top of page
  • Writer's pictureMadhav Hada

कोई निंदौ, कोई बिंदौ



समय पत्रिका। फरवरी। 2021

मीरां के जीवन और समाज पर एकाग्र पुस्तक पचरंग चोला पहर सखी री 2015 में आयी और अब 2020 में इसका प्रदीप त्रिखा द्वारा अनूदित अंग्रेजी संस्करण मीरां वर्सेस मीरां प्रकाशित हुआ है। गत पाँच वर्षों के दौरान इसके हिंदी संस्करण की तद्भव, बनास जन, जनकीपुल, इंडिया टुडे, शुक्रवार, पूर्वग्रह, पुस्तक वार्ता, साखी, विपाशा, जनसत्ता, हंस, समकालीन भारतीय साहित्य वागर्तह, नया ज्ञानोदय आदि पत्र-पत्रिकाओं में समीक्षाएँ प्रकाशित हुईं, इस पर एकाधिक कार्यक्रम हुए और इनमें इस पर सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों प्रकार की प्रतिक्रियाएँ हुईं। यह टीप पचरंग चोला पर कोई सफ़ाई या उसका समर्थन नहीं है। यहाँ उन संकल्पों और विश्वासों का केवल ख़ुलासा है, जो मीरां को जानने-समझने की यात्रा के दौरान हमेशा मन में रहे हैं। मीरां की कविता की एक पंक्ति है- कोई निंदौ कोई बिंदौ, मैं तो चलूंगी चाल अपूठी। मतलब यह कि कोई निंदा करे या सराहना, मैं ‘अपूठी’ चलूंगी। ‘अपूठी’ का मतलब है उल्टा या विमुख। अपने इस निश्चय के कारण मीरां का जीवन और कविता रूढ़ि से अलग और रूपक से बाहर है। पचरंग चोला में मीरां के इस अलग और ख़ास रूप की पहचान का प्रयास है। कुछ भी होने से पहले मीरां एक मनुष्य अस्तित्व है, उसकी जीवन यात्रा एक मनुष्य की जीवन यात्रा है, इसलिए यहाँ कोशिश उसके मनुष्य अनुभव और संघर्ष के संकेतों की इतिहास, आख्यान, लोक, कविता आदि में पहचान और उनकी एक-दूसरे से पुष्टि और विस्तार की है। यह दावा नहीं है कि यह अंतिम और पूर्ण कोशिश है। यह गुंजाइश है और आगे भी रहेगी कि इन संकेतों का कोई नया संदर्भ सामने आए।

पचरंग चोला में हिंदी आलोचना की परंपरा है। कोई भी प्रस्थान परंपरा के योग के बिना संभव नही है। परंपरा के संबंध में ख़ास बात यह है कि यह होकर भी दिखती नहीं है। परंपरा की जगह कभी-कभी खूँटे ले लेते हैं, जो दिखते ख़ूब हैं। परंपरा अपने खाद-पानी से आपको प्रस्थान में प्रवृत्त करती है, आपको मुक्त करती है, लेकिन

