• Madhav Hada

उदयपुर का सुगंध वृक्ष




(आज हिंदी के कीर्तिशेष कवि और चिंतक नंदचतुर्वेदी का 99वाँ जनमदिन है। प्रस्तुत है उनकी स्मृति को समर्पित 'लोकमत' में पूर्व प्रकाशित एक आलेख)

1.

मोबाइल पर कॉल देखकर गाड़ी सड़क के किनारे पर ली। बोलते ही तपाक से नंद बाबू ने कहा- “तुम बहुत दिनों से आए नहीं।” उद्विग्न और चिंतित तो बातचीत में वे हमेशा रहते थे, लेकिन आज उनका स्वर किंचित् उदास भी था। उन्होंने कहा- ‘‘आओ, बहुत सारी बातें करनी है। बड़े रद्दोबदल हो रहे हैं। संकेत अच्छे नहीं है।’’ तकरीबन आधे-पौन घंटे बाद ही सूचना मिली कि नंद बाबू नहीं रहे। वे उदयपुर की पहचान थे। अब उनका नहीं होना उदयपुर में कुछ कम होने जैसा है। यह वैसा ही है जैसे वर्षों से खड़ा, गली-मौहल्ले की पहचान जैसा कोई दरख्त अचानक वहां नहीं रहे। नंद चतुर्वेदी की एक कविता है ‘सुगंध वृक्ष’। वे सचमुच उदयपुर के सुगंध वृक्ष थे। उदयपुर और उदयपुर में बाहर से आने वाले सभी लोग इस सुगंध वृक्ष पर पास खिंचे चले आते थे। कोई भी आता, तो पूछता नंद बाबू हैं? कवि, लेखक, पत्रकार, कार्यकर्ता, राजनेता सब उनके पास जाते। उनके पास जाना, बैठना, बतियाना-गपियाना समृद्धकारी था। उनसे मिलने में विलंब होता, तो लगता कि कुछ अधूरा और बकाया है।

उनके पास नहीं जाना होता, तो उनका आत्मीय तकाजा तय था- “तुम आए नहीं। किसी दिन समय निकालकर आओ।” जाने पर वे अक्सर अपनी बैठक में किताबों से घिरे हुए कुर्सी पर बैठे मिलते। गर्मजोशी उनके स्वभाव में थी। वे शुरूआत ही ऐसी करते कि आने वाला तत्काल सहज हो जाता। वे कहते- ‘आओ प्रोफेसर’ ‘आओ संपादक’, ‘तुम्हारे बड़े चर्चे हैं’, ‘छाए हुए हो’, ‘बहुत दिनों बाद आए’ आदि। वे उदयपुर में साहित्य के पर्याय जैसे थे। सभा, संगोष्ठी, व्याख्यान, भोज आदि में वे सब जगह होते। ठहाके लगाते हुए, बतियाते-गपियाते हुए उनकी मौज़ूदगी अक्सर ध्यानाकर्षक होती।

वे उदयपुर में थे, पर कहा यह जाना चाहिए कि उदयपुर उनमें था। उदयपुर की जड़ें उनमें बहुत गहरी और फैली हुई थी। हिंदी में उनके जैसे कवि कम हैं, जो अपने भूगोल में इतने गहरे रचे-बसे हों। उनका मनुष्य-कवि और कार्यकर्ता पूरी तरह अपने भूगोल में पेड़ की तरह फैला हुआ था। उदयपुर की हवाएं अपना घोड़ा उनकी कविताओं में बांधती हैं। उदयपुर के बादल उनकी कविताओं में ठहरकर बतियाते हैं। यहां की सर्पिल और घुमावदार सड़के उनकी कविताओं से गुजरती हैं। यहाँ की झीलें, सज्जनगढ़, नीमज माता, रानी रोड सब उनकी कविताओं के स्थायी बाशिंदें हैं।

