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  • Writer's pictureMadhav Hada

मीरां की कविता तमाम भक्ति कविता की तरह बहुवचन है.. । क्रेडेंट टीवी पर एक संवाद



वैदहि ओखद जाणै । पश्चिमी ज्ञान मीमांसा और मीरां ।राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2023 । संवाद : दुर्गाप्रसाद अग्रवाल एवं माधव हाड़ा

पुस्तक में मीरां को उसकी अपनी सांस्कृतिक पारिस्थितिकी से अलग, पश्चिमी विद्वत्ता के अपने सांस्कृतिक मानकों के आधार पर समझने-परखने के प्रयासों की परख और पड़ताल है । मीरां का पश्चिमी विद्वत्ता से संबंध उपनिवेशकाल से ही है। कर्नल जेम्स टॉड ने मीरां को ‘रहस्यवादी संत-भक्त और पवित्रात्मा कवियत्री’ की पहचान दी, जबकि जर्मन विद्वान् हरमन गोएत्ज़ ने खास पश्चिमी नजरिये से उसके जीवन की पुनर्रचना की। फ्रांसिस टैफ़्ट सहित कुछ पश्चिमी विद्वानों ने उसके जीवन को ‘किंवदंती’ में सीमित कर दिया, जबकि स्ट्रैटन हौली खींच-खाँचकर उसकी कविता के विरह को भारतीय समाज की कथित लैंगिक असमानता में ले गये । विनांद कैलवर्त, स्ट्रैटन हौली आदि ने मीरां को बहुत मनोयोग से पढा-समझा, लेकिन उन्होंने उसकी कविता को पांडुलिपीय प्रमाणों के अभाव, भाव विषयक बहुवचन और भाषा संबंधी वैविध्य के कारण कुछ हद तक अप्रामाणिक ठहरा दिया ।

टॉड का कैनेनाइजेशन औपनिवेशिक साम्राज्यवाद के विस्तार और स्थिरता और व्यापक नीति का हिस्सा था, जबकि हरमन गोएत्ज की मीरां के जीवन की पुनर्रचना पश्चिमी मनीषा के जीवन को देखने-समझने के विभक्त नज़रिये का नतीजा है । मीरां की पहचान और मूल्यांकन में प्रयुक्त अन्य कसौटियाँ- ‘ऑथेंटिक’, एकरूपता, संगति आदि का भी दरअसल मीरां के जीवन और कविता की पहचान और मूल्यांकन में इस्तेमाल बहुत युक्तिसंगत नहीं है। पश्चिम का सांस्कृतिक बोध अलग प्रकार का है, क्योंकि इसका विकास चर्च के अनुशासन में हुआ है, जबकि भारतीय सांस्कृतिक बोध इस तरह के किसी अनुशासन से हमेशा बाहर, स्वतंत्र रूप से विकसित हुआ। भक्ति आंदोलन तो भारतीय मनीषा की स्वातंत्र्य चेतना का विस्फोट है और स्वतंत्रता हमेशा बहुवचन में ही चरितार्थ होती है। मीरां की कविता भी इसीलिए श्रुत और स्मृत पर निर्भर ‘जीवित’ कविता है और इसका स्वर बहुवचन है ।

पुस्तक में मीरां संबंधी पश्चिमी विद्वता की इन धारणाओं का प्रत्याख्यान है। यह इसलिए ज़रूरी है कि आम भारतीय में अपनी ‘आत्म छवि’ को पश्चिम के नज़रिये से देखने-पहचाने का औपनिवेशिक संस्कार अब भी है और वह इस बात को महत्त्वपूर्ण मानता है कि पश्चिमी विद्वता उसके बारे में क्या सोचती है । वह मानता ही नहीं है, इससे बहुत दूर और गहरे तक प्रभावित भी होता है । यह प्रभाव अपनी धारणाओं को बदल देने तक नहीं होता हो, तब भी इतना तो होता ही है कि वह अपनी मान्यताओं के प्रति ‘शंकालु’ हो जाता है । यह प्रत्याख्यान इसलिए है कि आम भारतीय मीरां के संबंध में अपनी सदियों से चली आ रही धारणाओं के प्रति मन में किसी संशय को जगह देने से पहले विचार करे ।


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