खूँटे आपको बाँधते हैं। दुर्भाग्य से हिन्दी में परंपराएँ कम, खूँटे ज़्यादा हैं। हिन्दी में मीरां को लेकर सोचने-समझने की परंपरा तो है, लेकिन सौभाग्य से कोई खूँटा अभी तक नहीं बना है। हिन्दी आलोचना का ध्यान ही मीरां की तरफ़ बहुत कम गया। जो थोड़ा बहुत ध्यान गया, वो मीरां से संबंधित प्रचारित आरंभिक जानकारियों तक सीमित रहा। मुंशी देवीप्रसाद ने और कई कवियों के साथ मीरां से संबंधित आरंभिक जानकारियाँ मिश्रबंधुओं को उपलब्ध को करवाईं। मिश्रबंधु विनोद से लेकर इनका उपयोग रामचंद्र शुक्ल ने किया। रामचंद्र शुक्ल के कंधों पर हिंदी साहित्य को एक अकादमिक अनुशासन में ढालने का महत्त्वपूर्ण दायित्व भी था, इसलिए उनकी चिंताएँ और सरोकार दूसरे थे। वे मनीषी थे- सूर, तुलसी, जायसी पर उन्होंने विस्तार और मनोयोग से विचार किया, लेकिन फुटकर की श्रेणी में वाले रचनाकारों की नयी पहचान और समझ बनाने के बजाय उनका ज़ोर उनको किसी वर्गीकरण और विभाजन ‘फ़िट’ में रखने पर ज़्यादा रहा। उन्होंने मुंशी देवीप्रसाद की जानकारियों को पुनः प्रस्तुत करते हुए मीरां की भक्ति-उपासना को अपनी तरफ़ से माधुर्य भाव के खाँचे में रख दिया। हिन्दी की अकादमिक आलोचना में मीरां की यह पहचान रूढ़ि बन गई।

पचरंग चोला में रूढ़ि और रूपक से परहेज़ किया गया है। यह विडंबना ही है कि हिंदी आलोचना में रूपकों पर निर्भरता का रिवाज़ कुछ ज़्यादा ही है। इसमें पहले विचार के रूपकों का बोलबाला रहा और अब विमर्श के नए रूपकों का बाज़ार गर्म है। रूपक निर्मिति या संरचना है-उसमें ज़ोर व्यवस्था और एकरूपता पर होता है। अलग, आगे, हटकर और अतिरिक्त के लिए उसमें जगह मुश्किल से ही निकलती है। इस सबकी इसमें या तो अनदेखी होती है या काट-छाँट। मनुष्य का रूपकीकरण संभव नहीं है, क्योंकि इधर-उधर, आगे-पीछे, अलग और अतिरिक्त, ये सब मनुष्यता के बुनियादी गुणधर्म हैं। रूपक में ढालने के दौरान किसी मनुष्य अस्तित्व में जैसे ही हमें इधर, उधर और अतिरिक्त कुछ दिखता है, तो लगता है यह अंतर्विरोध या यह विसंगति है। यदि कोई मनुष्य है, तो यह सब होना उसके मनुष्य होने में शामिल है। रूपकों की आदत और संस्कार वाले लोगों को पचरंग चोला की मीरां अच्छी नहीं लगी। यह रूपक की सीमित मीरां से अलग इधर, उधर, अलग और अतिरिक्त मनुष्य मीरां थी। यह अलग-अलग रूपकों में ढली हुई सीमित और कटी-छँटी केवल भक्त या केवल विद्रोही या केवल प्रेमी या केवल पवित्रात्मा या केवल सामंत मीरां नहीं थी। यह एक साथ सामंत, विद्रोही, भक्त, प्रेमी, पवित्रात्मा, कवियित्री आदि सब थीं। उसमें एक मनुष्य अस्तित्व में जो होता है, कमोबेश सभी कुछ था।

