• Madhav Hada

मीरां की कविता के भाषायी वैविध्य का यथार्थ


मधुमती । मार्च, 2021 में प्रकाशित


मीरां की कविता का भाषायी वैविध्य ‘आधुनिकता’ के संस्कार और आदत वाले लोगों को चौंकाने वाला लगता है। मीरां की रचनाएँ आज के हिसाब से राजस्थानी के साथ अलग से गुजराती, ब्रज आदि में भी मिलती हैं और इसमें एक साथ गुजराती, ब्रज, राजस्थानी आदि का मिलाजुला रूप भी मिलता है। इस आधार पर भी मीरां की कविता को अप्रामाणिक माना गया है। दरअसल मीरां की कविता में भाषायी वैविध्य हमें भाषायी वर्गीकरण और विभाजन की औपनिवेशिक समझ के कारण दिखाई पड़ता है। उपनिवेशकाल से पहले तक जब भारतीय भाषाओं को औपचारिक पहचान नहीं मिली थी, तब यहाँ का भाषायी परिदृश्य अलग था। यहाँ की भाषाएँ और बोलियाँ एक-दूसरे से इस तरह से संबद्ध थीं कि इनको पृथक् और वर्गीकृत करना कठिन था। भारत के भाषा सर्वेक्षण के दौरान जार्ज ग्रियर्सन को इसी तरह की मुश्किल का सामना करना पड़ा। उनसे पहले तक तो यूरोपीय विद्वान् तो एक-दूसरे से भिन्न चरित्र और स्वभाव वाली भारतीय भाषाओं की भी इनकी परस्पर संबद्धता के कारण सदियों तक कोई अलग पहचान नहीं बना पाए। लंबे समय तक शब्द समूह की समानता के आधार पर कतिपय दक्षिण भारतीय भाषाओं को भी संस्कृत से उत्पन्न माना जाता रहा। जार्ज ग्रियर्सन ने खींच-खाँचकर भारतीय भाषाओं का जो वर्गीकरण और विभाजन किया उससे पहली बार भाषाओं को एक-दूसरे से अलग पहचान मिली। विडंबना यह है कि खींच-खाँचकर कर किया गया वर्गीकरण और विभाजन तो हमारी भाषायी समझ का हिस्सा हो गया, लेकिन भारतीय भाषाओं की परस्पर घनिष्ठ संबद्धता संबंधी कई बातें जो सर्वेक्षण के दौरान सामने आईं, उन पर कम लोगों का ध्यान गया। मीरां की कविता के भाषायी वैविध्य को भारतीय भाषाओं की इस परस्पर संबद्धता से अच्छी तरह समझा जा सकता है।

भारतीय भाषाएँ एक-दूसरे से इस तरह जुड़ी हुई हैं कि वे एक-दूसरे से कहाँ और कैसे अलग होती हैं, यह तय करना मुश्किल काम है। अकसर वे दूसरी भाषा की सीमा शुरू होने से पहले ही उसके जैसी होने लगती हैं। ग्रियर्सन ने भी सर्वेक्षण के दौरान यह महसूस किया। उसने इसके प्रतिवेदन के पूर्व कथन में भारत में क्षेत्रीय भाषाओं की सीमाओं की चर्चा करते हुए लिखा कि ‘‘सामान्यतः जब तक विशेष रूप से जाति (रेस) एवं संस्कृति में अंतर न हो या बड़ा पहाड़ या प्राकृतिक बाधा उपस्थित न करे, तब तक भारतीय भाषाएँ एक-दूसरे में विलीन हो जाती हैं।’’ मीरां की कविता की भाषा में गुजराती, राजस्थानी, ब्रज आदि अलग-अलग भाषाएँ नहीं हैं। ये एक ही भाषा के क्षेत्रीय रूप हैं, जो कुछ दूर चलकर एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं। मीरां ने पर्याप्त देशाटन किया, इसलिए उसकी भाषा में एक ही भाषा के एक-दूसरे संबद्ध और एक-दूसरे में घुले-मिले क्षेत्रीय रूप हैं, जो अब औपनिवेशिक भाषायी समझ के कारण हमें अलग भाषाओं के रूप में दिखाई पड़ते हैं।

