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  • Writer's pictureMadhav Hada

या भव में मैं बहु दुख पायो- मीरां की यायावरी

कथादेश । यायावर स्त्री । मार्च-अप्रैल, 2024



“सगो सनेही मेरो न कोई, बैरी सकल जहान।” यह पंक्ति निरंतर असुरक्षा और निराश्रय के कारण यहाँ-वहाँ भटकनेवाली वाली मध्यकालीन संत-भक्त और कवयित्री मीरां (1498-1546 या 1563-65 ई.) दुःख की सघन व्यंजना है। मीरां के माता-पिता आदि सभी परिजन थे, उनका लालन-पालन कुटुम्ब में हुआ, उनका विवाह भी मेवाड़ के महाराणा सांगा के उत्तराधिकारी पुत्र से हुआ, लेकिन परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बनीं उनको आजीवन यहाँ-वहाँ भटकना पड़ा। सब कुछ होते हुए भी उन्हें सुख और चैन नसीब नहीं हुआ। दुःख और यायावारी हमेशा उनके साथ रहे। उनका जन्म मेड़ता में हुआ, पिता को जागीर मिलने के बाद वे कुड़की गईं, पिता की मृत्यु के बाद वे फिर मेड़ता आईं, विवाह के बाद चितौडगढ़ गईं और वहाँ प्रताड़ित होने के बाद फिर मेड़ता आईं। मेड़ता में भी उनको सुख-चैन नहीं मिला- मालदेव के आक्रमण के बाद वे विस्थापित होकर अपने बड़े पिता के साथ कई जगहों पर भटकती रहीं। थक-हार कर उन्होंने वृन्दावन की शरण ली, लेकिन सुख उनको वहाँ भी नहीं मिला। यहाँ से वे द्वारिका चली गईं। द्वारिका में भी वे सुख-चैन से नहीं रहीं- अपना घर-देश छोड़ने की तक़लीफ़ वहाँ भी उनकी सलाती रही। द्वारिका से उनकी वापसी के प्रयत्न भी हुए, लेकिन उन्होंने लौटने से मना कर दिया। जनश्रुतियाँ  कहती हैं कि वे वहीं द्वारिकाधीश की प्रतिमा में विलीन हो गईं। यह भी उनकी यात्रा का अंत नहीं था- कहते हैं कि प्रतिमा में विलीन हो जाने के बजाय वे छिपकर फिर यात्रा पर निकल गईं। जनश्रुतियों में आता है कि द्वारिका से निकल कर वे तीर्थ यात्रा के लिए पहले दक्षिण भारत और फिर बांधवगढ, नदिया, मथुरा, आंबेर आदि कई स्थानों गईं। उनका निधन कैसे और कहाँ हुआ, यह कोई नहीं जानता। यह आज भी रहस्य है। मीरां आजीवन भटकती रही।  उनका निरंतर भटकना उनकी कविता में जीवन की गहराई और वैविध्य में फलीभूत हुआ।

1.

मीरां का बाल्यकाल भरे-पूरे परिवार के बीच लगभग सुखपूर्वक व्यतीत हुआ। मीरां के दादा राव दूदा ने 1465 ई. से लगाकर अपनी मृत्यु तक मेड़ता में निर्विध्न शासन किया। यह मीरां के जन्म और बाल्यकाल का समय भी था। मीरां का विवाह मेवाड़ के पराक्रमी शासक महाराणा सांगा के पुत्र भोजराज के साथ 1516 ई. के आसपास हुआ। यह विवाह अन्य सामन्त युवतियों के विवाह की तरह सामान्य विवाह था। मीरां का वैवाहिक जीवन भी कुछ मामूली प्रतिरोधों और दैनंदिन ईर्ष्या-द्वेषों के अलावा कमोबेश सुखी था। उसके अपने पति भोजराज से संबंध भी सामान्य थे। भोजराज का निधन महाराणा सांगा के जीवनकाल में ही मीरां से विवाह के कुछ वर्षों बाद ही 1518 से 1523 ई. के बीच कभी गुजरात या मालवा अभियान के दौरान हो गया।