नंद चतुर्वेदी में असाधारण या बड़े होने होने के नाटक या अभिनय जैसा कुछ भी नहीं था। वे एक मनुष्य जैसे पूरे और बिंदास मनुष्य थे और उनका जीवन, जीवन जैसा जीवन था। वे निंदा, सराहना, मसखरी आदि सब करते। मित्रों को छेड़ना और उनसे हँसी-मजाक करना उनकी आदत थी। व्यंग्य भी उनका मारक होता। आत्मीय होते, तो इतना होते कि सामने वाला बिछ जाता। गाहे-बगाहे वे नाराज भी होते और कभी-कभी मुँह भी चढ़ा लेते। अपनी नाराजग़ी को वे खुलकर जाहिर भी करते। खास बात यह है उनमें जो भी कुछ था वो उनके अपने मनुष्य का था। वे अपना कहते-करते और अपना ही हँसते। उनकी नाराजगी और प्रेम भी उनके अपने होते थे। उनमें ओढ़ा, गढ़ा या बनाया हुआ कुछ नहीं था। उनकी कविता भी इसलिए कवि की कम, मनुष्य की कविता ज्यादा है। उसमें मनुष्य की ऊँच-नीच और इधर-उधर की ही उठापटक सब जगह है। कवियों की कविता में अक्सर कुछ समय बाद ही बनाया या गढ़ा हुआ आने लगता है। होते-होते यह भी होता है उसमें मनुष्य जैसे मनुष्य से अलग, कोई गढा हुआ मनुष्य भी चुपचाप आकर बैठ जाता है। नंद चतुर्वेदी की कविता की खास बात यह है कि इसमे गढे हुए मनुष्य से असली मनुष्य का विस्थापन नहीं है। इसमे शुरू से आखिर तक मनुष्य जैसा मनुष्य है।

चिंतित और उद्विग्न नंद चतुर्वेदी हमेशा रहते। चिंता उनकी बातचीत और लेखन में बराबर छलकती। मिलते ही अपनी चिंता का कोई सिरा वे आपको पकड़ा देते। उनकी चिंता के ओर-छोर बहुत विस्तृत थे। दुनिया-जहान, देश, राज्य, गली-मौहल्ला, खुन्नस, ईर्ष्या, द्वेष, साहित्य की राजनीति आदि सब इसमें होते। वे विख्यात और महान् होने का लबादा ओढ़कर चिंतित रहनेवाले लोगों से अलग थे। गली-मौहल्ले और शहर का कोई छोटा मुद्दा भी उनकी चिंता में उसी तरह रहता जैसे देश की आर्थिक नीतियाँ, नव साम्राज्यवाद और भूमंडलीकरण। वे चिंतित और उद्विग्न एक स्टैंड के साथ रहते। मुद्दों पर वे बहुत साफ-साफ पक्ष या विपक्ष में होते। वे बातचीत भी अक्सर एक स्टैंड के साथ करते। उनके पास अपने समर्थन में हमेशा कई तर्क होते। वे इनका प्रभावी इस्तेमाल करते और देर तक अपने स्टैंड पर कायम भी रहते। बातचीत से आगे जरूरत लगती तो वे इसके लिए धरना-प्रदर्शन पर उतर आते। उनकी चिंता और उद्विग्नता के संबंध में खास बात यह है कि यह बुझी हुई नहीं थी। कुछ नहीं कर पाने का रंज, हताशा और असमंजस उनकी बातचीत और उनकी कविता में रहते, लेकिन उनका स्वर बुझा हुआ कभी नहीं रहा। कुछ करने और चीजों को बदलने की उद्विग्नता उनमें निरंतर थी।

2,

नंद चतुर्वेदी की कवि सक्रियता बहुत विस्तृत है। उन्होंने उपनिवेशकाल के अंतिम चरण में कविता के ब्रजभाषा के दौर में लिखना शुरू किया और इक्कीसवीं सदी की शुरूआत में हिंदी कविता के प्रौढ़ हो जाने तक लिखते रहे। उन्होंने हिंदी के कविता के विकास की तमाम उठापटक देखी और उसमें शामिल भी रहे। वे सब आंदोलन, प्रवृत्तियां और प्रभाव, जो हिंदी कविता में आए-गए, उनकी पदचाप उनकी कविता में सुनी जा सकती है। उनकी कविता इन सब में थी, उसने इनसे लिया-दिया भी, लेकिन यह इनमें से किसी एक की नहीं हुई। हिंदी में ऐसी दुर्घटनाएं बहुत हुईं कि कवि किसी खूंटे से बंध गए और बंधे भी ऐसे कि वहीं ठहर गए। नंद चतुर्वेदी कहीं भी नहीं ठहरे और इसलिए कभी नहीं चुके। कहीं-कहीं उनकी कविता में बंध कर ठहर जाने की शुरूआत तो हुई, लेकिन वे बहुत जल्दी इसको तोड़ कर आगे चल दिए। तोड़ कर आगे चले जाना उनकी कविता कई जगह है, लेकिन हिंदी के कई कवियों के यहां यह दिखता है और कहीं-कहीं तो ऐसे दिखता है कि यह बहुत असहज और अटपटा लगता है। नंद चतुर्वेदी की कविता में यह तोड़ कर आगे निकल जाना इतना अनायास और सहज है कि कई बार इसकी पहचान मुश्किल हो जाती है।

