भक्ति के दिक्-काल और सरहदीकरण से आगे
- यवनिका तिवारी
- May 26
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यवनिका तिवारी । तद्भव- 52
वैदहि ओखद जाणै, पद्विनी : इतिहास और कथा-काव्य की जुगलबंदी और अब सद्य: प्रकाशित भक्ति अगाथ अनंत समेत अन्य बहुत-से मोरचों पर आलोचक माधव हाड़ा औपनिवेशिक ज्ञानकाण्ड को चुनौती देते दीखते हैं। भक्ति-साहित्य या भक्ति प्रधान चेतना भारतीय साहित्य के इतिहास की एक मुसलसल प्रकिया है पर पश्चिमी विद्वत्ता के दृष्टिदोष ने भक्ति-चेतना को यादृच्छिकता की हद तक कालबद्ध किया है और इस प्रकार भक्ति-साहित्य की देशजता, परम्पराजीविता, स्मृतिजीविता आदि बहुत-से ठेठ गुणों को झुठलाया, उनकी मौलिकता को प्रश्नाहत किया तथा चौतरफा ज्ञान-मीमांसीय हिंसा (एपिस्टेमिक वायलेंस) को अंजाम दिया। भक्ति अगाध अनंत एक मुहिम का भी नाम है जो सन्धानी और प्राश्निक दृष्टि से पश्चिमी विद्वत्ता के यादृच्छिकतावादी विश्लेषण को खारिज करता है। पश्चिमी आलोचकों या अनुसंधानकर्ताओं ने भारतीय साहित्य को ‘विदेशप्रेमी’, ‘दंडाधिकारी’ और ‘संग्रहाध्यक्षीय’ जिन दृष्टिकोणों से मूल्यांकित किया तथा जगह-जगह इन रचनाओं पर पाश्चात्य प्रेरणा आरोपित किया या इन्हें ईसाइयत की देन घोषित किया, उनका पुरजोर खण्डन आलोचक ने उक्त पुस्तक में किया है। मध्यकालीन साहित्य की परिभाषा, बोध और स्वयं यह विशेषण—मध्यकालीन—दुविधाग्रस्त हैं क्योंकि इनका निर्धारण-मूल्यांकन भारत की बौद्धिक अक्षमतओं (!) को उभारने की मंशा से किया गया था। वृहत्तर मध्यकालीन साहित्य भयानक रूप से औपनिवेशिक अन्यीकरण का शिकार हुआ जिसके तहत उक्त साहित्य को अतीन्द्रियत्व सम्पन्न, ऊर्ध्व-अर्धों के अन्वेषी तथा विचित्र रूप से एक्जोटिक करार दिया गया। ‘मध्यकाल’ या ‘मध्यकालीन’ संज्ञक शब्द अधिसंख्य संदर्भों में केवल अप्रगतिशीलता, वैचारिक स्थिरता, जकड़न और सकर्मकता के बजाय मर्त्य-अमर्त्य की गुत्थियों में उलझे होने के पर्याय रहे हैं। पश्चिमी विद्वत्ता और उसकी लीक पर चलने वाली स्वदेशी आलोचना ने पौर्वात्य प्रज्ञा के मर्म को बिना समझे ही भक्ति साहित्य का उत्तरकथ्य लिख डाला और सरलीकृत करते-करते लम्बे समय के लिए असन्धेय बना डाला। यही कारण है कि सरहपा, कबीर, मीरा आदि का निंदक मूल्यांकन ही अधिक हुआ और वह भी उनके साहित्यिक-सामाजिक संदर्भों से काटकर। इसके बावजूद ऐसे बहुत-से आलोचक हैं जिन्होंने भक्ति-साहित्य पर इस भ्रामक-मनगढ़न्त थोपन को नकारा है तथा उत्तर-औपनिवेशिक आलोचना दृष्टि से पूर्वसिद्ध मतों का खण्डन किया है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ‘मध्ययुग’ शब्द की व्याख्या बहुत हद तक इसी दृष्टि से की है—‘मध्ययुग’ शब्द का प्रयोग काल के अर्थ में उतना