महाराणा सांगा की मृत्यु के बाद रत्नसिंह उनका उतराधिकारी हुआ और उसके 1531 ई. में मरने पर विक्रमादित्य मेवाड़ की राजगद्दी पर बैठा। इस समय तक मीरां की भक्ति और भावपूर्ण भजनों की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई थी और सुदूर स्थानों के साधु-संत उससे मिलने आया करते थे। विक्रमादित्य इससे अप्रसन्न रहता था और उनको तरह-तरह की तक़लीफ़ें दिया करता था। ऐसा प्रसिद्ध है कि उसने मीरां को मरवाने के लिए विष देने आदि के प्रयोग किए, परन्तु वे निष्फल हुए। विक्रमादित्य से पूर्व 1528 से 1531 ई. तक अल्पसमय के लिए सत्तारूढ़ रत्नसिंह से भी मीरां के संबंध अच्छे नहीं रहे होंगे। रत्नसिंह और उसकी माँ धनाबाई राठौड़ मीरां के बड़े पिता वीरमदेव के ख़िलाफ़ थे।

2.

मीरां का अधिकांश विधवा जीवन कष्टमय और घटनापूर्ण था। 1523 और 1540 ई. के बीच परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बनीं कि मेवाड़ और मेड़ता, दोनों ही सता संघर्ष, अंतःकलह और बाह्य आक्रमणों की चपेट में आ गए। मीरां के आरम्भिक विधवा जीवन में सुरक्षा तो थी, लेकिन शांति और सुख नहीं था। 1518-23 ई. में मेवाड़ के अंतःपुर का माहौल विषाक्त हो चुका था। सांगा का अंतःपुर बड़ा था- उसमें 28 रानियों के अलावा कई पासवानें, बहुएँ और बेटियाँ थीं। महाराणा सांगा के युद्ध अभियानों में बाहर रहने से अंतःपुर में उत्तराधिकार के लिए अंतःकलह और संघर्ष बढ गया था। मीरां सती नहीं हुई, इस कारण भी अंतःपुर के एक वर्ग में उनके प्रति नाराज़गी का भाव रहा होगा। मीरां इस कारण अंतःपुर में एकाकी हो गई होंगी। महाराणा सांगा के निधन के बाद मीरां की मुश्किलें बढ़ती ही गईं। 1513 ई. में रत्नसिंह के निस्संतान मरने पर विक्रमादित्य सतारूढ़ हुआ। वह अयोग्य और मूर्ख था। उसके व्यवहार से दुःखी सभी जागीरदार अपने ठिकानों में चले गए या शत्रुओं से मिल गए और चारों तरफ़ अराजकता फैल गई। सामंतों और अंतःपुर में असुरक्षा और अविश्वास का माहौल हो गया। विक्रमादित्य और उसकी माँ करमेती के मन में मीरां को लेकर शत्रुता और नाराज़गी तो पहले से ही थी। कुलोचित मान-मर्यादा के विरुद्ध उनके स्वेच्छाचारों से यह और बढ़ गई। विक्रमादित्य ने मीरां पर कई पाबंदियाँ लगा दीं और उन्हें कष्ट और यातनाएँ देना शुरू कर दिया। मीरां को ज़हर देकर मारने के प्रयास का प्रसंग उनकी कविताओं में एकाधिक बार आता है और इसकी पुष्टि विभिन्न धार्मिक-सांप्रदायिक चरित्र-आख्यानों और लोक स्मृतियों से भी होती है।