भारत में भाषा के क्षेत्रीय रूपों को पहचान देने का आग्रह उपनिवेशकाल से पहले तक लगभग नहीं था। भाषा का क्षेत्रीय वैशिष्ट्य यहाँ सदियों से है, लेकिन इसके आधार पर पृथक् भाषायी पहचान का आग्रह यहाँ कभी नहीं रहा। अपनी भाषा की अलग पहचान और उसके नामकरण की सजगता यहाँ लगभग नहीं थी। भाषाएँ यहाँ इस तरह एक-दूसरे से जुड़ी और एक-दूसरे में घुली-मिली थीं कि कि इनको अपनी अस्मिता के साथ जोड़ कर देखना संभव नहीं था। भाषा को अपनी अस्मिता का हिस्सा बनाने का चलन यहाँ उपनिवेशकाल के बाद शुरू हुआ। भारतीय भाषाओं को उनकी क्षेत्रीय विशेषताओं के आधार पर पहली बार वर्गीकृत और विभक्त करने वाले जार्ज ग्रियर्सन ने भी भाषा के मामले में भारतीयों के इस ख़ास नज़रिये को लक्ष्य किया। उन्होंने सर्वेक्षण के अपने प्रतिवेदन के पूर्वकथन में एक जगह लिखा कि “एक सामान्य भारतीय ग्रामीण यह नहीं जानता कि जिस बोली को वह बोल रहा है उस का नाम भी है। वह अपने यहाँ से पचास मील दूरी पर बोली जानेवाली बोली का नाम तो बता सकता है, किंतु जब उसकी बोली का नाम पूछा जाता है तो वह कह उठता है कि “ओह, मेरी बोली का तो कुछ नाम नहीं है, यह तो विशुद्ध भाषा है।” भारत में देशभाषा अथव बोलियों की नाम संज्ञाओं को मान्यता और स्वीकृति उपनिवेशकाल में मिली। यहाँ के लोग अपनी भाषा को देशभाषा या बोली कहते थे या फिर दूसरे लोग उसका क्षेत्र के आधार पर कोई नाम कौशली, गुजराती आदि रख देते थे। मीरां की कविता की लोकप्रियता के उतर भारत के बड़े भूभाग में थी, इसलिए इस भाषा की अलग-अलग क्षेत्रीय विशेषताएँ तो इसमें आ गई थीं, लेकिन इन क्षेत्रीय विशेषताओं को अलग भाषायी पहचान का दर्ज़ा उपनिवेशकाल में मिला और बाद में यह चलन में भी आ गया। मीरां की कविता में भाषा में उस क्षेत्र की उच्चारण आदि तमाम क्षेत्रीय विशेषताएँ हैं, जहाँ यह चलन में थी। अब यही विशेषताएँ मुखर होकर अस्मिता का हिस्सा हो जाने के कारण हमें अलग भाषाओं के रूप में दिखाई पड़ती हैं।