नहीं होता, जितना एक खास प्रकार की ‘पतनोन्मुख और जबदी हुई मनोवृत्ति’ के अर्थ में होता है। ऐसा माना जाता है कि मध्ययुग का मनुष्य धीरे-धीरे विशाल और असीम ज्ञान के प्रति जिज्ञासा का भाव छोड़ता जाता है तथा धार्मिक आचारों और स्वत: प्रमाण माने जाने वाले आप्त वाक्यों का अनुयायी होता जाता है।... ‘मिडिएवल’ (मध्ययुगीन) शब्द का अनादर-भाव कुंठित-मनोवृत्ति-परक अर्थ में होता है।” (द्विवेदी, 2025, पृ॰-18) भारतीय भक्ति साहित्य को ‘मध्यकाल’ कहना पश्चिमी मनीषा की घोर औपनिवेशिक श्रेष्ठता-ग्रन्थि का ही प्रमाण है, जिसकी काट आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने इस प्रकार की है— मध्यकालीन और आधुनिक केवल समयसूचक शब्द नहीं, मूल्यसूचक ‘टर्म्स’ भी हैं। आधुनिकता के बाद ही समाज प्रबोधन की दिशा में बढ़ता है। ‘आधुनिक’ की मूल्यपरक व्यंजना के ही कारण, ऐतिहासिक समकालीनता के बावजूद कबीर मध्यकालीन और लूथर आरम्भिक आधुनिक कहलाते हैं।... मान्यता यह है कि यूरोप तो मध्यकाल की ‘जकड़’ से चौदहवीं सदी में ही निकल चला था, जबकि भारत समेत बाकी सारी दुनिया इतिहास की चौदहवीं सदी में तो थी, लेकिन यूरोप की तरह आरम्भिक आधुनिक काल में प्रवृष्टि हो जाने की बजाय मध्यकाल में ही ठहरी हुई। (अग्रवाल, 2022, पृ॰-67) अतः पश्चिमी विद्वत्ता ने भारतीय साहित्य के मूल्यांकन में जितनी उसकी साहित्यिक सक्षमता नहीं उभारी, उससे अधिक साहित्य विशेष के जरिए नस्लवादी त्रुटियों (!) को ही रेखांकित किया है। आलोचना के समकालीन औजार भारतीय भक्ति-साहित्य में पैबस्त समस्त देशजता, ठेठपन, भाषाई विविधता और विचारों की मौलिकता-आधुनिकता को बिना किसी पूर्वग्रह के रिक्लेम करना चाहते हैं और कर रहे हैं। आलोचक माधव हाड़ा की आलोचना दृष्टि भी यही कर रही है।भक्ति अगाध अनंत भक्ति चेतना के लुप्त, छुपाए गए या गढ़े गए पक्षों के विरुद्ध उन्हीं सदर्थों को रिक्लेम करती दीखती है। प्राक्कथन में आलोचक ने लिखा है कि—भारतीय भक्ति-चेतना की पहचान, व्याप्ति और वर्गीकरण का यह पुनरावलोकन कुछ लोगों को पुनरुत्थान लग सकता है। यह पुनरुत्थान से प्रयासपूर्वक बचने की कोशिश है, लेकिन इससे पुनरावलोकन की जरूरत खत्म नहीं हो जाती। औपनिवेशिक ज्ञानमीमांसा और नयी पश्चिमी विद्वत्ता की कुछ आधारहीन धारणाओं के प्रतिपक्ष में खड़े हुए बिना भारतीय भक्ति-चेतना की कोई पहचान नहीं बन सकती। (हाड़ा, 2025, पृ॰-67) स्वदेशी साहित्य और इतिहास का पुनरावलोकन, पुनर्प्रत्ययन या निष्पक्षता के साथ उसको रिविजिट् करना महज़ संकीर्ण पुनरुत्थानवाद नहीं है। आलोचना की यह उत्तर-औपनिवेशिक पद्धति वास्तव में श्रेष्ठता-ग्रन्थि-स्यूत पूर्वग्रहों की कुम्भकर्णी शीतनिद्रा को भंग करने का उपक्रम है। इस पुस्तक का