मीरां का विधवा जीवन मेवाड़ और मेड़ता में बाह्य आक्रमणों, अंतःकलहों और परिजनों की मृत्यु के विषाक्त और शोकपूर्ण माहौल में बीता। महाराणा सांगा और बाबर के बीच हुआ खानवा का युद्ध बहुत भीषण था। महाराणा सांगा की इस युद्ध में पराजय से उतर भारत में मुग़ल का साम्राज्य का बीजारोपण हो गया। मेवाड़ में इसके बाद षडयंत्र और अंतःकलह शुरू हो गए। खानवा के युद्ध में वीरमदेव ने ससैन्य भाग लिया, जिसमें वह तो घायल होकर बच गया, लेकिन मीरां के पिता रत्नसिंह अपने भाई रायमल के साथ मारे गए। अपनी पराजय से आहत महाराणा सांगा को उनके अपने ही सामंतों ने ज़हर दे दिया, जिससे उनकी मृत्यु हो गई। पिता और ससुर, दोनों की मृत्यु ने मीरां को भीतर तक हिला दिया होगा। मेवाड़ में अराजकता का लाभ उठाकर गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने 1532 ई. में मेवाड़ पर चढ़ाई कर दी। बहादुरशाह ने पहले आक्रमण में तो संधि कर ली और लौट गया, लेकिन उसने 1535 ई. में मेवाड़ पर फिर आक्रमण किया। मेवाड़ इस आक्रमण के लिए तैयार नहीं था। आक्रमण बहुत भीषण था- इसमें मेवाड़ के कई सामंत काम आए और करमेती को कई स्त्रियों के साथ जौहर करना पड़ा। मीरां मेवाड़ पर हुए इन दोनों आक्रमणों के बीच कभी मेड़ता चली गई होंगी, क्योंकि यदि वे 1535 ई. के दूसरे साके में चित्तौड़ में होतीं, तो अन्य स्त्रियों की तरह उन्हें भी जौहर में जल कर मरना पड़़ता।

रत्नसिंह और विक्रमादित्य से प्रताडित और दुःखी मीरां अपने पीहर में अपने बड़े पिता वीरमदेव के पास आ गईं, लेकिन यहाँ भी उसका जीवन निश्चिंत और निर्विघ्न नहीं रहा। अंतःसंघर्ष और बाह्य आक्रमणों ने यहाँ भी उसका पीछा नहीं छोड़ा। जोधपुर के राव गांगा के समय से ही उसके उत्तराधिकारी मालदेव और वीरमदेव में शत्रुता चली आ रही थी। मालदेव ने 1536 ई. में मेड़ता पर चढ़ाई कर दी। वह इतना क्रूर और नृशंस था कि उसने मेड़ता को पूरी तरह तहस-नहस कर वीरमदेव को कई वर्षों तक निराश्रय यहाँ-वहाँ भटकने के लिए मजबूर कर दिया। मीरां भी कुछ समय अपने परिजनों के साथ यहाँ-वहाँ भटकती रहीं। मेड़ता से उखड़ने के बाद यहाँ-वहाँ भटकने के दौरान ही कभी मीरां पहले वृन्दावन और फिर द्वारिका चली गईं। मीरां की कविता के अन्तःसाक्ष्यों से लगता है कि वे टोडा तक वीरमदेव के साथ थीं। उसके एक अल्पचर्चित पद में यह उल्लेख मिलता है। वे कहती हैं- “जाण न दी जी य्यारे कारणे रे ज मीरां टोडारे बेस मोटी हुई।”  

3.