मीरां का यह मनुष्य रूप रूढ़ि और रूपक में सोचने-समझने के संस्कारी और अभ्यासी लोगों को को अच्छा नहीं लगा। कुछ लोग उसे विद्रोह की रूढ़ि में ही देखना चाहते थे, जबकि कुछ अन्य की अपेक्षा थी कि वह पितृसत्तात्मक अन्याय और उत्पीडन के रूपक में होती। वैसे भी विद्रोह विभक्त मनोदशा वाले भारतीय मध्य वर्ग की काम्य छवि है। अपने निजी जीवन से बाहर विद्रोह के रूपक और छवियाँ गढ़ना-ढूंढ़ना उसका प्रिय शग़ल है। मीरां ने विद्रोह नहीं किया, ऐसा नहीं है। मीरां ने विद्रोह किया, लेकिन यह एक सामान्य पारिस्थितिक विद्रोह था। इसको किसी साँचे-खाँचे के विद्रोह की तरह देखना-समझना ग़लत होगा। यह विद्रोह की निर्धारित सैद्धांतिकी का सत्ता के विरूद्ध स्थायी प्रतिरोध जैसा विद्रोह नहीं है। इसे वैसा बनाने के लिए काट-छाँट और जोड़-बाकी करनी पड़ेगी, जो उसके असल विद्रोह को ही बदल देगी। विमर्श की सैद्धांतिकी के अनुसार स्त्री के दुःख का कारण पितृसत्तात्मक अन्याय और उत्पीड़न है। मीरां इसके सिद्धांताकारों को इसी रूपक में जँचती है। मीरां उनके अनुसार पितृसत्तात्मक संस्थाओं और विश्वासों के विरोध में खड़ी है। यह सही है कि हम पितृसत्तात्मक समाज हैं, लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि यूरोप की एकरूप पितृसत्ता की तुलना में यह हमारे यहाँ यह कई रूप लिए हुए है। पितृसत्ता भी यदि एक सांस्कृतिक संरचना है, तो इसकी सार्वभौमिक और सार्वकालिक पहचान कैसे संभव है? हमें यह तो देखना ही पड़ेगा कि कौन-सा पितृसत्तात्मक समाज स्त्री को मनुष्य होने की जगह ज़्यादा देता है। मीरां का कृष्ण से प्रेम उसकी पति से नाराज़गी के कारण नहीं है। यह पारंपरिक भक्ति संस्कार के कारण है, इसलिए पारिस्थितिक है। मीरां जिस पितृसत्तात्मक समाज में है, वही उसे मीरां होने का साहस भी देता है और उसके इस साहस का सदियों तक सम्मान भी करता है। रूपक में सुविधा होती है, उसका सम्मोहन भी होता है, लेकिन कई बार इसकी तांत्रिक ज़रूरतें आपको बहुत ग़लत और आधारहीन निष्कर्षों पर पहुँचा देती है। आपको पता ही नही लगता है कि आप वहाँ पहुँच गए हैं, जो है ही नहीं। मीरां के संबंध में ऐसा बहुत हुआ। विमर्शकारों ने यह कह दिया कि मीरां ने यौन शुचिता को चुनौती दी। जो लोग मीरां के समाज और उसके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के जानकार हैं, वे यह जानते हैं कि यह संभव नहीं है। मीरांकालीन समाज में स्त्रियों की हालत और हैसियत को लेकर जो धारणाएँ बनाई गई हैं उनका भी हक़ीक़त से कोई रिश्ता नहीं है और ये ज़्यादातर रूपक की ज़रूरत के तहत गढ़ी-बनाई गई हैं।