विशेष महत्व इसलिए भी है कि यह भक्ति साहित्य को पश्चिमी आंदोलनों की तुलना में महज़ किसी क्रान्ति, जागरण आदि में सीमित या कमतर करने के भ्रष्ट प्रयासों के विरुद्ध बहुत से तर्क करती है। आलोचक प्राक्वैदिक काल से ही भक्ति की जिस मुसलसल धारा को समूल प्रतिष्ठ करते हैं, उसमें उसे किसी घटना की प्रतिक्रिया कहना उसकी निर्विघ्नता में विघ्न डालना ही है। विजातीय और कुछ स्वजातीय आलोचकों ने भक्ति चेतना को दिक्-काल विशेष में बद्ध पाश्चात्य मानकों की तर्ज पर क्रान्ति में परिणत करना चाहा, जबकि यह पर्याय रूप में क्रान्ति थी ही नहीं। यह और बात है कि हर चेतना और हर रचना में किंचित क्रान्तिकारिता, सुधार के स्वप्न होते ही हैं, पर भक्ति चेतना किसी घटना, परिघटना या दुर्घटना की प्रतिक्रिया भर नहीं थी। आलोचक माधव हाड़ा इसे पाश्चात्य मॉडल की क्रान्ति, आंदोलन, पुनर्जागरण, लोकजागरण, सुधार आदि में रिड्यूस करने के पक्ष में नहीं हैं तथा आचार्य शुक्ल और रामविलास शर्मा के क्रमशः ‘पूर्वमध्यकाल’ और ‘लोकजागरण’ के अवधारणीय सत्यों का सतर्क खण्डन करते हैं। भारतीय भक्ति चेतना की एक पूरक परिभाषा (माधव हाड़ा की दृष्टि में) दो बयानों से उद्धरित की जा सकती है— (क) भक्ति-चेतना का प्रसार भारत में किसी आकस्मित घटना-परिघटना की तरह नहीं हुआ।... जाहिर है, जिसे हम आंदोलन या क्रांति कहते हैं, उसकी व्याप्ति इतनी निरंतर, व्यापक और दीर्घकालीन नहीं होता। (वही, पृ॰-18) (ख) विद्रोह, सुधार, पुनरुथान, जागरण आदि भक्ति की ही आनुषंगिक चेतनाएँ हैं। (वही, पृ॰-19) अतः भक्ति-साहित्य संबंधी यह भ्रान्ति दूर होनी चाहिए कि यह उस प्रचलित अर्थ में क्रान्ति तो नहीं है पर इसमें क्रान्तधर्मिता का अभाव भी नहीं है और सुधार, पुनरुत्थान तथा जागरण का आग्रह भी है। शास्त्र में भक्ति को इसीलिए ‘अहेतुक’ कहा गया है— कहते हुए आलोचक भक्ति को लक्ष्य स्वरूप मानते हैं पर इससे भक्ति चेतना में व्याप्त क्रान्तधर्मिता, सुधार आदि की प्रबल उत्कण्ठा को किसी भी प्रकार हेतुज्ञानशून्य नहीं कहा जा सकता। आलोचक ने उन हेतुओं पर पार्थिव चिंताएँ और सरोकार खण्ड में पर्याप्त चर्चा की है, जिससे भक्ति-चेतना महज़ परम्परा-निर्वाह या अहेतुकता का रूमानी परिणाम नहीं रह जाती। अतः इस दीर्घकाल में भक्ति की अखण्डता केवल आध्यात्मिक निकाय भर नहीं है, वहाँ सोपानवत् गढ़े समाज की निंदा है, कवियों की प्रत्यक्ष-परोक्ष ख़ुदबयानी है, अध्यास का नाश है, सामासिकता का आग्रह है, कवियों की विकराल प्रश्नवाचक मुद्राएँ हैं और ऐसे असंख्य हेतु हैं जो समाज को कायाकल्पकारी बनाने को उद्यत हैं। भक्ति चेतना केवल मानव के सोपानीकृत स्तरों का विरोध नहीं करती बल्कि बहुत बार जब ईश्वर अपना ईश्वरत्व खो कर सामान्य