मीरां का अंतिम कुछ समय वृन्दावन और शेष द्वारिका में निकला। मीरां वृंदावन जाने से पहले मीरां पुष्कर की तीर्थ यात्रा पर भी गईं। वृंदावन उस समय कृष्ण भक्ति का केन्द्र था। कृष्ण भक्ति के अधिकांश सांस्थानिक संप्रदाय यहाँ सक्रिय थे इसलिए मीरां यहाँ जरूर गई होंगी। वीरमदेव के साथ टोडा आदि जिन स्थानों पर वह रही, वे वृन्दावन से बहुत दूर नहीं थे। मीरां के वृन्दावन प्रवास में धार्मिक आख्यानों में आए जीव गोस्वामी से उसकी भेंट और उनके स्त्री मुख नहीं देखने के प्रण को छुड़ाने के प्रसंग से भी होती है। यह प्रसंग कुछ सच्चाई लिए हुए है, क्योंकि इसका उल्लेख जीव गोस्वामी से संबंधित चैतन्य गौड़ीय संप्रदाय के प्रियादास के साथ ‘पदप्रसंगमाला’ में नागरीदास ने भी किया है। वीरमदेव से अलग होकर मीरां वृन्दावन आई, लेकिन शांति और सुख उन्हें यहाँ भी नहीं मिले। वृन्दावन मेवाड़ से दूर था, लेकिन यह उससे पूरी तरह असंबद्ध नहीं था। आगरा उस समय राजनीतिक गतिविधियों का केन्द्र था। आगरा वृन्दावन के समीप था, इसलिए यहाँ की मीरां की गतिविधियों की सूचनाएँ मेवाड़ तक पहुँचती होंगी। मेवाड़ में अब माहौल और विषाक्त हो गया था और सत्ता के लिए उठापटक बढ़ गई थी। विक्रमादित्य के चाल-चलन में कोई अंतर नहीं आया था। 1536 ई. में राणा सांगा के मृत बड़े भाई पृथ्वीराज के पासवानिये पुत्र बनवीर ने एक दिन मौका पाकर विक्रमादित्य हत्या कर दी। वह उसके छोटे भाई उदयसिंह को भी मारना चाहता था, लेकिन वह बचकर सुरक्षित कुम्भलगढ़ पहुँच गया। मीरां का वृन्दावन में खुलकर साधुओं के साथ उठना-बैठना और भजन-कीर्तन करना असुरक्षित और कमज़ोर विक्रमादित्य को और बाद में बनवीर को चिढ़ाने वाला रहा होगा। हो सकता है कि उन्होंने मीरां को वृन्दावन से विस्थापित करने के उपक्रम किए हों। धार्मिक आख्यानों में इसका संकेत मिलता है। प्रियदास की टीका में कहा गया है कि- “राणा की मलीन मति देखी बसी द्वारावती।”  

मीरां के विधवा जीवन के अंतिम वर्ष द्वारिका और बेट द्वारिका में भजन-कीर्तन, पुण्यकार्य और सत्संग आदि में निकले। गुजरात में मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन को वहाँ के जनसाधारण के सरल समावेशी और उदार होने के कारण व्यापक स्वीकृति मिली। नरसी मेहता, ईसरदान आदि कई संतों ने यहाँ के सामंतों और जनसाधारण को गहराई तक प्रभावित किया। यहाँ के गिरनार, जूनागढ़, डाकौर आदि कई स्थान बड़े भक्ति केन्द्रों के रूप में विकसित हुए। यहाँ गुजरात से बाहर के भी कई संतों का आवागमन हुआ। कहते हैं कि मीरां सौराष्ट्र में पहले जूनागढ़ आई। जूनागढ़ से सरसई, सोमनाथ, गौरखमणि, माधवपुर, घेड, सूदामापुरी, पोरबंदर और नियाड़ी होते हुए वह आरंभड़ा पहुँचीं, जहाँ उस समय शिवा सांगा नामक वाढ़ेल राजा शासक था। शिवा सांगा स्वयं कृष्ण भक्त था। कहते हैं कि मीरां काफ़ी समय तक आरंभड़ा में रहीं। मीरां आरंभड़ा के बाद वह बेट द्वारिका में रहीं। यहाँ उसने एक मंदिर बनवाया। जर्मन भारतविद हरमन गोएत्ज के अनुसार मीरां 1537 ई. में द्वारिका पहुँची तब वहाँ का मुख्य कृष्ण मंदिर नष्टप्राय अवस्था में था। संभवतया मीरां की प्रेरणा से इसका पुनर्निर्माण हुआ।

मीरां जीवन के अंतिम चरण में गुजरात में पूरी तरह रच-बस गई थी। उसकी गणना नरसी मेहता के साथ पन्द्रहवीं शती के गुजारती भक्ति साहित्य के दो प्रमुख कवियों में होती है। मीरां की द्वारिका से मेवाड़-मारवाड़ वापसी के प्रयत्न हुए। कहते हैं कि उदयसिंह और जयमल दोनों ने ही कुछ सामंतों को ब्राह्मणों सहित द्वारिका भेजकर मीरां की वापसी के प्रयत्न किए, लेकिन मीरां ने मेवाड़-मेड़ता लौटने से इनकार कर दिया। ब्राह्मणों ने मीरां के द्वार पर धरना दिया और उसको राणा की विनती सुनाई। मीरां यह सुनकर रणछोड़ भगवान से विदा लेने मंदिर में गईं और वहीं मूर्ति में विलीन हो गईं।

4.

