा क्षण दूसरी सहस्राब्दी की शुरुआत के आसपास तब आया, जब स्थानीय (vernacular) भाषा रूपों को साहित्यिक भाषाओं के रूप में नयी प्रतिष्ठा मिली, जिन्होंने संस्कृत को कविता और राजनीति, दोनों क्षेत्रों में चुनौती देना शुरू कर दिया और अंततः इसकी जगह ले ली।” - शेल्डन पोलक, दि लेंग्वेज ऑफ़ दि गोड्स इन वर्ल्ड ऑफ़ मेन (दिल्ली: परमानेंट ब्लेक, 2006), 1.    

23. शेल्डन पोलक, दि लेंगवेज ऑफ़ गोड्स इन दि वर्ल्ड ऑफ़ मेन, 393.   

24. आदित्य बहल, “मायावी मृगी: एक हिंद्वी सूफ़ी प्रेमाख्यान में कामना और आख्यान (1503 ई.),” मध्यकालीन भारत का सांस्कृतिक इतिहास, संपा. मीनाक्षी खन्ना (हैदराबाद: ओरियंट ब्लेकस्वान, 2012), 186.     

25. “सोलहवीं शताब्दी के सूफ़ी आख्यान में जन्मी पद्मावती की कहानी का भारत के दूर-दूर के क्षेत्रों में विस्तार और इस प्रक्रिया में इसमें अलग-अलग क्षेत्रों में जाति, धर्म, बौद्धिक और अभिजात वर्ग के अन्य प्रभावों के अधीन विकसित होते हुए परिवर्तन, इन सब का एक उदाहरणीय विश्लेषण है, जिसमें इतिहास, राजनीति और साहित्य का संयोजन है।” - हरबंश मुखिया, इवोल्विंग कंटूर्स ऑफ़ मेडिईवल हिस्ट्री- बंगीय इतिहास समिति प्रथम जदुनाथ सरकार व्याख्यान (कलकत्ता: जादवपुर विश्वविद्यालय, 2017), 25.

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27. हरबंश मुखिया, इवोल्विंग कंटूर्स ऑफ़ मेडिईवल हिस्ट्री- बंगीय इतिहास समिति प्रथम जदुनाथ सरकार व्याख्यान, 18. 

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31. हरिशंकर श्रीवास्तव, मध्यकालीन इतिहास लेखन (दिल्ली: वाणी प्रकाशन, द्वितीय संस्करण  2007), VI.

32. अमीर ख़ुसरो, भारत के आरंभिक मध्यकाल में राजनीति, संपा. मोहम्मद हबीब (दिल्ली: ग्रंथ शिल्पी, 2010) 219.

33. हेमरतन, गोरा-बादल पदमिणी चउपई, 92.

34. चित्तौड़-उदयपुर पाटनामा, संपा. मनोहरसिंह राणावत (सीतामऊ: नटनागर शोध संस्थान, 2003), 1: 406.

35. पी. हार्डी, हिस्टोरियन्स ऑफ़ मेडिईवल इंडिया, 39.

36. सैयद अतहर अब्बास रिज़वी, “अनूदित मूल ग्रंथों की समीक्षा,” ख़लजी कालीन भारत (नयी दिल्ली: राजकमल प्रकाशन, चौथा संस्करण 2016), झ.

37. हरिशंकर श्रीवास्तव, मध्यकालीन इतिहास लेखन, 111.

38. हजारीप्रसाद द्विवेदी, हिंदी साहित्य का आदिकाल, 26.

 
 
 

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