मानव, मित्र-सखा, पुत्र-स्वरूप आदि होते है तो लम्बवत् समरूपता की ही कामना उसमें निहित होती है। ईश्वर की स्वच्छंद गढ़न के पीछे निस्संदेह यही तथ्य सत्य है कि भक्ति इन कवियों को अनुशासित नहीं करती थी बल्कि कवियों ने असंख्य पार्थिव हेतुओं के तहत इसे स्वच्छंद आकार दिया। आलोचक लिखते हैं—भक्तिसाहित्य के कुछ रूपों में ईश्वर अतिमानवीय अस्तित्व होने के बजाय सखा या मित्र के रूप में मनुष्य है। यह संत-भक्तों या मनुष्य की इच्छा और जरूरत के अनुसार गढ़ा हुआ ईश्वर है। सही मायने में तो लोक में प्रचलित ईश्वर का रूप लोक की कामनाओं और जरूरतों का ही रूपांतर है। (वही, पृ॰-48) आलोचक भक्ति साहित्य में मौजूद लीलाधारी ईश्वर का मानवत्व, देहवाद और ऐंद्रिकता आदि के जरिए भी इसकी इहलौकिकता को ही पुष्ट करते हैं। तिस पर संत-भक्तों का वर्गहीन समाज का सपना, जिसमें समता, स्वतंत्रता और न्याय की प्रबल इच्छा हो, उसे किसी भी प्रकार लोकोत्तर की चिंता करने वाली कविता नहीं कहा जा सकता।
भक्ति अगाध अनंत में भक्ति के भौगोलिक सरहदीकरण तथा दिक्-काल में उसकी सीमाबद्धता को गढ़ने वाले अभ्यस्त मानकों को ध्वस्त किया गया है। आलोचक यह मनवाने में सफल हुए हैं कि भक्ति चेतना के निर्माण में केवल उत्तर का ही नहीं, सुदूर उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम आदि कोणों के भी बराबर योगदान हैं। भक्ति-साहित्य की पढ़त में हुई भूलों को उजागर करते हुए, आलोचक भक्ति की बहुवचनीयता और बहुपक्षीयता को प्रमाणित करते हैं—खासतौर पर उत्तरभारत का हिन्दी समाज जिस भक्ति-चेतना को जानता-समझता है, उसमें दक्षिण, उत्तर पूर्व और कश्मीर की भक्ति-चेतना और उसके साहित्य की कोई स्मृति नहीं के बराबर है। भक्ति के इन क्षेत्रीय रूपों में गहरी पारस्परिकता, निरंतर आदान-प्रदान और अंतःक्रियाएँ हैं, लेकिन अभी तक इनको निगाह में नहीं लिया गया है। (वही, पृ॰-13) इस संचयन की एक भारी विशेषता यह है कि आलोचक अप्पर (छठी सदी) से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी के कवि निराला तक भक्ति की अगाधता और अनंतता को ट्रेस करते हैं। इस दृष्टि से संचयन का शीर्षक स्वप्रतिष्ठ हो जाता है। आलोचक पश्चिमी विद्वत्ता द्वारा निर्धारित भक्ति-चेतना को कालबद्ध करने की प्रक्रिया को इसीलिए दुविधाग्रस्त मानते हैं क्योंकि भारतीय साहित्य में भक्ति की मौजूदगी निरंतर रही है। यह वाजिब तर्क भी दिया गया है कि कोई भी साहित्यिक काल अनेक प्रवृत्तियों के सह-अस्तित्व से निर्मित होता है, अतः ‘भक्तिकाल’ यानी कोई ऐसा काल नहीं जो केवल भक्ति से ही पूरमपूर हो या ‘रीतिकाल’ यानी जिसमें सहसा भक्ति-चेतना का लोप हो गया हो या ‘आधुनिककाल’ यानी जिसमें सहसा भक्ति कोई पुरातनतर प्रवृत्ति बन