मीरां अदृश्य हो गईं- उन्होंने जल समाधि ले ली या वे चुपचाप कहीं चली गईं, लेकिन लोक में प्रचारित यह हुआ कि कि मेवाड़ वापसी के लिए धरना देने वाले ब्राह्मणों की सम्भावित मृत्यु पर ब्रह्म हत्या का पाप लगने के भय से मीरां भगवान रणछोड़ से अनुमति लेने मंदिर में गईं और वहीं उनकी मुर्ति में विलीन हो गईं। यह भी प्रचारित हुआ कि मूर्ति में समा जाने के दौरान उसके वस्त्र का कुछ हिस्सा बाहर रह गया। सांकेतिक रूप में अभी भी द्वारिका में द्वारिकाधीश की प्रतिमा के शृंगार में वस्त्र का एक हिस्सा इसीलिए बाहर रखा जाता है। लोक में प्रचारित हो गया कि 1546 ई. के आसपास मीरां भगवान रणछोड़जी की मूर्ति में समा गईं। यह घटना 1546 ई. के आसपास हुई, इसलिए इसके बाद मीरां की अकबर, मानसिंह, तुलसीदास, तानसेन और बीरबल से भेंट से संबंधित जनश्रुतियों को अनैतिहासिक मान कर ख़ारिज कर दिया गया। कुछ लोगों का अनुमान है कि मीरां का निधन 1546 ई. के आसपास नहीं हुआ। अधिकांश पारम्परिक स्रोतों के अनुसार मीरां की मृत्यु 65-67 वर्ष की उम्र में हुई, इसलिए इस हिसाब से 1498 ई. के आसपास जन्म लेने वाली मीरां का निधन 1563-1565 ई. में हुआ होगा। विद्वानों का मानना है कि मूर्ति में समा जाने की कहानी मीरां से मेवाड़ लौटने का आग्रह करने वाले ब्राह्मणों ने अपनी असफलता छिपाने के लिए गढ़ी होगी। मीरां के जीवन की पुनर्रचना करने वाले हरमन गोएत्ज का अनुमान है कि मीरां द्वारिका से चुपचाप निकलकर चली गईं। उसके अनुसार द्वारिका से अदृश्य हो जाने के बाद मीरां दक्षिण और पूर्वी भारत के तीर्थस्थानों की यात्रा और प्रवास पर रही होंगी। लोक में भी इस संबंध में कोई विश्वास या धारणा नहीं है। लगभग एक दशक बाद 1560 ई. से कुछ पहले सबसे पहले उत्तर भारत में बांधवगढ़ (रीवां) के राजा रामचंद्र बाघेला (1555-1592 ई़) के दरबार में उसकी मौजूदगी के फिर संकेत मिलते हैं। लोक धारणाओं के अनुसार यहाँ कुछ समय रहने के बाद वह आम्बेर और मथुरा गईं। जनश्रुतियों में वर्णित तानसेन, तुलसीदास, अकबर, मानसिंह और बीरबल से उसकी भेंट इसी दौरान हुई होगी। ये जनश्रुतियाँ एकबारगी पूरी तरह अनैतिहासिक और कपोल-कल्पित लगती हैं, लेकिन यदि मीरां का निधन 1546 ई. के आसपास नहीं हुआ और वे 1563-1565 ई. तक जीवित थीं, तो इस दौरान के ऐतिहासिक घटनाक्रम और परिस्थितियों के साथ इनका तालमेल बैठ जाता है।