समय और कविता का संबंध हिंदी के कम कवियों के यहां सामान्य और सहज है। कविता यदि अपने समय पर ठहर जाए, तो गड़बड़ है और यदि यह समय से बाहर हो तो फिर बहुत गड़बड़ है। कोई कविता समय में भी हो और समय से आगे भी जाए, तो ही सही मायने में कविता है। कवि पहले मनुष्य है, इसलिए उसकी चेतना और बोध में उसके समय की छाप तो होगी। समय बदल जाएगा, लेकिन यह छाप भी बदलेगी इसकी गारंटी नहीं है। कवि वह जो अपनी इस मनुष्यवृत्ति से ऊपर उठ जाए। वह इस तरह ऊपर उठे कि अपने समय में गहरे डूब कर भी इसकी सीमाओं को पहचान सके। नंद चतुर्वेदी की कविता अपने समय में डूबी हुई कविता भी है और कुछ हद तक यह उससे ऊपर और आगे भी जाती है। समय उनकी कविताओं का जरूरी आयाम है। हिंदी कविता में अक्सर ऐसा हुआ है कि या तो कवि अपने समय पर ठहर गए या फिर समय से बाहर या ऊपर चले गए। नंद चतुर्वेदी कविता समय में गहरे डूबी कविता है, लेकिन यह समय में ठहरी और उससे बंधी कविता नहीं है। यह समय से आगे भी जाती है और बहुत निर्मम होकर अपने समय को समझती-पहचानती है। उनकी कविता में समय बहुत पारदर्शी है। उन्होंने हमारे समय की उठापटक को कई बार उसके संदर्भ, पहचान और नाम संज्ञाओं के साथ द्वारा अभिव्यक्त किया है। बावजूद इसके उनकी ऐसी कविताएं अपने समय से बंधी, केवल तात्कालिक कविता की तरह नहीं लगतीं। उनकी कविता में समय की निरंतर सार-सँभाल और पहचान-परख का सबूत यह है कि उनके एकाधिक काव्य संकलनों के नाम में ही ‘समय’ की मौजूदगी है।

नंद चतुर्वेदी की ख्याति कवि के रूप में है, लेकिन वे इससे पहले एक समाजवादी कार्यकर्त्ता भी थे। उनका संपूर्ण जीवन उनके कवि और समाजवादी कार्यकर्ता के बीच आवाजाही में निकला। वे समाजवादी विचारक और कार्यकर्ता थे- उन्होंने गैरबराबरी और अन्याय के विरुद्ध आजीवन संघर्ष किया। उन्होंने इसके लिए कई आंदोलन किए और कई धरना-प्रदर्शनों का नेतृत्व किया। संवाद में भी अक्सर उनकी चिंता का विषय गैरबराबरी और अन्याय ही होते थे। लेकिन दुनिया नहीं बदल पाने की लाचारी और रंज भी उनको बार-बार घेरता थे। ऐसा जब होता था तो वे कविता की तरफ मुड़ते थे। उनकी कविता में दुनिया नहीं बदल पाने का रंज, असमंजस और लाचारी इसीलिए बहुत है। वे कार्यकर्ता थे, इसलिए शब्द की ताकत को लेकर कभी पूरी तरह् आश्वस्त नहीं रहे। यह चिंता उनके विचारात्मक लेखों और संपादकीयों में बार-बार झलकती है। शब्द के प्रति अविश्वास का भाव उन्हें कर्म की और ले जाता था। कवि और कार्यकर्ता के बीच उनकी आवाजाही ऐसी है कि उनका कार्यकर्ता अपने कवि का भूलता नहीं था और उनका कवि अपने कार्यकर्ता का छोड़ता नहीं था। खास बात यह है कि वे आजीवन कवि और कार्यकर्ता, दोनों रहे। उनके कवि ने उनके कार्यकर्ता की समझ को व्यापक और गहरा किया, तो उनके कार्यकर्ता ने उनके कवि को भटकने नहीं दिया।