पचरंग चोला में दाख़िल-ख़ारिज से बचने कोशिश है। हिंदी आलोचना में दाख़िल-ख़ारिज की कुप्रथा की जड़ें बहुत गहरी है। मीरां की असल पहचान और समझ नही बनने देने में इस कुप्रथा की निर्णायक भूमिका है। विचार और विमर्श पर निर्भरता ने हमारे सोचने-समझने ढंग में कई अंतर्बाधाएँ खड़ी कर रखी हैं। अक्सर जिसे हम दाख़िल करते हैं, उसका सब आँख मूँद दाख़िल कर लेते हैं और जिसे दाख़िल करते हैं उसे आँख मूँद एकतरफ़ा ख़ारिज कर देते हैं। दाख़िल में से कुछ को ख़ारिज और ख़ारिज में से कुछ को दाख़िल करने का रिवाज़ हमारे यहाँ अभी बना ही नहीं है। जिसे आप दाख़िलल कर रहे हैं उसमें कुछ तो ख़ारिज क़ाबिल भी होगा ही और जिसे आप ख़ारिज कर रहे हैं उसमें कुछ भी दाख़िल क़ाबिल नहीं है, ऐसा तो हो ही नहीं सकता। मीरां की पहचान और समझ बनाने वाले ज़्यादातर लोगों ने ‘सामंती’ को मनुष्य विरोधी मानकर पूरी तरह ख़ारिज कर दिया। गोया ‘सामंती’ में मनुष्यता का कोई लक्षण होता ही नहीं हो। देश भाषा स्रोतों को झूठ और अतिरंजित की श्रेणी में डालकर दरकिनार कर दिया, जैसे अतिरंजना और झूठ का तथाकथित ‘आधुनिक’ से संबंध ही नहीं हो। सामंतवाद यूरोप में भी था और हमारे यहाँ भी था। हमारे यहाँ सामंतवाद हमारे सांस्कृतिक वैविध्य के अनुसार कई तरह का था। लेफ्टिनेंट कर्नल टॉड तो यूरोप से था। उसने यूरोपीय सामंतवाद की तुलना मेवाड़-मारवाड़ के सामंतवाद से की। उसने मेवाड़-मारवाड़ की सामंती प्रथा को यूरोप की तुलना में अच्छा पाया। पचरंग चोला में राजस्थान के मेवाड़-मारवाड़ के समाज के कई पहलुओं की सकारात्मक पहचान जिन लोगों की अच्छी नहीं लगी, उनको यह समझना चाहिए कि जब सामंती प्रथा सभी समाजों में थी, तो यह देखा जाना चाहिए कि उनमें से किसमें मनुष्य होने की गुंजाइश ज़्यादा थी। सब धन बाइस पंसेरी नहीं होता और यदि होता है, तो उससे आप किसी युक्तिसंगत निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सकते।

पचरंग चोला में मीरां के समाज की पहचान कुछ ही लोगों को अच्छी लगी, लेकिनशेष ज़्यादातर लोगों ने उसको पसंद नहीं किया। पसंद नहीं करने वाले ज़्यादातर लोग वही हैं, जिन्होंने इस समाज के बारे में अपनी राय पहले से बना रखी है। जो तयशुदा है, उसको बदलना आसान काम नहीं है। वास्तविकता, जो बहुत विविध और जटिल है और निरंतर बदलती भी रहती है, उसको समझना और उसकी नयी पहचान बनाना बहुत मुश्किल काम है। इसको किसी तयशुदा रूपक में ढालकर व्यवस्थित कर लेना सुविधाजनक और आसान है। इस ‘शार्टकट’ से बनी मीरां के समाज की एक रूपकीय पहचान विचार और विमर्श पर निर्भर लोगों के पास पहले से है। इस पहचान का हक़ीक़त से कोई संबंध नहीं है। यह पहचान शास्त्र निर्भर पहचान है और इसका सामाजिक जीवंत गतिशीलता से कोई लेना-देना नहीं है। शास्त्र अक्सर रूढ़ियो से बनते हैं। सही तो यह है कि रूढ़ि शास्त्र का प्रस्थान और बुनियाद, दोनों हैं। जब तक रूढ़ि शास्त्र बनती है, समाज उसको छोड़ कर आगे निकल चुका होता है, इसलिए शास्त्र के आधार पर किसी समाज की पहचान और समझ हमेशा आधी-अधूरी होती है। मीरां का समाज रूढ़ियों के ढेर से बने शास्त्र से बाहर का अलग समाज है। भक्ति आंदोलन जीवंत और गतिशील अपने लोक-समाज के खाद-पानी से है। यह समाज उसको धारण भी करता है और उसको संरक्षण भी देता है। अब यह कैसे हो सकता है कि भक्ति आंदोलन तो अच्छा है, लेकिन उसको धारण करनेवाला और उसको खाद-पानी देने वाला समाज ख़राब है।