पंद्रहवीं-सोलहवीं सदी की मीरां की कविता को आज की राजस्थानी गुजराती, ब्रज आदि भाषायी पहचानों में देखना गलत है। यह तय है कि उत्तर भारतीय देश भाषा की क्षेत्रीय पहचानों का विकास बहुत पहले शुरू हो गया था। उद्योतन सूरि की आठवीं सदी की रचना कुवलयमाला के अनुच्छेद 242 में 18 देशी भाषाओं का क्षेत्रीय विशेषताओं के साथ सोदाहरण नामोल्लेख हैं, लेकिन ख़ास बात यह है कि यहाँ ये पृथक् अस्तित्व वाली भाषाओं के रूप में उल्लिखित नहीं हैं। यहाँ भाषा एक है, लेकिन यह अलग-अलग क्षेत्रीय विशेषताओं के साथ बोली जा रही है। दरअसल मीरां के समय पंद्रहवीं-सोलहवीं सदी में राजस्थान, गुजरात, ब्रज, मालवा आदि में जो भाषा इस्तेमाल हो रही थी, वह कुछ क्षेत्रीय विशेषताओं को छोड़कर लगभग एक थी। जार्ज ग्रियर्सन ने भी उपनिवेशकाल मे भाषाओं का वर्गीकरण और विभाजन तो किया, लेकिन वह इस सच्चाई से परिचित थे कि क्षेत्रीय भिन्नताओं के साथ तमाम उत्तर भारत में एक ही भाषा इस्तेमाल होती थी। सर्वेक्षण के दौरान वह भी इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि “राजपूताना, मध्यभारत तथा गुजरात के विस्तृत क्षेत्रों में दैनिक जीवन में व्यवहृत शब्द एवं शब्द समूह प्रायः समान है। हाँ, उच्चारण में अंतर अवश्य है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है और सामान्य लोगों का विश्वास भी यही है कि गंगा के समस्त कांठे में, बंगाल और पंजाब के बीच, अपनी अनेक स्थानीय बोलियों सहित केवल एक मात्र प्रचलित भाषा हिन्दी ही है।” इस भाषा की अलग-अलग और स्पष्ट क्षेत्रीय पहचानें बहुत बाद में विकसित हुईं। ख़ास बात यह है कि इनका पृथक् भाषिक पहचानों के रूप में विभाजन और वर्गीकरण तो आगे चलकर उपनिवेशकाल में जार्ज ग्रियर्सन ने किया। गुजराती साहित्य एक विशेषज्ञ आई.जे.एस. तारपुरवाला ने पंद्रहवीं-सोलहवीं सदीं में मीरां की कविता के भाषिक वैविध्य के कारणों की बहुत युक्तिसंगत पड़ताल की है। उनके अनुसार ''मीरां पर गुजरात, राजपुताना और पूरा मथुरा क्षेत्र अपना दावा करता है, लेकिन जिस समय में वह जी रही थी, उस समय इन क्षेत्रों में केवल एक ही भाषा-पुरानी गुजराती या पुरानी पश्चिमी राजस्थानी प्रचलित थी, इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि उनके पद अब उन तमाम क्षेत्रीय भाषाओं में मिलते हैं, जिन्होंने इस भाषा का स्थान ले लिया था।” दरअसल हुआ यही है कि मीरां के पद राजस्थान, गुजरात, मालवा, ब्रज आदि में उस समय लगभग समान रूप से व्यवहृत भाषा में हुए, लेकिन जैसे-जैसे क्षेत्रीय भाषिक इकाइयों का पृथक् विकास हुआ, ये पद इन इकाइयों के अनुसार राजस्थानी, ब्रज, गुजराती आदि में ढलते गए।