गयी हो। प्राच्यवादी दृष्टिकोण के ही कारण भक्तिकाल के वर्गीकरण, विभाजन, कवियों तथा उनकी कविताओं की विषयवस्तु भ्रांत, भ्रामक और बहुत हद तक डेरोगेटरी सिद्ध की गई हैं। आलोचक ने मीरां के सम्बन्ध में इस भ्रामक मूल्यांकन, जो इसी प्राच्यवाद की उपज है, का बेजोर खण्डन किया है। भक्ति अगाध अनंत में भी वर्गीकरण और विभाजन तथा पूर्वग्रह जैसे उपशीर्षकों के तहत उसी प्राच्यवादी मूल्यांकन-पद्धति का खण्डन किया गया है। जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन, जेम्स टॉड, हरमन गोएत्ज आदि पश्चिमी आलोचकों की मूल्यांकन-विधियों में अस्पष्टता, दुविधाग्रस्तता और पूर्वग्रहग्रस्तता का भी क्रियात्मक शोधन किया गया है। आलोचक ने पुस्तक विशेष में भक्ति-सम्बंधी कई और मिथों को विश्लेषित कर तर्कपूर्ण निष्कर्षों को अंजाम दिया है। भक्ति संबंधी एक सामान्य मिथ है, जिसे उसकी निर्णायक परिभाषा मान ली गई थी—भक्ति द्राविड़ ऊपजी, लाए रामानन्द। / परगट कियो कबीर रे, सात द्वीप नौ खंड।।—यह कई मानियों में भक्ति के उत्स, प्रसार, प्रकृति आदि के सम्बंध में भ्रामक सिद्ध होता है। बहुत-से तथ्यों के आधार पर उन्होंने प्रतिष्ठित किया है कि उत्तर भारत में भक्ति के प्रसार में रामानंद का बहुत महत्वपूर्ण योगदान है, लेकिन उनके दर्शन और उनकी भक्ति-चेतरा धर्म और भक्ति की एकाधिक परंपराओं की अंतः क्रियाओं से बनी हुई हैं। रामानंद का संबंध दक्षिण भारत की रामानुजीय परंपरा से जोड़ा जाता है, लेकिन यह बहुत अस्पष्ट प्रकार का संबंध है। (वही, पृ॰-39) आलोचक माधव हाड़ा ने ग्रियर्सन आदि के विचित्र निष्कर्षों और भक्ति संबंधी व्याप्त व्यापक अप्रमा के विरुद्ध अनेक तथ्य प्रस्तुत किए हैं। भक्ति साहित्य की समझ और स्तरों पर भी विपर्यस्त है, जिनमें मुख्य रूप से देशज पद्धति की अनदेखी से हुआ गलत मूल्यांकन है, देशभाषाओं की व्यापक विविधता की अज्ञानता है और चीजों की प्रामाणिकता को प्रमाणित करने के लिए हिस्ट्री की कसौटी पर परखना है। आलोचक के मत में मूल्यांकन का संकट देशज-सांस्कृतिक पारिस्थितिकी की घोर अवहेलना से पैदा हुआ है। उस काल विशेष की देशज रचनाएँ इतिहास, जीवनियाँ आदि होने से चूक जाती हैं तो इसलिए कि वहाँ सटीक तिथियाँ नहीं हैं, लेखक का परिचय गोपन, रहस्यमयी या अतिमानवीय है तथा और भी कुछ अद्भुत पौर्वात्य गुणों की उपस्थिति के कारण इनकी विधायी पहचान संकटग्रस्त हुई है। रचनाओं की भाषा के रूप-गुण-प्रकृति-तेवर आदि के निर्धारण में भी पश्चिमी विद्वत्ता ने जिस जल्दबाज़ी, पूर्वग्रहग्रस्तता और सतहीपन के दर्शन कराए हैं, उससे देशभाषाओं की वास्तविक क्षमता और स्वरूप का आकलन संकुचित रह गया है। आलोचक की दृष्टि में मूल्यांकन के औपनिवेशिक औजारों से सबसे अधिक