दक्षिण भारत की अपनी लम्बी यात्रा का समापन मीरां ने शायद पुरी और नदिया होते हुए बांधवगढ़ में राजा रामचंद्र बाघेला के यहाँ किया। रामचंद्र बाघेला 523 या 626 ई. में गुजरात से वहाँ आकर बाघेला राज्य की बुनियाद रखने वाले व्याघ्रदेव का वंशज था। उसका दरबार मध्यकाल में संत-भक्तों, कवियों और कलाकारों का प्रमुख आश्रय स्थल था। वह संतों-भक्तों का भी सम्मान करता था। कहते हैं कि कबीर भी वहाँ गए थे। वल्लभाचार्य के पुत्र विठ्ठलनाथ भी जगन्नाथपुरी की यात्रा से लौटते हुए यहाँ रुके थे। मेवाड़-मारवाड़ के लोक में भी मीरां के वाघेलों के यहाँ जीवित होने की अपुष्ट जानकारी थी। यह उल्लेख उसके पदों में एक स्थान पर आता है। मीरां की ननद ऊदां एक पद में कहती है कि- “राणाजी रा वाघेला थे ल्यो ने मीरां जी री खबरि, मुईक जीवै मीरां मेड़ती।” अर्थात् राणाजी के वाघेलों, तुम ख़बर लो कि मेडतणी मीरां जीवित है या मर गई। मीरां यहीं तानसेन के संपर्क में आई होंगी। तानसेन 1560 ई. से पूर्व तक रामचंद्र बाघेला के दरबार में था। बाद में यहीं से अकबर आग्रहपूर्वक उसको अपने दरबार में ले गया। बीरबल के नाम से विख्यात महेशदास भी रामचंद्र बाघेला के दरबार में रहा था इसलिए वह, हो सकता है, यहीं उसके भी संपर्क में आई होंगी। बांधवगढ़ के पास ही रामभक्ति के लिए प्रसिद्ध और प्राकृतिक सुषमा से भरपूर चित्रकूट में तुलसीदास (1532-1623 ई.) भी थे।  संभवतया मीरां यहीं उनसे भी मिली होंगी। बांधवगढ़ में कुछ समय प्रवास के बाद संभवतया मीरां ने आम्बेर और मथुरा का रुख किया होगा। मीरां यहाँ शायद आम्बेर के राजा भगवानदास के दत्तक पुत्र मानसिंह के संपर्क में आई। मानसिंह और बीरबल दोनों ही युवा अकबर के बहुत आत्मीय और निष्ठावान सामंत और मित्र थे, इसलिए आश्चर्य नहीं है कि वह इन दोनों के ज़रिये अकबर (1542-1605 ई़.) के भी संपर्क में आई हों।

आम्बेर के राजाओं के साथ मीरां की घनिष्ठता भी असामान्य नहीं थी। दरअसल वे अपने समय के सबसे अधिक उदार और प्रगतिशील राजपूत शासक थे। भारमल का पिता पृथ्वीराज कृष्णदास पयहारी का शिष्य और प्रसिद्ध कृष्ण भक्त था। उसका उल्लेख ‘भक्तमाल’ में भी आता है। बाबर के विरुद्ध खानवा के युद्ध में वह सांगा का सहयोगी था। बालाबाई के नाम से विख्यात उसकी एक राठौड़ रानी अपूर्वादेवी भी मीरां की तरह कृष्ण भक्त थी। शायद मीरां का मानसिंह पर खास प्रभाव पड़ा। अकबर ने भगवानदास और मानसिंह के साथ 1568 ई. में चित्तौड़ पर आक्रमण किया। यह आक्रमण बहुत विध्वंसकारी था, इसमें नरसंहार भी ख़ूब हुआ, लेकिन मानसिंह इस दौरान मीरां सेवित गिरधरजी की मूर्ति को सुरक्षित बचाकर अपने साथ ले गया। भगवानदास और मानसिंह ने बाद में आम्बेर में सुंदर और भव्य जगतशिरोमणिजी का मंदिर बनवा कर इसमें उसको प्रतिष्ठापित किया। वृंदावन में मानसिंह ने भारतीय और मुग़ल शैली के मिले-जुले स्थापत्यवाला गोविन्ददेव का जो विशालकाय और भव्य मंदिर बनावाया उससे भी मीरां के संबंध का कुछ अनुमान किया जा सकता है। यह तो लगभग मान्य तथ्य है कि जीव गोस्वामी रूप गोस्वामी के भतीजे थे और उनकी मीरां से भेंट हुई थी और वे उससे प्रभावित भी थे। मीरां मंदिर की प्रतिष्ठा तक जीवित नहीं थी, लेकिन संभव है कि मानसिंह के मन में मीरां से संबंध के कारण जीव गोस्वामी और रूप गोस्वामी के प्रति आदर-सम्मान और श्रद्धा का भाव रहा हो। अकबर पर मीरां के प्रभाव के संबंध में कुछ भी ज्ञात नहीं हैं। शायद उस पर सीधा कोई प्रभाव नही रहा होगा, लेकिन ऐसा हो सकता है कि वह मीरां के सीधे संपर्क में आनेवालों से प्रभावित रहा हो। कहते हैं कि अकबर की पहली और सबसे प्रभावशाली हिन्दू रानी हरखाबाई उर्फ़ मरियम उज़-ज़मानी मीरां की शिष्या थी।