मीरां की कविता आज के हिसाब से, राजस्थानी के बाद सबसे अधिक गुजराती और ब्रज में मिलती है। राजस्थानी में तो ठीक है, लेकिन कुछ विद्वानों को उसकी कविता के गुजराती और ब्रज में होने पर आपत्ति है। यह इसलिए है, क्योंकि हम मीरां की कविता को आज की भाषायी पहचानों में देखना-समझना चाहते हैं, जो ग़लत है। मीरां के पदों की मूल भाषा अपभ्रंश की अंतिम अवस्था में विकसित वह देश भाषा है, जिसका व्यवहार कुछ विशेषताओं के साथ लगभग तमाम उत्तर भारत में होता था। मध्यकालीन वैयाकरणों ने इस भाषा का नाम सब जगह देश भाषा ही प्रयुक्त किया है। एल.पी. तेस्सीतोरी आदि कतिपय आधुनिक विद्वानों ने इसको 'पुरानी पश्चिमी राजस्थानी', या 'जूनी या पुरानी गुजराती' आदि नाम भी दिए हैं। दरअसल पंद्रहवीं-सोलहवीं सदी में राजस्थानी, गुजराती और ब्रज अलग भाषाएं नहीं हैं और आगे उपनिवेशकाल तक ये एक ही भाषा की अलग-अलग बोलियाँ ही हैं। जार्ज ग्रिय्रर्सन के बाद इन भाषाओं की उत्पति और पहचान पर पहली बार विस्तार से विचार करने वाले पी.एल.तेस्सीतोरी के शब्दों में “प्राचीन पश्चिमी राजस्थानी शौरसेन अपभ्रंश की पहली संतान है और साथ ही उन आधुनिक बोलियों की माँ है, जिनको गुजराती तथा मारवाड़ी के नाम से जाना जाता है।” आगे वे कई प्राचीन रचनाओं के साक्ष्य से इस निष्कर्ष पहुँचे कि “जिस भाषा को मैं ‘प्राचीन पश्चिमी राजस्थानी’ के नाम से पुकारता हूँ, उसमे वे सभी तत्त्व हैं, जो गुजराती के साथ-मारवाड़ी के उद्भव के सूचक हैं और इस तरह वह भाषा स्पष्टतः इन दोनों की सम्मिलित माँ है।” मुनि जिनविजय ने भी गुजरात विद्यापीठ के अपने कार्यकाल में तैयार की गई पुरानी गुजराती गद्य संदर्भ नामक एक पाठ्य पुस्तक में तेरहवीं से पंद्रहवीं सदी तक के 300 वर्षों के दौरान के गद्य के नमूने संकलित किए। इनकी भाषा 'प्राचीन गुजराती' के आगे कोष्ठक में उन्होंने स्पष्ट नामोल्लेख किया 'अर्थात् पश्चिमी राजस्थानी'। गुजराती भाषा के मर्मज्ञ और विद्वान् स्वर्गीय झवेरचंद्र मेघाणी के विचार भी इस धारणा को पुष्ट करते हैं। उन्होंने इस संबंध में एक जगह लिखा है कि "मेड़ता की मीरां इसी में पदों की रचना करती और गाया करती थी। इन पदों को सौराष्ट्र की सीमा तक के मनुष्य गाते तथा अपना कर मानते थे। चारण का दूहा राजस्थान की किसी सीमा में से राजस्थानी भाषा में से अवतरित होता तथा कुछ वेश बदलकर काठियावाड़ में घर-घराऊ बन