प्रभावित संत-भक्तों की भाषा रही है—संत-भक्तों ने अपनी भाषा की कोई पहचान नहीं बताई, इसको लेकर वे सचेत भी रहे थे और उन्होंने अपनी भाषा को कोई नाम भी नहीं दिया, लेकिन औपनिवेशिक भाषायी वर्गीकरण और विभाजन से प्रभावित विद्वत्ता ने इसकी शुरुआत की। उसने... संत-भक्तों की भाषा को औपनिवेशिक भाषायी पहचानों— पंजाबी, राजस्थानी, ब्रज, गुजराती, औड़िया, बाँग्ला, असमी आदि में सीमित कर दिया। उसने इस भाषाओं की सीमाएँ तय कीं और जब ये इन सीमाओं में नहीं आईं, तो उसने इनको मिश्रित-सधुक्कड़ी, पंचमेल खिचड़ी जैसे नाम दिए। (वही, पृ॰-58-59) औपनिवेशिक मानसिकता एकवचनीयता और एकलध्रुवीयता को एकल सत्य मानती है। यही कारण है कि भाषाओं की पारस्परिकता, अंतर्क्रियाएँ और उनकी उभयमुखता को मूल्यांकन की धुरी नहीं बनाया गया और उनकी प्रामाणिकता को संदेहास्पद बनाया गया। समवेत रूप से भक्ति-साहित्य और विशेष रूप से मीरां के मूल्यांकन की परिणति पर बात करते हुए आलोचक ने पाश्चात्य समालोचना विधि के कठोर और सिनिकल मानकों के दोषों को उभारा है, जिससे यह ज्ञात होता है कि इन मानकों ने श्रुत और स्मृत परम्पराओं को खारिज किया और सदैव दस्तावेज़ी साहित्य के अन्वेषी रहे, फलस्वरूप कवियों के अस्तित्व और उनके लेखन की मौलिकता को संदेह के घेरे में रख प्रामाणिकता का वितंडा मचाया। मीरां के बहाने उन्होंने समूचे भक्ति-साहित्य को औपनिवेशिक मूल्यांकन-विधि का शिकार होते दिखाया है। इन निंदक समीक्षा-विधियों के समानान्तर आलोचक माधव हाड़ा एक पैनी अथच स्वदेशी मूल्यांकन परम्परा विकसित करते हैं तथा उत्तर-औपनिवेशिक आलोचना के मानकों को ऊँचा करते हैं।
प्राच्यवाद या वृहत्तर औपनिवेशिक ज्ञानकांड ने बहुतेरे प्रयासों से भारतीय भक्ति-साहित्य को 'कल्चरल लैग' से पीड़ित चेतना के रूप में प्रस्तावित किया और इसी कारण उस पर 'मध्यकालीन' का तमग़ा लगाया गया। आलोचक का यह संचयन अपने वृहदत्व, देशव्यापी भक्ति-तत्व की विविधता और देशज आधुनिकता के प्रमाणों से इस शब्द ('मध्यकाल' या इस मूल से बनी सारी निर्मितियाँ) में छिपे भ्रष्ट अनुतान को ध्वस्त करता है। संचयन की अपनी कुछ विशेषताएँ हैं जो इसे तत्काल पठनीय बनाती हैं। उनमें से अव्वल तो यही कि इसमें औपनिवेशिक ज्ञानकाण्ड की काट मौजूद है पर उससे भी महत्वपूर्ण है कि यह संचयन राष्ट्रीय स्तर पर भक्ति साहित्य में उत्तर-भारत की आधिपत्यशाली स्थिति को भंग करता है। लम्बे अर्से से भक्त-कवियों का एक बड़ा तबका कुछ लोकप्रिय नामों के नेपथ्य में चला गया था। भाषायी पूर्वग्रहों के कारण भी भक्ति की बहुत-सी राष्ट्रव्यापी परम्पराएँ-प्रवणताएँ नेपथ्यलोपी हो गयी थीं और उत्तरोत्तर भक्ति की अवधारणा संकीर्ण परिभाषाओं में बँधी-बिंधी