पचरंग चोला में मीरां के समाज का परिप्रेक्ष्य बहुत व्यापक है और इसमे कोई राय अपवादों के आधार पर नहीं बनाई गई है। यह रूढ़ि बन गई है किसी समाज की समझ और पहचान बनाने में विमर्शकारों का ध्यान एक तो अपवादों पर रहता है और दूसरे वे अक्सर समय के किसी एक हिस्से को उसके पूर्वापर से काटकर उसके आधार पर निष्कर्ष निकालते हैं। स्त्रियों के उत्पीड़न और उनके विरुद्ध अन्याय के दो उदाहरण उनको स्त्रियों की सुरक्षा और उनके स्वावलंबन की चिंता के सौ प्रावधानों की तुलना में बड़े लगते हैं। कोई समाज कभी पूरी तरह आदर्श समाज नहीं होता। उसमें अच्छा-बुरा हमेशा एक साथ चलता रहता है। कोई समाज कभी पूरी तरह केवल अच्छा और केवल ख़राब भी नहीं होता, इसलिए उसकी पहचान उसी तरह होनी चाहिए। मीरां के समाज के बारे में सामान्यीकरण अधिक हुआ है और उसके वैविध्य की अवहेलना हुई है। किसी समाज के संबंध में निष्कर्ष उसके विस्तृत ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में निकाले जाने चाहिए। कोई समाज किसी नवाचार को तत्काल स्वीकृति नहीं देता। उसमें प्रतिरोध और आत्मसातीकरण प्रक्रिया निरंतर और लंबे समय तक चलती रहती है। कोई प्रतिरोध हमेशा नहीं रहता और कोई आत्मसातीकरण स्थायी नहीं होता। प्रतिरोध आत्मसात होता है और आत्मसात होने के बाद यथावश्यकता फिर प्रतिरोध भी होता है। मीरां के साहस और स्वेच्छाचार का भी प्रतिरोध स्वाभाविक था, लेकिन एक तो यह समाज के सभी तबकों में नहीं था और दूसरे यह हमेशा नहीं रहा। समाज का कुछ हिस्सा शुरू से ही उसके समर्थन में था, तो कुछ तबकों में उसका प्रतिरोध जल्दी ख़त्म हो गया और कुछ को उसको आत्मसात करने में देर लगी। पचरंग चोला में समाज के इस स्वभाव को ध्यान में रखा गया है। यहाँ ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य बहुत व्यापक, नवीं-दसवीं सदी से उपनिवेशकाल तक फैला हुआ है और समाज के संबंध में राय भी अपवादों के बजाय उसके व्यापक ‘चाल-चलगत’ के आधार पर बनाई गई है।

पचरंग चोला में केवल मीरां की कविता पर निर्भरता कम है। मीरां के जीवन से संबंधित ज़्यादातर उपलब्ध विमर्श और आख्यान उसकी कविता के अंतःसाक्ष्यों पर आधारित हैं। इस कारण उसके जीवन के संबंध में कई कथाएँ और प्रवाद चल निकले हैं। मीरां की कविता का चरित्र ऐसा है कि केवल इस पर निर्भरता आपको ग़लत और भ्रामक निष्कर्षों पर ले जा सकती है। दरअसल मीरां की कविता सदियों से केवल मीरां की कविता नहीं है। यह ऐसी है कि हमारा लोक भी उसमें रच-बस गया है। उसमें हमारे लोक के सुख-दुःख और कामनाओं का की जमकर जोड़-बाकी हुई है। मीरां कविता इस जोड़-बाकी से इतनी समावेशी और उदार और लचीली हो गई है कि इससे आप कुछ भी सिद्ध कर सकते हैं। यहाँ भी कविता के अंतःसाक्ष्यों का इस्तेमाल वहीं हैं, लेकिन वहाँ जहाँ इतिहास, आख्यान और लोक की किसी धारणा या तथ्य की पुष्टि के लिए अपेक्षित है।