जाता। नरसी मेहता गिरनार की तलहटी में प्रभु पदों की रचना करता और ये पद यात्रियों के कंठों पर सवार होकर जोधपुर, उदयपुर पहुँच जाया करते। इस ज़माने का पर्दा उठाकर यदि आप आगे बढेंगे, तो आपको कच्छ, काठियावाड़ से लेकर प्रयागपर्यंत भूखंड पर फैली हुई एक भाषा दृष्टिगोचर होगी।'' आगे उन्होंने और स्पष्ट करते हुए लिखा है कि “उसी की पुत्रियाँ फिर ब्रजभाषा, गुजराती और आधुनिक राजस्थानी का नाम धारण कर स्वतंत्र भाषाएँ बनीं।" जार्ज ग्रियर्सन ने भी पन्द्रहवीं सदी में राजस्थानी और गुजराती के एक होने की बात कही है। उन्होंने स्पष्ट लिखा कि “गुजराती का राजस्थानी से बहुत निकट संबंध है। यहाँ तक कि पंद्रहवीं शताब्दी में मारवाड़ तथा गुजरात की भाषा एक थी। इसके बाद ही इसने इन दो भाषाओं का रूप धारण किया; किंतु मूलतः इन दोनों बोलियों में अत्यल्प ही अंतर है।” इसको उन्होंने एक उदाहरण देकर पाद टिप्पणी में और स्पष्ट क़िया। उन्होंने लिखा कि “सन् 1455-56 में मारवाड़ राज्य के जालोर स्थान के एक कवि ने ‘कान्हड़देव’ शीर्षक प्रबंध लिखा था। सन् 1912 में इसको लेकर गुजरात में एक वाद-विवाद चल पड़ा कि यह पुरानी गुजराती का प्रबंध है अथवा मारवाड़ी का। सच यह है कि यह दोनों में से किसी का नहीं है, अपितु कवि की उस मातृभाषा में है, जो बाद में इन भाषाओं के रूप में प्रकट हुई।” मीरां की कविता की भाषा के संबंध में भी यही सच है। यह राजस्थानी, गुजराती या ब्रज नहीं है, यह पंद्रहवीं सदी की उसकी वह मातृभाषा है, जिसकी पहचान अब क्षेत्रीय विशेषताओं के मुखर हो जाने के कारण अलग-अलग भाषाओं के रूप हो गई है। पद्मनाभ के कान्हड़देव प्रबंध की भाषा पुरानी पश्चिमी राजस्थानी है, इसलिए तेस्सीतोरी के अनुसार उसके समकालीन नरसिंह मेहता की भाषा भी यही रही होगी। उसकी कविता का आधुनिक गुजराती में रूपांतरण बहुत आगे चलकर हुआ। मीरां जो नरसिंह मेहता के साथ गुजराती की दूसरी बड़ी भक्त कवयित्री है और उसके कुछ समय बाद ही हुई है, की रचनाएँ भी इसी भाषा में हुईं। आगे चलकर ये अलग-अलग भाषायी पहचानों के बनने के साथ आधुनिक गुजराती या राजस्थानी में ढलती गईं। जहाँ तक मीरां की कविता के ब्रज में मिलने का सवाल है तो ब्रज और राजस्थानी भी मध्यकाल में अलग भाषाएँ नहीं थीं। राजस्थानी के प्राचीन साहित्यिक रूप पिंगल में ब्रज शामिल है। ब्रज दरअसल पुरानी राजस्थानी का ही क्षेत्रीय विस्तार है।