थी। अप्पर, संबंदर, परकाल, आंडाल, माणिक्कवाचकर, शठकोप, बसवण्णा समेत अन्य दक्षिण के भक्त-कविओं, ललद्यद के बहाने कश्मीरी भक्ति-चेतना, शंकरदेव के माध्यम से असमिया या वृहत्तर पूर्वोत्तर का भक्ति-बोध, बलराम दास प्रणीत ओड़िया भक्ति-प्रधान भावनाओं, चैतन्य महाप्रभु, लालन फ़कीर, रवीन्द्रनाथ ठाकुर आदि की बंगीय भक्ति-भावना तथा अन्य प्रान्तों के कवियों को इस संचयन में शुमार करके सम्पादक ने पाठकों के लिए भक्ति का विशाल क्षेत्र खोल दिया है। संचयन के निर्माण में बहुत-सी वैज्ञानिक विधियों का ध्यान रखा गया है; कवियों को अकारादि क्रम में न बाँट कर उन्हें कालक्रमानुसार रखा गया है जो भक्ति-साहित्य के अनुशीलन में अधिक कारगर है। हिंदीतर भाषाओं का कुशल भावरूपांतर या रूपांतर, संकलन के लिए एकाधिक स्रोतों का उपयोग, कवियों की प्रातिनिधिक वाणियों और कविताओं का चयन आदि इस संकलन को अत्यंत संग्रहणीय बनाते हैं। पर यदि इस विशालकाय और अपनी तरह के इकलौते संचयन में कुछ कवि या कवियों की कुछ विशिष्ट कविताएँ, वाणियाँ आदि संकलित होने से रह गई हैं तो इसे इसकी सीमा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। संकलनकर्ता ने प्राक्कथन में ही इसके प्रति सचेत किया है। सात सौ पैंतीस पृष्ठों का यह भारतीय भक्ति कविता संचयन भक्ति के जटिल-गुन्थिल प्रच्यवादी-औपनिवेशिक संज्ञाकरण के विरुद्ध भारत की विशाल-चौतरफा भक्ति-परंपरा का समावेशन करता है तथा कवियों के अनुभव-सत्यों को स्थान देता है। "भारतीय भक्ति-चेतना की पहचान, व्याप्ति और वर्गीकरण का यह पुनरावलोकन कुछ लोगों को पुनरुत्थान लग सकता है"—संकलनकर्ता का यह कथन (जिसे ऊपर भी उद्धरित किया गया है) या उनकी शंका तत्वतः गलत ही है क्योंकि यह संचयन भक्ति की अगाधता और अनंतता में भी धर्मग्रान्थिकता की संकीर्णता को नहीं छूता। भक्ति अगाध अनंत पुनरुत्थानशील तत्त्वों को नहीं सहेजता बल्कि भक्ति के नानात्व को सुधार, विद्रोह, और जागरण की तीव्र आकांक्षाओं के साथ प्रस्तुत करता है।
संदर्भ–
1. द्विवेदी, आचार्य हजारीप्रसाद. (2025). मध्यकालीन बोध का स्वरूप. दिल्ली : राजकमल प्रकाशन.
2. अग्रवाल, पुरुषोत्तम. (2022). अकथ कहानी प्रेम की. दिल्ली : राजकमल प्रकाशन.
3. हाड़ा, माधव. (2025). भक्ति अगाध अनंत : भारतीय भक्ति कविता संचयन. दिल्ली : राजपाल एण्ड सन्ज़.
समीक्षित पुस्तक-
भक्ति अगाध अनंत : भारतीय भक्ति कविता संचयन, सम्पादक- माधव हाड़ा, राजपाल एण्ड सन्ज़, दिल्ली, 2025, पृष्ठ : 735, मूल्य : ₹1599
संपर्क : यवनिका तिवारी, असिस्टेंट प्रोफेसर, कालियागंज कॉलेज, कालियागंज-७३३१२९, उत्तर दिनाजपुर, पश्चिम बंगाल
मो॰-8158965642, ईमेल-tiwary.yavanika@gmail.com




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