कुछ लोग पचरंग चोला में इस्तेमाल देशज भाषा स्रोतों को ‘साक्ष्य’ मानने के ख़िलाफ़ थे। दरअसल भक्तमाल, परची, चरित, बही, विगत, वंश, ख्यात आदि रचनाएँ और जनश्रुतियाँ हमारे समाज के सांस्कृतिक व्यवहार का ज़रूरी हिस्स्सा हैं। ये सब उसकी सांस्कृतिक भाषा भी हैं। कोई इनको जाने-समझे बिना इस समाज को समझने का दावा करता है, तो वह मुगालते में है। दरअसल ‘साक्ष्य’ का यह ख़ास आग्रह का इतिहास की यूरोपीय शिक्षा और संस्कार से आया है और विडंबना यह है यह आज भी बरकरार है। सभी देश-समाज यूरोप जैसे होंगे और वहाँ भी वही सब मिलेगा, जो यूरोप में मिलता है, यह आग्रह ही ग़लत है। रबीद्रनाथ टैगोर ने तो यह बहुत आरंभ में समझ लिया था। उन्होंने एक जगह कहा था कि “दरअसल इस अंधविश्वास का परित्याग कर दिया जाना चाहिए कि सभी देशों के इतिहास को एक समान होना चाहिए। रॉथ्सचाइल्ड की जीवनी को पढ़कर अपनी धारणाओं को दृढ़ बनाने वाला व्यक्ति जब ईसा मसीह के जीवन के बारे में पढ़ता हुआ अपनी ख़ाता-बहियों और कार्यालय की डायरियों को तलाश करें और अगर वे उसे न मिलें, तो हो सकता है कि वह ईसा मसीह के बारे में बड़ी ख़राब धारणा बना ले और कहे: ‘एक ऐसा व्यक्ति जिसकी औकात दो कौड़ी की भी नहीं है, भला उसकी जीवनी कैसे हो सकती है?’ इसी तरह वे लोग जिन्हें ‘भारतीय आधिकारिक अभिलेखागार’ में शाही परिवारों की वंशावली और उनकी जय-पराजय के वृत्तांत न मिलें, वे भारतीय इतिहास के बारे में पूरी तरह निराश होकर कह सकते हैं कि ‘जहाँ कोई राजनीति ही नहीं है, वहाँ भला इतिहास कैसे हो सकता है?’ लेकिन ये धान के खेतों में बैंगन तलाश करने वाले लोग हैं। और जब उन्हें वहाँ बैंगन नहीं मिलते हैं, तो फिर कुण्ठित होकर वे धान को अन्न की एक प्रजाति मानने से ही इनकार कर देते हैं। सभी खेतों में एक-सी फ़सलें नहीं होती हैं। इसलिए जो इस बात को जानता है और किसी खेत विशेष में उसी फ़सल की तलाश करता है, वही वास्तव में बुद्धिमान होता है।” पचरंग चोला में संकल्प और आग्रहपूर्वक धान के खेत में धान ही तलाशा गया है और इसमें इसीलिए मीरां के समाज के सांस्कृतिक व्यवहार और भाषा की सब चीज़ों को आग्रहपूर्वक ‘साक्ष्य’ की जगह भी दी गई है।

मीरां के संबंध में ख़ास बात यह है कि वह इतिहास, आख्यान, लोकस्मृति, कविता आदि में निरंतर इधर-उधर और अलग के बावजूद भी बदलती नहीं है। सदियों बाद भी उसके असल रूप के कुछ संकेत इन सभी रूपों में मौजूद हैं। मीरां ने कहा भी है-सोनैं काट न लागै।पचरंग चोला पहर सखी री में इधर-उधर और अलग के बचे हुए असल मीरां के इन्हीं संकतों को पहचानने-समझने की कोशिश है।

संपर्क: अध्येता, भारतीय उच्च अध्यान संस्थान, राष्ट्रपति निवास, शिमला -171005, मो. 9414325302, ईमेल: madhavhada@gmail.com


46 views0 comments

Commentaires


bottom of page