रिवाज और चलन कुछ ऐसा बना कि हिंदी साहित्य में आरंभ से ही अतीत के लिए हिकारत का भाव आ गया। कविता हो या कहानी उसमें अतीत का आना पिछड़ापन समझा जाने लगा। इस तरह नॉस्टेलेजिया साहित्य में एक मानसिक विकृति की तरह प्रचारित हो गया। इसको देश निकाला देने की हड़बड़ी और जल्दबाजी में लोग यह भूल गए कि यह स्वाभाविक मानवीय प्रवृत्ति है और इसका रचनात्मक उपयोग भी हो सकता है। छायावाद के दौरान नॉस्टेलेजिया की लानत –मलामत खूब हुई। बाद में लोगों को समझ में आया कि छायावाद में भी नॉस्टेलेजिया की सघनता अकारण नहीं थी-इसके भी कुछ निहितार्थ थे। नंद चतुर्वेदी की कविता में नॉस्टेलेजिया का जैसा रचनात्मक उपयोग हुआ है, वैसा हिंदी के किसी दूसरे कवि के यहां नहीं है। अतीत और वर्तमान की मौजूदगी उनकी कविता में जुगलबंदी की तरह आती है। वे इस जुगलबंदी का उपयोग यथार्थ की अदृश्य परतें खोलने मे करते हैं। वे इससे ऐसे कई अर्थ-आशयों तक पहुंचते हैं, जहां तक सामान्यतः हमारी निगाह नहीं जाती। यह महज संयोग नहीं है कि अपनी सक्रियता के अंतिम चरण में उन्हांने अपनी एक रचना का नाम अतीत राग रखा। अतीत राग उनकी कविता में आरंभ से ही है और समय के साथ यह अधिक गहरा और व्यापक होता गया है। खास बात यह है कि उनकी कविता का ‘अतीत राग’ ‘अतीत प्रेम’ से बहुत अलग है। उनकी कविता में अतीत प्रेम नहीं है, उनकी कविता में अतीत का आग्रह नहीं है, अतीत उनके लिए औजार या हथियार तरह है।

मुखर वेचारिक रुझान के बावजूद नंद चतुर्वेदी की कविता हिंदी की प्रतिबद्ध तमगेवाली अधिकांश कविता की तरह रूखी और ऊबड़-खाबड़ नहीं है। यह रसवंती- बहुत सरस, कोमल और कुछ हद तक रूमानी है। हिंदी में विचार के आग्रह से कविता को फायदा हुआ, पर इससे कुछ नुकसान भी हुए। कुछ प्रतिबद्ध कवियों के यहां विचार इतना ज्यादा हो गया कि उनकी कविता पटरी से ही उतर गई। वैचारिक प्रतिबद्धता नंद चतुर्वेदी की कविता में है और इसका जोर-जोर से ढोल बजाने कर मुनादी करने वालों से कुछ ज्यादा ही गहरी और मजबूत भी है, लेकिन उनकी कविता कभी पटरी से नहीं उतरी। इसका कारण है-नंद चतुर्वेदी ने शुरूआत गीत से की थी, इसलिए गीत के बुनियादी गुण-धर्म का संस्कार उनकी कविता में हमेशा रहा। उस दौर में भी जब हिंदी कविता अपनी पटरी से कुछ ज्यादा ही दूर निकल गई, नंद चतुर्वेदी की कविता उसके आसपास ही रही। कविता के बुनियादी गुण-धर्मों का आग्रह उनकी सक्रियता के अंतिम चरण में कुछ ज्यादा हो गया था। उनका गीत संकलन गा मेरी जिंदगी कुछ गा’ इसी दौर में प्रकाशित हुआ।

भाषा और मुहावरे के मामले में नंद चतुर्वेदी की कविता में बहुत रद्दोबदल नहीं है। यह अपने आरंभ से से लगाकर अंत कमोबेश एक जैसी है। दैनंदिन जीवन की आम बोलचाल की भाषा और मुहावरा उन्होंने आजीवन इस्तेमाल किया। हिन्दी कविता में कई आंदोलन आए-गए, कई मुहावरे बने-बिगड़े, लेकिन नंद चतुर्वेदी ने अपना बुनियादी भाषिक संस्कार नहीं छोड़ा। उस दौर में भी जब छायावादी-उत्तर छायावादी कविता की लोकप्रियता अपने चरम पर थी, नंद चतुर्वेदी आम बोलचाल का मुहावरा इस्तेमाल करते रहे। इस संबंध में उनकी समाजवादी प्रतिबद्धता और संस्कार काम आए। इन्होंने उनको भटकने नहीं दिया। हिन्दी में गीत से कविता की ओर आने वाले कवियों की भाषा और मुहावरे में अंतर है। उनके गीतों की भाषा अलग और कविता की अलग है, पर नदं चतुर्वेदी की कविता में यह फर्क नहीं है। उनके गीतों की भाषा भी कमबेश वही है, जो उनकी कविता की है। उनके गीतों की भाषा का रूमानी मुहावरा उनकी कविता में भी आता है।

30, अहिंसापुरी, उदयपुर का यह सुगंध वृक्ष अब वहां नहीं है। ‘हवा वहां से अपना घोड़ा खोल कर ले गई है’ और ‘बादल वहां से रूठकर चले गए हैं’, लेकिन इसकी मनुष्य गंध वहां से जाती नहीं है। अक्सर वहाँ से गुजरते हुए यह आज भी अपनी ओर खींचती है और उधर मुड़ने के लिए अनायस पाँव गाड़ी के क्लच-ब्रेक पर चले जाते हैं।




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