मीरां की यात्राएँ प्रसन्नकारी नहीं थीं। वे एक सामंत स्त्री संत-भक्त थीं, इसलिए संभव है उनको यात्राओं में सुविधाएँ उपलब्ध रही हों, लेकिन एक तो भ्रमणकारी स्त्री संत-भक्त होने के कारण उनके पुरुष संत-भक्तों के साथ संबंध बहुत सहज नहीं रहे होंगे और दूसरे, अजनबी स्थानों पर अपना घर-देश उनकी स्मृतियों में निरंतर चुभता रहा होगा। वैसे भी मध्यकाल में पुरुष वर्चस्व वाले संत-भक्त समाज में स्त्री संत-भक्तों की स्वीकार्यता बहुत मुश्किल थी। अक्क महादेवी को भी शिव शरणों के यहाँ कल्याण पहुँचने पर अल्लम प्रभु को अपने संत होने की योग्यता का साक्ष्य देना पड़ा था। मीरां को भी वृंदावन में जीव गोस्वामी ने उनके स्त्री होने के कारण मिलने से मना कर दिया। मीरां की यात्राएँ स्वैच्छिक नहीं थीं, इसलिए अपने घर-परिवार और देश की स्मृतियों ने उनको बहुत विचलित किया होगा। मीरां आम संत-भक्तों की तरह संसार विरत स्त्री नहीं थीं- वे घर-परिवार के संबंधों के सुख-दुःख और द्वंदव के बीच में थीं। संबधों का यह सुख़-दुख़ भी उनको अपनी यात्राओं के दौरान बहुत याद आता रहा होगा। हरजस कहे जाने वाले उनके एक पद यह व्यथा आई है। वे कहती हैं कि- “आंबा पाक्या, कळहर कैरी, निंबूडा म्हारे देस। उदपुर रा राणा किण विध छोड्यो देस, मेवाड़ी राणा कण पर छोड्यो देस।” मतलब यह है कि आम पक गए होंगे, केरियाँ आ गई होंगी। मेरे देश में तो केवल नींबू हैं। हे राणा! तू नहीं जानता क्या कि मैंने देश क्यों छोड़ा? घर-परिवार के सुख-दुःख़ और संबंधों के अभाव के बोझ साथ निरंतर यहाँ-वहाँ भटकना बहुत पीड़ादायी होता है। मीरां की आजीवन यायावरी भी बहुत कष्टकारी रही होगी। मीरां की कविता की एक पंक्ति है- “या भव में मैं बहु दुःख पायो।” दुःख़ी होकर वे यायावर हुईं और फिर यायावरी भी उनके लिए बहुत कष्टदायी रही। यायावरी ने उनकी कविता को समृद्ध, दूसरों से अलग और ख़ास बनाया। निरंतर भटकने से उनकी  कविता में जीवन गहराई आई, उसमें अनुभव का वैविध्य आया और उसका स्वर बहुवचन हुआ।

 

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