भाषायी पहचानें बाद में बनीं, यह इससे भी प्रमाणित है कि मीरां के पदों की भाषा एकरूप नहीं है। कोई पद संपूर्ण ब्रज में है, तो किसी पद में राजस्थानी और ब्रज एक साथ है और किसी पद में राजस्थानी के साथ कुछ शब्द या वाक्यांश गुजराती के भी आ गए हैं। मीरां के समय देश भाषाओं की पृथक् क्षेत्रीय पहचानें नहीं थीं, लेकिन धीरे-धीरे ये बनती गईं। मीरां के पद लोकप्रिय थे, इसलिए ये भी इनके अनुसार ब्रज, राजस्थानी और गुजराती होते गए। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि क्षेत्रीय भाषायी पहचानों के अनुसार ढल जाने के बाद भी इनमें उस समय की भाषा के साक्ष्य मौजूद हैं। उसके ब्रज भाषा के पदों में राजस्थानी और राजस्थानी में गुजराती भाषा के शब्द और अर्थ रूढ़ियाँ इसी कारण हैं।

मीरां का जन्म, लालन-पालन और विवाह राजस्थान में हुआ, इसलिए कुछ विद्वानों की धारणा है कि केवल राजस्थानी मीरां की भाषा है और इससे इतर भाषाओं की मीरां की रचनाएँ मीरां की रचनाएँ नहीं हैं। हीरालाल माहेश्वरी का मानना है कि “मीरां का अधिकांश जीवन राजस्थान में बीता। वह वहीं जन्मी और ब्याही गई। केवल जीवन के अंतिम दिन गुजरात में बीते। उसकी वृन्दावन यात्रा अथवा वहाँ निवास निराधार है। इस कारण शुद्ध गुजराती, शुद्ध पंजाबी और शुद्ध भोजपुरी भाषाओं में मिलने वाले पद अपने वर्तमान रूप में कदापि मीरां के नहीं हो सकते। शुद्ध ब्रजभाषा के पद भी संदेहास्पद ही हैं। अधिक से अधिक ऐसे पदों में मीरां की भावना भले ही सुरक्षित हो। मीरां की भाषा राजस्थानी थी।” कमोबेश यही बात नरोत्तम स्वामी ने भी कही है। उनके अनुसार “मीरांबाई की कविता की भाषा राजस्थानी है, जो पश्चिमी हिन्दी का एक प्रधान विभाग है।.....मीरांबाई की भाषा में ब्रजभाषा का मिश्रण बहुत है। गुजराती की विशेषताएँ भी अनेक स्थान पर पाई जाती है। पंजाबी, खड़ी बोली, पूरबी आदि का आभास भी कई स्थानों पर होता है। उनके अनेक पद शुद्ध गुजराती में भी पाए जाते हैं, पर इसमें संदेह है कि वे उनके बनाए हुए हैं।” इस तरह के आग्रह युक्तिसंगत नहीं हैं। दरअसल पंद्रहवी-सोलहवीं सदी में मीरां की कविता की भाषा का क्षेत्रीय आधार पर विभाजन नहीं हुआ था, लेकिन आगे चलकर ये पहचानें कुछ हद तक बनती गईं। मीरां की विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित कविता भी इन पहचानों में ढलकर गुजराती, ब्रज, राजस्थानी आदि होती गई। साफ़ है कि मीरां की ब्रज या गुजराती या राजस्थानी में मिलने वाली कविता मीरां की ही है। यह अलग बात है कि बाद में यह निरंतर चलन में रहने के कारण इन पहचानों में अलग भी दिखाई देने लगीं। मीरां की भाषा ब्रज मिश्रित राजस्थानी मानने वाले नरोत्तम स्वामी ने भी यह तो स्वीकार किया है कि मीरां के प्रचलित पदों की आधुनिक भाषा उसकी असल भाषा नहीं है। उन्होंने लिखा कि “मीरांबाई के पद जिस रूप में पाए जाते हैं ठीक उसी रूप में वे लिखे गए होंगे, यह कहना कठिन है। जो पद छपे हैं उनमें अधिकांश की भाषा आधुनिक हो गई है। पद गाने की चीज हैं और गानेवालों द्वारा गाते समय फेरफार हो जाना बहुत संभव है। गाने वाले जनता को समझाने के लिए भी भाषा को आधुनिक कर देते हैं।”

मीरां की रचनाओं के मूल पाठ के निर्धारण को उसकी भाषा से जोड़ कर देखना भी गलत है। उसकी रचनाओं में दिखनेवाला भाषायी वैविध्य हमें भाषायी वर्गीकरण और विभाजन की औपनिवेशिक समझ और संस्कार के कारण दिखाई पड़ता है। उपनिवेशकाल से पहले तक जब भाषायी पहचानों को औपचारिक मान्यता नहीं मिली थी, तो भाषाएँ एक-दूसरे से इस तरह संबद्ध थीं कि उनको पृथक् और वर्गीकृत करना और अपनी अस्मिता के साथ जोड़ कर देखना संभव नहीं था। पंद्रहवीं-सोलहवीं सदी में जब मीरां की कविता हुई, तो आज के महाराष्ट्र और गुजरात सहित तमाम उत्तर भारत में क्षेत्रीय वैशिष्ट्य के साथ कमोबेश एक ही भाषा प्रयुक्त हो रही थी। मीरां की कविता इसी भाषा में हुई। यह अलग बात है कि बाद में क्षेत्रीय विशेषताओं के मुखर और प्रमुख हो जाने से यह उनके अनुसार राजस्थानी, गुजराती, ब्रज आदि में ढल गई।


संप्रति: अध्येता, भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, राष्ट्रपति निवास, शिमला-171 005 मोबाइल +91 94143 2530, 2 E-mail: madhavhada@gmail.com




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